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चमक बिखेरती पाकिस्तानी महिलाएं, दुनिया में नाम कर रहीं रोशन
Fri, 29 Jan 2021 03:32 AM IST
मरिआना बाबर
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मरिआना बाबर
Published by: मरिआना बाबर
Updated Fri, 29 Jan 2021 03:32 AM IST
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malala yousafzai
मेरा हमेशा से यह मानना रहा है कि पाकिस्तान का अगर कोई भविष्य है, तो वह यहां की कुछ असाधारण लड़कियों और महिलाओं के कारण ही है। इन महिलाओं ने हमेशा ही कुछ हासिल करने के लिए जंजीरें तोड़ी हैं और दुनिया ने यह बदलाव देखा है। लेकिन हाल के दौर में दो विदेशी युवतियों ने भी अपने-अपने क्षेत्रों में बड़ी लकीरें खींची हैं। इनमें से एक अमेरिका की अमांडा गोरमैन हैं। राष्ट्रपति जो बाइडन के शपथ ग्रहण समारोह में अमांडा गोरमैन ने जब अपनी कविता द हिल वी क्लाइंब पढ़ी, तो लोग सिर्फ उनके जुनून से नहीं, बल्कि उनकी छोटी उम्र से भी प्रभावित हुए। व्यक्तिगत तौर पर मुझे इस कविता की इन पंक्तियों ने बेहद प्रभावित किया, बट व्हाइल डेमोक्रेसी कैन बी पीरियडिकली डिलेड, इट कैन नेवर बी परमानेंटली डिफिटेड।
इसी के साथ मुझे स्वीडन की युवती ग्रेटा थनबर्ग की भी याद आ रही है। यह पर्यावरण कार्यकर्ता अपने काम के प्रति इतनी जुनूनी है कि इसने दुनिया भर के नेताओं पर पर्यावरण के हित में कदम उठाने का दबाव बना दिया है। यह युवा नेत्री वैश्विक नेताओं से सीधे-सपाट लहजे में बात करती है और उनकी विफलता पर उनकी आलोचना करने में नहीं हिचकिचाती। इस संदर्भ में मुझे ट्विटर पर थनबर्ग और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच के बेहद दिलचस्प संवाद की याद आ रही है।
पाकिस्तान में पैदा हुईं मलाला यूसुफजई को इस संदर्भ में याद करना बहुत स्वाभाविक है, जो किसी भी सूरत में अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थीं और तालिबान द्वारा लगभग मार दिए जाने के बाद भी जिन्होंने हिम्मत नहीं हारी। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल का आखिरी दौर हालांकि बेहद नाटकीय और हिंसक रहा, पर उस समय उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया, जिसका पाकिस्तान में स्वागत किया गया। ट्रंप के समय अमेरिकी कांग्रेस ने मलाला के नाम पर पाकिस्तान की जरूरतमंद लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम से संबंधित एक बिल पारित किया। यह बिल स्त्री शिक्षा के प्रति मलाला यूसुफजई की उस संजीदगी को मान्यता देता है, जिसका उद्देश्य एक ऐसी दुनिया का निर्माण है, जहां 'हर लड़की सीख सके और नेतृत्व कर सके।' इस बिल के तहत 2020 से 2022 तक पाकिस्तान में पहले से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में चल रही छात्रवृत्ति योजना में पाकिस्तानी महिलाओं को छात्रवृत्ति की राशि का कम से कम 50 फीसदी की मदद देने का लक्ष्य है।
पाकिस्तान में पैदा हुईं एक खगोल भौतिक विज्ञानी ने पिछली फरवरी में गुरुत्वाकर्षण तरंगों से संबंधित खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पाकिस्तानी-अमेरिकी प्रोफेसर नरगिस मवालवाला का नाम अमर उजाला के पाठकों ने शायद ही सुना होगा। इस खोज से न केवल वर्ष 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से संबंधित एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी सच साबित हुई है, बल्कि इस खोज ने ब्रह्मांड के क्षेत्र में नया और अभूतपूर्व अवसर पैदा किया है। इसी तरह शरमीन-ओबैद चिनॉय दो ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली पहली पाकिस्तानी फिल्मकार हैं। ऑनर किलिंग पर आधारित उनकी चर्चित डॉक्यूमेंटरी एक किशोरी के जीवन पर आधारित है, जिसकी उसके परिवार वालों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। शरमीन को ऑस्कर मिलने पर तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने ऑनर किलिंग की कुप्रथा खत्म करने की कसम खाई थी। इसी तरह रुखसाना और सोफिया वर्ष 2016 में भारत के शिलांग में हुए साउथ एशियन गेम्स के दौरान मुक्केबाजी में पहली बार अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाली महिलाएं बनीं।
दुनिया में पाकिस्तान का नाम रोशन करने वाली महिलाओं की फेहरिस्त लंबी है। इन औरतों ने अपनी कोशिशों और अपने काम के जरिये देश की दूसरी औरतों के लिए भी अवसर मुहैया कराए हैं। वे जानती हैं कि औरतों के काम और उपलब्धियों के कारण ही दुनिया इतनी खूबसूरत है। पाकिस्तानी औरतों की बेशुमार उपलब्धियों को देखते हुए देश के युवाओं को असाधारण काम करने के लिए आगे आना चाहिए।
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इसी के साथ मुझे स्वीडन की युवती ग्रेटा थनबर्ग की भी याद आ रही है। यह पर्यावरण कार्यकर्ता अपने काम के प्रति इतनी जुनूनी है कि इसने दुनिया भर के नेताओं पर पर्यावरण के हित में कदम उठाने का दबाव बना दिया है। यह युवा नेत्री वैश्विक नेताओं से सीधे-सपाट लहजे में बात करती है और उनकी विफलता पर उनकी आलोचना करने में नहीं हिचकिचाती। इस संदर्भ में मुझे ट्विटर पर थनबर्ग और पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच के बेहद दिलचस्प संवाद की याद आ रही है।
पाकिस्तान में पैदा हुईं मलाला यूसुफजई को इस संदर्भ में याद करना बहुत स्वाभाविक है, जो किसी भी सूरत में अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहती थीं और तालिबान द्वारा लगभग मार दिए जाने के बाद भी जिन्होंने हिम्मत नहीं हारी। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति काल का आखिरी दौर हालांकि बेहद नाटकीय और हिंसक रहा, पर उस समय उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया, जिसका पाकिस्तान में स्वागत किया गया। ट्रंप के समय अमेरिकी कांग्रेस ने मलाला के नाम पर पाकिस्तान की जरूरतमंद लड़कियों की शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप प्रोग्राम से संबंधित एक बिल पारित किया। यह बिल स्त्री शिक्षा के प्रति मलाला यूसुफजई की उस संजीदगी को मान्यता देता है, जिसका उद्देश्य एक ऐसी दुनिया का निर्माण है, जहां 'हर लड़की सीख सके और नेतृत्व कर सके।' इस बिल के तहत 2020 से 2022 तक पाकिस्तान में पहले से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में चल रही छात्रवृत्ति योजना में पाकिस्तानी महिलाओं को छात्रवृत्ति की राशि का कम से कम 50 फीसदी की मदद देने का लक्ष्य है।
पाकिस्तान में पैदा हुईं एक खगोल भौतिक विज्ञानी ने पिछली फरवरी में गुरुत्वाकर्षण तरंगों से संबंधित खोज में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस पाकिस्तानी-अमेरिकी प्रोफेसर नरगिस मवालवाला का नाम अमर उजाला के पाठकों ने शायद ही सुना होगा। इस खोज से न केवल वर्ष 1915 में अल्बर्ट आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत से संबंधित एक महत्वपूर्ण भविष्यवाणी सच साबित हुई है, बल्कि इस खोज ने ब्रह्मांड के क्षेत्र में नया और अभूतपूर्व अवसर पैदा किया है। इसी तरह शरमीन-ओबैद चिनॉय दो ऑस्कर पुरस्कार जीतने वाली पहली पाकिस्तानी फिल्मकार हैं। ऑनर किलिंग पर आधारित उनकी चर्चित डॉक्यूमेंटरी एक किशोरी के जीवन पर आधारित है, जिसकी उसके परिवार वालों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी। शरमीन को ऑस्कर मिलने पर तत्कालीन पाक प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने ऑनर किलिंग की कुप्रथा खत्म करने की कसम खाई थी। इसी तरह रुखसाना और सोफिया वर्ष 2016 में भारत के शिलांग में हुए साउथ एशियन गेम्स के दौरान मुक्केबाजी में पहली बार अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने वाली महिलाएं बनीं।
दुनिया में पाकिस्तान का नाम रोशन करने वाली महिलाओं की फेहरिस्त लंबी है। इन औरतों ने अपनी कोशिशों और अपने काम के जरिये देश की दूसरी औरतों के लिए भी अवसर मुहैया कराए हैं। वे जानती हैं कि औरतों के काम और उपलब्धियों के कारण ही दुनिया इतनी खूबसूरत है। पाकिस्तानी औरतों की बेशुमार उपलब्धियों को देखते हुए देश के युवाओं को असाधारण काम करने के लिए आगे आना चाहिए।