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पंचायत चुनाव की अग्निपरीक्षा
कृपाशंकर चौबे
Updated Mon, 20 May 2013 09:51 PM IST
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पोरिबर्तन के नारे के साथ पश्चिम बंगाल की सत्ता में आई ममता सरकार के कार्यकाल के दो साल पूरे हो गए हैं। लेकिन इस दौरान लगातार निशाने पर रही तृणमूल कांग्रेस के लिए जुलाई के पहले पखवाड़े में तीन चरणों में होने जा रहा पंचायत चुनाव अग्निपरीक्षा है।
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दरअसल सत्ता में आने के बाद विगत दो वर्षों में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की नकारात्मक छवि ही ज्यादा दिखी है। न तो वह राज्य में हिंसक राजनीति का माहौल बदल पाईं, न आम जनता की बेहतरी की दिशा में कोई कदम उठा पाईं और न ही राज्य की ध्वस्त अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के मामले में कुछ कर पाईं। उल्टे इस दौरान यूपीए सरकार से समर्थन वापस लेकर उन्होंने राज्य की बेहतरी की रही-सही उम्मीदें भी ध्वस्त कर दीं।
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इन सबके बीच अस्पतालों में नवजातों की मौत, देसी शराब से हुई मौत और सारदा चिटफंड घोटाले के खुलासे ने उनके लिए चुनौतियां ही ज्यादा पैदा कीं। पंचायत चुनाव के नतीजों से पता चल जाएगा कि राज्य की ग्रामीण जनता तृणमूल सरकार के कामकाज से संतुष्ट है या नहीं। यह भी देखना दिलचस्प होगा कि पंचायत चुनाव में तृणमूल और कांग्रेस अलग-अलग लड़ते हैं, तो उसका क्या प्रभाव पड़ता है।
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पिछले पंचायत चुनाव में माकपा की करारी हार हुई थी, जो अंततः दो साल बाद सत्ता परिवर्तन के रूप में सामने आई। तब तृणमूल ने सत्तारूढ़ मोर्चे को पटखनी देकर नंदीग्राम और सिंगुर समेत राज्य की अधिकतर पंचायतों पर कब्जा जमा लिया था। माकपा को दक्षिण 24 परगना जिले में भी करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था। माकपा का पारंपरिक गढ़ रहे दक्षिण 24 परगना जिले में 1978 के बाद ऐसा पहली बार हुआ था, जब जिला परिषद पर उसका नियंत्रण खत्म हो गया। इसी जिले में ऐतिहासिक तेभागा कृषक विद्रोह हुआ था।
ऐसा माना जाता है कि कृषि की जमीन पर उद्योग लगाने की आक्रामक शैली के कारण ही पिछले पंचायत चुनाव में माकपा की हार हुई। लेकिन दो साल पहले सत्ता में आई तृणमूल सरकार के सामने तो और भी जटिल स्थिति है। पंचायत चुनाव ऐसे समय में हो रहा है, जब चिटफंड घोटाला तूल पकड़े हुए है।
इस घोटाले के मुख्य आरोपी सारदा समूह के सर्वेसर्वा सुदीप्त सेन ने तृणमूल कांग्रेस के दो सांसदों-कुणाल घोष और सृंजय बोस पर पैसे मांगने, ब्लैकमेल करने तथा कई अन्य गंभीर आरोप लगाए हैं। सुदीप्त सेन की चिट्ठी में वित्त मंत्री चिदंबरम की पत्नी नलिनी चिदंबरम का नाम भी आया है।
त्रिपुरा के मुख्यमंत्री मानिक सरकार तथा बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तथा केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री आबू हाशेम खान चौधरी की सारदा समूह के साथ नजदीकी की खबरों से सियासी राजनीति और गर्म बनी हुई है। तथ्य है कि माकपा के मुखपत्र में सारदा समूह बहुत पहले से विज्ञापन देता रहा है। इस घोटाले में चूंकि माकपा, कांग्रेस और तृणमूल, तीनों दलों के नेताओं के नाम आए है, इसलिए भी सियासी राजनीति गर्म बनी हुई है।
सारदा समूह की चिटफंड कंपनी में पैसा गंवानेवाले सबके सब प्रायः कमजोर तबके के लोग हैं। इस वर्ग को संरक्षण देने की अपनी जिम्मेदारी से ममता बनर्जी की सरकार बच नहीं सकती। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सारदा चिटफंड से धोखा खाए जमाकर्ताओं को राहत व मुआवजा देने के लिए 500 करोड़ रुपये का राहत कोष बनाने की घोषणा की है।
उनकी सरकार मनी मार्केटिंग के नाम पर छोटे निवेशकों से रुपये लेनेवाली कंपनियों के खिलाफ स्वतः संज्ञान लेते हुए कार्रवाई का विशेष अधिकार पुलिस को देने तथा प्रताड़ना का शिकार हुए निवेशकों को राहत देने के लिए एक अध्यादेश भी लाने जा रही है। भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) भी सारदा समूह की धोखाधड़ी की जांच कर रहा है।
इतने सब के बावजूद जमाकर्ताओं तथा एजेंटों की चिंता कम नहीं हुई है। वे पूरे राज्य में प्रदर्शन जारी रखे हुए हैं। एक आकलन के अनुसार, बंगाल में चिटफंड कंपनियों में पैसे जमा करनेवालों की संख्या करीब एक करोड़ है, एजेंटों की संख्या करीब तीस लाख है और जमा राशि दस हजार करोड़ रुपये से अधिक। चिटफंड घोटाले में धोखा खानेवाले अधिकतर ग्रामीण बंगाल के बाशिंदे हैं, इसलिए आसन्न पंचायत चुनाव में इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा।