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पाकिस्तान, ट्रंप और धन्यवाद: क्या यह गठबंधन की मजबूती... या अमेरिकी कूटनीतिक प्राथमिकताओं में अस्थायी बदलाव?

Mon, 17 Mar 2025 08:06 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Mon, 17 Mar 2025 08:06 AM IST
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सार
हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी संसद में पाकिस्तान को धन्यवाद कहा, क्योंकि यह सीधे तौर पर अमेरिकी सैनिकों की हत्या से जुड़ा था। विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की यह स्वीकारोक्ति दरवाजे खुलने की तरह नहीं है, बल्कि एक छोटी-सी दरार है, जिसके जरिये पाकिस्तानी हुकूमत बस सांस ले सकती है।
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Pakistan Trump and Thanksgiving strengthening alliance or temporary shift in US diplomatic priorities
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (फाइल) - फोटो : ANI

विस्तार

अमेरिका के राष्ट्रपति रहते हुए अपने पूरे कार्यकाल के दौरान जो बाइडन ने पाकिस्तानी असैन्य नेतृत्व के साथ कभी कोई सीधा संपर्क नहीं किया। जबकि उनके वरिष्ठ अधिकारियों ने इस क्षेत्र में कई यात्राएं कीं, लेकिन उन्होंने कभी पाकिस्तान या अफगानिस्तान का दौरा नहीं किया। हालांकि, अतीत की तरह और यहां तक कि पाकिस्तान में मार्शल लॉ के विभिन्न वर्षों के दौरान भी, वाशिंगटन और रावलपिंडी के बीच सैन्य वार्ता जारी रही, जिसमें उच्च स्तरीय यात्राएं भी शामिल थीं।



यहां तक कि जब नया ट्रंप प्रशासन अपना कार्यभार संभाल चुका था, तब भी नए राष्ट्रपति डोनाल्ड के निर्देश पर नए सीआईए निदेशक ने पदभार ग्रहण करने के दूसरे ही दिन वांछित अफगान आतंकवादी साहिरउल्लाह खान के मुद्दे पर पाकिस्तान के खुफिया प्रमुख से बात की थी। इससे पहले ट्रंप ने पाकिस्तानी सेना को रियायत देने की घोषणा की थी, जब उन्होंने एफ-16 बेड़े के रख-रखाव के लिए 40 करोड़ डॉलर दिए थे, जिसे पाकिस्तान ने कई दशक पहले अमेरिका से खरीदा था।


असल में, जनवरी में अपनी विदाई से ठीक पहले, बाइडन प्रशासन ने पाकिस्तान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर नए अमेरिकी प्रतिबंधों की आलोचना की थी, जिसके बारे में पाकिस्तान सरकार ने कहा था कि ये 'भेदभावपूर्ण' हैं और क्षेत्र की शांति और सुरक्षा को खतरे में डालते हैं। नवीनतम अमेरिकी प्रतिबंध ऐसे समय में लगाए गए, जब कुछ महीने पहले ही चीन के एक शोध संस्थान सहित अन्य विदेशी संस्थाओं पर इसी प्रकार के प्रतिबंध लगाए गए थे।

डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस क्षेत्र में अपने मजबूत सहयोगी भारत को भी नहीं बख्शा, और ईरानी पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री और परिवहन में मध्यस्थता करने के लिए चार भारतीय कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया। लेकिन इससे भारत को दीर्घकालिक अर्थ में कोई फर्क नहीं पड़ा। जमीनी स्तर पर इन अमेरिकी प्रतिबंधों का पाकिस्तान के मिसाइल कार्यक्रम पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा, क्योंकि विशेषज्ञों ने इन्हें 'अदूरदर्शी, अस्थिर करने वाला और दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय रणनीतिक वास्तविकताओं से कटा हुआ' बताया। डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के आने के बाद ऐसा लगा कि वाशिंगटन और इस्लामाबाद के रिश्तों में कोई अंतर नहीं आएगा और पाकिस्तान अमेरिका के लिए निम्न प्राथमिकता वाला देश बना रहेगा। यह सर्वविदित है कि जब तक अफगानिस्तान में नाटो और अमेरिकी सैनिक थे, तब तक पाकिस्तान वाशिंगटन के लिए प्रासंगिक था। जब वे वापस चले गए, तो पाकिस्तान ने अपना महत्व खो दिया। डोनाल्ड ट्रंप के शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान का प्रतिनिधित्व वाशिंगटन स्थित उसके राजदूत ने किया था तथा किसी भी वरिष्ठ पाकिस्तानी अधिकारी को निमंत्रण नहीं दिया गया था। पाकिस्तान भी जब अमेरिका के साथ बातचीत करता है, तो न केवल सुरक्षा मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करता है, बल्कि द्विपक्षीय व्यापार एवं अन्य मुद्दों पर ही अधिक ध्यान देता है।

लेकिन पाकिस्तान जिस चीज के लिए तैयार नहीं था, वह सुखद रूप से, चौंकाने वाला और स्वागत योग्य ढंग से सामने आया, जब राष्ट्रपति ट्रंप ने पहली बार अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करते हुए एक प्रसिद्ध अफगान आतंकवादी, शरीफुल्ला खान को गिरफ्तार करने और सौंपने में मदद करने के लिए पाकिस्तान को धन्यवाद दिया, जिसने काबुल हवाई अड्डे पर एबी गेट की घटना में दर्जनों अमेरिकियों और अफगानों को मार डाला था। यह वह समय था, जब कुछ साल पहले अमेरिकी और नाटो सैनिक जल्दबाजी में अफगानिस्तान से निकल रहे थे।

'आज रात मुझे यह घोषणा करते हुए खुशी हो रही है कि हमने उस अत्याचार के लिए जिम्मेदार शीर्ष आतंकवादी को पकड़ लिया है और अब वह अमेरिकी न्याय की तेज तलवार का सामना करने के लिए यहां आ रहा है। और मैं इस राक्षस को गिरफ्तार करने में मदद करने के लिए विशेष रूप से पाकिस्तान सरकार को धन्यवाद देना चाहता हूं' ट्रंप ने कहा। इससे कैबिनेट सदस्यों सहित अधिकांश पाकिस्तानियों को हैरानी हुई।

ट्रंप की घोषणा के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ने पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री मोहम्मद इशाक डार को फोन करके धन्यवाद दिया। तीन साल तक एनएसए स्तर पर रहने के बाद दोनों पक्षों के बीच उच्च स्तर पर यह पहली बातचीत थी। 

वाशिंगटन से विभिन्न अमेरिकी अधिकारियों द्वारा पाकिस्तान को 'धन्यवाद' देने का सिलसिला जारी रहा और कई लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया कि क्या अब पाकिस्तान ट्रंप प्रशासन की निगाह में वापस आ गया है। हालांकि, विशेषज्ञों और विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि ट्रंप की यह स्वीकारोक्ति दरवाजे खुलने की तरह नहीं है, बल्कि एक छोटी-सी दरार है, जिसके जरिये पाकिस्तानी हुकूमत सांस ले सकती है और अपने नागरिकों को अपनी निरंतर वैश्विक प्रासंगिकता का एहसास करा सकती है। क्योंकि अमेरिकी 'धन्यवाद' सुरक्षा से संबंधित था और सीधे तौर पर अमेरिकी सैनिकों की हत्या से जुड़ा था। एक विशेषज्ञ ने कहा, 'आईएसआई के नियंत्रण में अभी और भी महत्वपूर्ण लक्ष्य हो सकते हैं, जिन्हें बातचीत जारी रखने के लिए बाद में बदला जा सकता है। हालांकि, ऐसी बात करने वाले भूल जाते हैं कि शरीफुल्ला के बारे में शुरुआती खुफिया जानकारी अमेरिका से ही आई थी, और पाकिस्तान के पास सहयोग करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।'

लेकिन क्या अमेरिकी 'धन्यवाद' पाकिस्तान के प्रति अमेरिका के नजरिये में एक महत्वपूर्ण मोड़ है और क्या यह इस बात का संकेत है कि द्विपक्षीय संबंध अब और बेहतर होंगे और क्या ट्रंप प्रशासन अब क्षेत्र में अपने हितों की देखभाल के लिए पाकिस्तान की ओर देखेगा? अगर वाशिंगटन और इस्लामाबाद, दोनों ही द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने के लिए आगे बढ़ते हैं, तो पाकिस्तान सरकार के समक्ष चीन के साथ अपने संबंधों को संतुलित करने की चुनौती होगी, जो पाकिस्तान का सबसे करीबी सहयोगी है। अमेरिका-चीन संबंधों में सुधार के साथ, इससे पाकिस्तान को भी मदद मिलनी चाहिए।

एक विश्लेषक के मुताबिक, 'आगे सावधानीपूर्वक बातचीत, रणनीतिक दूरदर्शिता और मौजूदा गठबंधनों को बनाए रखने के लिए संतुलित दृष्टिकोण की आवश्यकता होगी, और नई साझेदारियां भी बनाई जाएंगी। यह समय ही बताएगा कि क्या यह अमेरिका-पाकिस्तान गठबंधन की मजबूती की शुरुआत है या कूटनीतिक प्राथमिकताओं में अस्थायी बदलाव है।' 

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