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पड़ोस: चुनाव की दहलीज पर खड़े पाकिस्तान को चाहिए नौजवान लीडर

Sat, 09 Dec 2023 07:54 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Sat, 09 Dec 2023 07:54 AM IST
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सार
पाकिस्तान में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि 70 साल बाद अब वक्त आ गया है कि युवा आगे आकर बुजुर्ग पीढ़ी की जगह लें, क्योंकि वे उस मुल्क की चुनौतियों का समाधान ढूंढने में नाकाम रहे हैं, जहां की विशाल युवा आबादी की परेशानियां उनसे अलग हैं, जिनका सामना उनके पूर्वजों ने किया था।
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Pakistan needs young leaders to find solutions to challenges of country in upcoming election
Bilawal Bhutto Rally - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

इस वक्त भारत और पाकिस्तान, दोनों ही चुनावी मोड में हैं और आने वाले महीनों में भी यही हालात रहने वाले हैं। मैं इस विषय पर लिखने के बारे में सोच ही रही थी, कि मेरे दिमाग में एक सवाल कौंधा, और मेरी हंसी छूट गई कि ज्यादातर नेता अशिक्षित क्यों होते हैं और क्या इस स्थिति में बदलाव आने की कोई संभावना है? दुनिया भर में लोग ऐसे राजनेताओं से आजिज आ चुके हैं। हालांकि ज्यादातर पश्चिमी राजनेता शिक्षित हैं, और हमारे यहां भी युवा नेता शिक्षित हैं। हैरत की बात है कि अफगानिस्तान के भीतर तालिबान, जिनकी कई पीढ़ियां दशकों से अमेरिका से लड़ रही हैं, की पढ़ाई अमेरिका में हुई है और उनका बोलने का लहजा अब भी अमेरिकी है।



मगर मैं भारत और पाकिस्तान के नेताओं के जिस पहलू की ओर आपका ध्यान दिलाना चाहूंगी, वह है उनकी उम्र। मैंने पहली बार भारतीय राजनेताओं पर तब ध्यान देना शुरू किया, जब मैं आउटलुक इंडिया के लिए लिख रही थी, जिसके संपादक विनोद मेहता थे। मुझे तभी महसूस हुआ कि पाकिस्तान की तुलना में भारतीय राजनेता काफी उम्रदराज थे। उस वक्त के ज्यादातर भारतीय नेता सत्तर या अस्सी वर्ष के ही थे। उनमें से कुछ बेहतरीन शख्सियत वाले राजनेताओं से मैं मिली भी। मुझे उन बुजुर्ग नेताओं से कोई शिकायत नहीं थी। लेकिन विभाजन के बाद दो नए देशों के तौर पर, जो नए संस्थानों के साथ नई राजनीति शुरू कर रहे थे, पाकिस्तान में राजनेता अपेक्षाकृत युवा थे। संसद जैसे लोकतंत्र के ज्यादातर प्रतीक पाकिस्तान को भारत से विरासत में मिले थे। पाकिस्तान के पास वैसे भी लोकतांत्रिक संस्थान कम ही रहे।


पाकिस्तान में इस बात पर बहस छिड़ी हुई है कि 70 साल बाद अब वक्त आ गया है कि युवा पीढ़ी बुजुर्ग पीढ़ी की जगह ले, क्योंकि वे उस मुल्क की चुनौतियों का समाधान ढूंढने में नाकाम रहे हैं, जहां की विशाल युवा आबादी की परेशानियां उनसे अलग हैं, जिनका सामना उनके पूर्वजों ने किया था। इस संदर्भ में पहली आवाज पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो जरदारी ने उठाई, जिन्होंने एक चुनावी रैली में इमरान खान, अपने पिता आसिफ अली जरदारी, नवाज शरीफ, मौलाना फजलुर रहमान और अन्य बुजुर्ग नेताओं को नेतृत्व छोड़ने और युवा पीढ़ी को नेतृत्व करने के लिए मौका देने के लिए कहा। बिलावल की टिप्पणियों से पीपीपी के अंदर और बाहर तो खलबली मच ही गई, उनके पिता आसिफ अली जरदारी भी न केवल नाराज थे, बल्कि इस बात से भी काफी आहत दिखे कि उनके बेटे ने अपने बयानों से वरिष्ठ राजनेताओं को नाराज कर दिया है। लेकिन जरदारी की प्रतिक्रिया राजनीतिक ज्यादा थी, क्योंकि चुनावी मौसम शुरू हो चुका है और पार्टी गठबंधन एवं सीटों के समायोजन की संभावना है।

जरदारी यह भूल गए कि पिछली सरकार में विदेश मंत्री रहते हुए बिलावल एक मुद्दे पर अपनी सीट से उठकर खड़े हो गए थे और अध्यक्ष से कहा था कि अब समय आ गया है कि पुराने राजनेताओं को पीछे हट जाना चाहिए और उन्हें तथा पाकिस्तान मुस्लिम लीग (एन) की युवा नेत्री मरियम नवाज जैसे नेताओं को पार्टी का नेतृत्व करने देना चाहिए। उस वक्त जरदारी बिलावल की बगल में बैठकर सुनते रहे और चुप रहे थे। निचले सदन में बैठे पीपीपी सांसदों की ओर से कोई मेज नहीं थपथपाई गई। जैसा कि कहा जाता है- 'रात गई, बात गई' और जल्द ही बिलावल की टिप्पणी भुला दी गई। लेकिन इस बार जरदारी ने जोरदार मुखालफत करते हुए एक टीवी इंटरव्यू में कहा, 'बिलावल, अभी बच्चा है। वह राजनीति में पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं है और उसे गति पकड़ने में समय लगेगा। हम उसे प्रशिक्षण दे रहे हैं।' लेकिन जरदारी ने यह भी कहा कि बिलावल ज्यादा प्रतिभाशाली व शिक्षित हैं और मुझसे बेहतर बोलते हैं, लेकिन 'अनुभव तो अनुभव है'। जैसे ही जरदारी ने सार्वजनिक रूप से अपने उस बेटे के खिलाफ बोला, जो एक सम्मानित और बेहद सक्षम व लोकप्रिय विदेश मंत्री के रूप में लंबा समय बिता चुका है, अचानक राजनीतिक आतिशबाजी शुरू हो गई और जरदारी की टिप्पणी देश भर में सुर्खियां बन गई। जरदारी का बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।

अचानक कराची स्थित बिलावल हाउस से यह खबर आई कि बिलावल अचानक दुबई स्थित घर में रहने चले गए हैं। दरअसल, दुबई स्थित घर विशाल महल है, जो बिलावल की मां बेनजीर भुट्टो को संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के शेखों ने उपहार में दिया था, जब वह कई वर्षों के आत्म-निर्वासन के दौरान दुबई रहने चली गई थीं। यहां तक कि उनके निधन के बाद भी यूएई नेतृत्व ने परिवार से वह घर खाली करने के लिए नहीं कहा और जरदारी परिवार द्वारा इसका इस्तेमाल व्यक्तिगत और पार्टी वगैरह के लिए किया जाता है। जरदारी के इंटरव्यू के तुरंत बाद बिलावल ने सोशल मीडिया एक्स (पूर्व में ट्वीटर) की डीपी में अपनी तस्वीर बदल दी। उन्होंने अपनी एक बहुत पुरानी तस्वीर पोस्ट की, जब वह बहुत छोटे थे। तस्वीर में वह सोफे पर बैठे हुए हैं और अपनी मां बेनजीर भुट्टो को देख रहे हैं, जो झुककर उन्हें देखकर मुस्करा रही हैं। जरदारी और बिलावल, दोनों को बेहतर जानने वाले एक विश्लेषक ने कहा कि इसके जरिये बिलावल ने अपने पिता को जो संदेश दिया है, वह यह कि 'मैं बेनजीर भुट्टो का बेटा हूं।'

अगले ही दिन जरदारी भी पाकिस्तान से दुबई पहुंच गए और इस बात को लेकर काफी सवाल उठे कि पिता और पुत्र के बीच आखिर क्या हुआ। मीडिया की भारी दिलचस्पी को देखते हुए जरदारी की बड़ी बेटी बख्तावर भुट्टो ने तुरंत एक पारिवारिक तस्वीर सोशल मीडिया पर पोस्ट की, जिसमें बिलावल और जरदारी एक साथ खड़े हैं। लेकिन उस तस्वीर में जरदारी की छोटी बेटी असीफा भुट्टो नहीं हैं, जो अपने भाई के बहुत ही करीब है और पूरी तरह से बेनजीर भुट्टो जैसी दिखती हैं। पीपीपी की ओर से कोई कारण नहीं बताया गया है कि वह पारिवारिक तस्वीर से क्यों गायब थीं। मगर पिता-पुत्र की असहमति से अलग, मुझे लगता है कि बिलावल की यह मांग पूरी तरह से सही है कि युवा राजनेताओं की नई पीढ़ी को आगे बढ़कर पुराने राजनेताओं से कार्यभार लेकर नेतृत्व संभालना चाहिए। पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ (पीटीआई) के अध्यक्ष इमरान खान का दावा है कि वह पाकिस्तान के युवाओं के नेता हैं। लेकिन वह भूल जाते हैं कि वह 70 वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं। जाहिर है कि पीटीआई को भी युवा नेता की तलाश करने की जरूरत है।

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