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अपने जाल में फंस गया पाकिस्तान

Thu, 04 Jan 2018 09:47 AM IST
हर्ष कक्कड़
हर्ष कक्कड़ Updated Thu, 04 Jan 2018 09:47 AM IST
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Pakistan stuck in his own net
डोनाल्ड ट्रंप

डोनाल्ड ट्रंप ने नव वर्ष के मौके पर ट्विट कर पाकिस्तान की काफी मलानत की है कि वह अमेरिकी फंड का दुरुपयोग करता रहा है और उसने अफगानिस्तान में आतंकवाद के खिलाफ युद्ध में कुछ नहीं किया। इससे आतंकवाद के खिलाफ उसकी फर्जी नीति एक बार  फिर चर्चा के केंद्र में है। उम्मीद के मुताबिक, पाकिस्तान ने पुराना राग अलापा है कि आतंकवाद के खिलाफ उसने जो कुछ किया, उतना किसी और देश ने नहीं किया है। अमेरिका ने पाकिस्तान को 25.5 करोड़ डॉलर की मदद भी रोक दी है।


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पाकिस्तान कभी यह स्पष्ट नहीं कर सका कि आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई किस तरह की है। जुलाई, 2007 में पाकिस्तानी सेना ने लाल मस्जिद को आतंकियों के कब्जे से छुड़ाने के लिए अभियान चलाया था, जिसमें सौ से अधिक लोग मारे गए थे। इनमें से अधिकांश पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिम प्रांत के थे। दरअसल लाल मस्जिद वह जगह है, जहां से आईएसआई कश्मीर और अफगानिस्तान के लिए आतंकियों की भर्ती करती रही। जिन कबायली नेताओं के समर्थकों की मौत हुई थी, उन्होंने बदला लेने की कसमें खाई थीं। 14 दिसंबर, 2007 को उत्तर पश्चिम के आतंकियों के गढ़ से ताल्लुक रखने वाले चालीस से अधिक आतंकी नेताओं ने हाथ मिलाया और तहरीक-ए-तालिबान (टीटीपी) का गठन किया। पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान की आजादी के लिए संघर्ष कर रहे गुट के साथ ही इस टीटीपी से भी जूझना पड़ रहा है। टीटीपी दरअसल उनका ही पैदा किया हुआ और आज उन पर ही भारी पड़ रहा है।
 
पाकिस्तान की सरकारी मशीनरी, जिसमें वहां की सेना, राजनीतिक वर्ग और विदेश विभाग शामिल है, इन सबने ट्रंप के बयान की आलोचना की है। पाकिस्तान को तो ट्रंप की इस कार्रवाई का अंदाजा पहले ही लगा लेना चाहिए था, जब हाल ही में अमेरिका के उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने अफगानिस्तान प्रवास के समय कहा था कि ट्रंप की नजर पाकिस्तान पर है। इसके बाद पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद की बैठक भी हुई है। इसके अलावा अमेरिकी राजदूत को तलब भी किया गया। भारत और अफगानिस्तान ने जहां ट्रंप के बयान का समर्थन किया, वहीं चीन ने पाकिस्तान का पक्ष लिया है। पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने तो यहां तक कहा कि उनका देश अमेरिका से मिले एक-एक पैसे का हिसाब दे सकता है।

यह जगजाहिर है कि अमेरिका को यह पता था कि पाकिस्तान अफगानिस्तान में उसके हितों के खिलाफ काम कर रहा था, मगर कराची बंदरगाह पर निर्भरता और इस उम्मीद में कि वह अपनी नीति बदल देगा, उसने यथास्थिति बनाए रखी। अमेरिका की वर्षों की चुप्पी ने पाकिस्तान को अपनी अच्छे और बुरे आतंकवादी समूह की नीति को जारी रखने का साहस दिया। हकीकत यह भी है कि अमेरिका को लश्करे तैयबा, हिजबुल मुजाहिदीन और जैश-ए मुहम्मद जैसे भारत विरोधी आतंकी गुटों की मौजूदगी की भी जानकारी रही है, लेकिन उसने इस ओर से लंबे समय तक आंखें मूंदे रखीं। पाकिस्तान की जमीन पर ओसामा बिन लादेन और मुल्ला मंसूर के मारे जाने के बाद भी पर्याप्त कार्रवाई किए जाने का आधार था, इसके बावजूद उसने यथास्थिति बनाए रखी।
 
अमेरिका अच्छी तरह से जानता है कि वह अफगानिस्तान में तब तक सफल नहीं हो सकता, जब तक कि पाकिस्तान उसका साथ न दे और आतंकी गुटों के सरगनाओं को अपनी जमीन से बेदखल न करे। अफगानिस्तान में अमेरिकी हवाई और ड्रोन हमलों से घिरने के बाद उन्हें बातचीत की मेज पर लाया जा सकता था। वार्ता के जरिये ही अमेरिका अफगानिस्तान में शांति कायम करने और अपनी वापसी की उम्मीद कर सकता है। हाल ही में पाकिस्तानी सेना ने कुछ अमेरिकी नागरिकों को हक्कानी गुट के कब्जे से छुड़ाया और उसने दावा किया कि यह संयुक्त अभियान था। जिस एक अपहरणकर्ता को जिंदा पकड़ा गया उससे अमेरिका पूछताछ करना चाहता था, मगर पाकिस्तान ने इससे इन्कार कर दिया, जिससे ट्रंप प्रशासन की नाराजगी बढ़ गई है।

अंत में ट्रंप ने लगता है कि सांड को काबू में कर लिया है और पाकिस्तान के खिलाफ एकतरफा कड़ी कार्रवाई करने का एलान कर दिया है। अमेरिका अब पाकिस्तान पर हर तरह का दबाव बनाने को तैयार है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जिस पर करीब-करीब अमेरिका का ही नियंत्रण है, वह पाकिस्तान को आर्थिक मदद कम कर देगा और कर्ज देने वाली दूसरी संस्थाएं भी ऐसा ही कदम उठा सकती हैं। पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार न्यूनतम स्तर पर है और उसने आईएमएफ से उसे उबारने के लिए मदद मांगी है। आईएमएफ उसकी मदद में कटौती तक सकता है। इसके बाद उसे गैर नाटो सहयोगियों की सूची से भी बाहर किया जा सकता है।

पाकिस्तान को बेशक, चीन से वांछित राजनयिक समर्थन मिल सकता है, मगर वह अपने ही बुने जाल में उलझता जा रहा है। यदि अब वह अमेरिका के दबाव में कोई कार्रवाई करता है, तो उसे उन्हीं टीटीपी जैसे गुटों की नाराजगी झेलनी पड़ेगी, जिन्हें पैदा ही उसने किया था। इससे पाकिस्तानी सेना की मुसीबत बढ़नी ही है, इससे वह कार्रवाई करने में देर कर सकता है।

आतंकी गुटों के खिलाफ कार्रवाई में देरी की एक वजह यह भी है कि पाकिस्तान अफगानिस्तान को भारत के नजरिये से देखता है। वह काबुल में तालिबान की अगुआई वाली सरकार का नियंत्रण चाहता है, ताकि वहां भारत की कोई भूमिका न हो। यह तभी हो सकता है, जब तालिबान और हक्कानी नेटवर्क मजबूत हों। ऐसे में पाकिस्तान यदि कार्रवाई में देर करता है, तो अमेरिका पाकिस्तान की सीमा पर आतंकी गुटों के शिविरों और नेताओं को निशाना बनाते हुए ड्रोन हमले तेज कर देगा। ऐसी कार्रवाई से वहां की आबादी को भी नुकसान होगा और पाकिस्तान सेना की छवि पर असर पड़ेगा कि वह अपने ही लोगों की रक्षा नहीं कर पा रही है। तब चीन भी पाकिस्तान का समर्थन नहीं करेगा। पाकिस्तान उलझता जा रहा है और उसे पता नहीं है कि वह इससे कैसे बाहर निकले।

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