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अपने गिरेबान में झांके पाकिस्तान

Mon, 11 May 2015 07:48 PM IST
कुलदीप तलवार
कुलदीप तलवार Updated Mon, 11 May 2015 07:48 PM IST
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Pakistan look his lapal

शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब पाकिस्तान भारत सरकार और फौज पर कश्मीरियों के मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप न लगाता हो। जबकि पाक अधिकृत गिलगित-बाल्टिस्तान की जनता में पाक शासन के खिलाफ लंबे अरसे से जबर्दस्त रोष है। वहां के लोग पाकिस्तान और चीन की चक्की के दो पाटों में फंसे कराह रहे हैं। पाकिस्तान ने 1963 में वहां का 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र चीन को दे दिया था।

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गिलगित-बाल्टिस्तान की आबादी लगभग 25 लाख है। इसमें शिया, सुन्नी और नूरबक्शी मुसलमान रहते हैं, जिनमें शिया आबादी सबसे ज्यादा है। जब भी वहां के शिया पाक के शिकंजे से निकलने के लिए आंदोलन करते हैं, आईएसआई शिया-सुन्नियों में फसाद कराकर आंदोलन को दबा देती है। शियाओं की शिकायत है कि इस्लाम की पुस्तकों में जो सामग्री पढ़ने को दी जाती है, उसमें शिया के उसूलों को नजरंदाज किया गया है। पर पाक सरकार इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रही। इसके अलावा वहां दूसरे प्रांत के लोगों, खासकर पंजाबियों, पठानों और चीनियों तक को बसा दिया गया है, ताकि मूल निवासी अल्पसंख्यक हो जाए। जबकि कानूनन उस क्षेत्र में बाहरी आदमी आकर बस नहीं सकता, न ही मकान-जायदाद खरीद सकता है। लेकिन इससे उलट पठानों, पंजाबियों और चीनियों ने स्थानीय व्यापार के अधिकांश हिस्से पर कब्जा कर लिया है। वहां चार से पांच हजार चीनी नागरिक भी बस गए हैं, और चीनी सैनिकों की मौजूदगी भी है, जिन्होंने स्थानीय लोगों का जीना मुश्किल कर दिया है।
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हाल ही में गिलगित-बाल्टिस्तान नेशनल कांफ्रेंस के निर्वासित नेता शिगे हुसनैन भारत आए थे। उनके मुताबिक, वहां शिक्षा का बुरा हाल है। छात्रों को जेल में डाल दिया जाता है और स्कूल में फायरिंग कराई जाती है। अगर उस क्षेत्र को खोल दिया जाए, तो मध्य एशिया तक पहुंचने के रास्ते छोटे हो जाएंगे। पर पाकिस्तान ऐसा नहीं चाहता। जब से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने चीन के मुस्लिम बहुल कशगर क्षेत्र को ग्वादर बंदरगाह से जोड़ने वाले एक आर्थिक व सामरिक गलियारे का निर्माण करने की घोषणा की है, जो गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरेगा, तब से वहां के लोगों की परेशानी और बढ़ गई है। उनकी चिंता है कि गलियारे के निर्माण के लिए हजारों चीनी कामगारों और इंजीनियरों को तैनात किया जाएगा, इससे उन्हें अपनी ही धरती पर काम नहीं मिलेगा। फिर काम खत्म होने पर बहुत से चीनी वापस नहीं जाएंगे। उन्हें डर यह भी है कि खुलेआम घूमते दहशतगर्द अगर चीनियों को निशाना बनाते हैं, जैसा कि उन्होंने ग्वादर बंदरगाह के दौरान किया था, तो शक की सूई इन बेबस लोगों की तरफ ही घूमेगी। वहां दहशतगर्दों के हौसले इतने बुलंद हैं कि वे इस क्षेत्र में सेना के हेलीकॉप्टरों को मिसाइलों से उड़ा रहे हैं। हाल ही में ऐसे एक हेलीकॉप्टर को उड़ा दिया गया, जिसमें नॉर्वे और फिलीपींस के राजदूत समेत सात लोगों की मौत हो गई।
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सच यह है कि पाक और चीन मिलकर वहां के संसाधनों को लूट रहे हैं। बलूचों की तरह गिलगिट-बाल्टिस्तान के लोग भी पाक के चंगुल से निकलना चाहते हैं। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार को चाहिए कि वह अंतरराष्ट्रीय मंचों से पर यहां के नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाएं, ताकि दुनिया को पता चले कि जम्मू-कश्मीर में मानवाधिकार की रट लगाता पाकिस्तान गिलगिट-बाल्टिस्तान के लोगों के साथ क्या सुलूक कर रहा है।

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