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पड़ोस: चुनाव की दहलीज पर चौतरफा संकट में पाकिस्तान, नई सरकार के लिए भीषण चुनौती पहले से तैयार

Wed, 31 Jan 2024 05:58 AM IST
kuldeep talwar कुलदीप तलवार
Updated Wed, 31 Jan 2024 05:58 AM IST
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सार
पहले भी केंद्र की सत्ता में रह चुकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो का दावा है कि उनकी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र रोटी, कपड़ा और मकान से ही जुड़ा हुआ है। यदि पीपीपी जीतती है, तो बिलावल ही प्रधानमंत्री का पद संभालेंगे। आम ख्याल यह है कि मतदाता पीपीपी को भरपूर वोट देंगे, क्योंकि इस पार्टी के नेताओं ने बड़ी कुर्बानियां दी हैं और पाकिस्तान के लोग उन्हें भूले नहीं हैं।
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Pakistan is in all-round crisis on threshold of elections
पाकिस्तान

विस्तार

पाकिस्तान में आगामी आठ फरवरी को आम चुनाव होने जा रहे हैं, जबकि देश की जनता भारी मुश्किलों में फंसी हुई है। वहां महंगाई आसमान छू रही है। जमाखोरी और मुनाफाखोरी बढ़ रही है। पाकिस्तान पर 63,399 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। चीन के अलावा कहीं और से उसे उधार भी नहीं मिल रहा है। पाकिस्तान ने जिन आतंकियों को पाला है, वे भी सक्रिय हैं। इसके अलावा पाकिस्तान ने भारत, ईरान और अफगानिस्तान जैसे अपने पड़ोसी देशों के साथ रिश्ते खराब कर लिए हैं, जिसके चलते उसकी मुश्किलें बढ़ रही हैं।



बताया जा रहा है कि चुनाव के मद्देनजर इस्लामाबाद की चार यूनिवर्सिटी को भी बंद कर दिया गया है। भारी संख्या में अर्ध सैनिक बल तैनात करके सुरक्षा के कड़े बंदोबस्त किए गए हैं। राजनीतिक पार्टियां जोर-जोर में प्रचार में लगी हुई हैं। पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) के मुखिया इमरान खान जेल में हैं। उनकी पार्टी का चुनाव चिह्न बल्ला छीन लिया गया है। उनके उम्मीदवार स्वतंत्र तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं।


पहले भी केंद्र की सत्ता में रह चुकी पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो का दावा है कि उनकी पार्टी का चुनावी घोषणा पत्र रोटी, कपड़ा और मकान से ही जुड़ा हुआ है। यदि पीपीपी जीतती है, तो बिलावल ही प्रधानमंत्री का पद संभालेंगे। आम ख्याल यह है कि मतदाता पीपीपी को भरपूर वोट देंगे, क्योंकि इस पार्टी के नेताओं ने बड़ी कुर्बानियां दी हैं और पाकिस्तान के लोग उन्हें भूले नहीं हैं। लेकिन दुनिया भर की निगाहें नवाज शरीफ पर लगी हैं, जिन्हें मुल्क की अदालतों ने भ्रष्टाचार के सभी आरोपों से बरी कर दिया है। बताया जाता है कि पाकिस्तान की सेना अनौपचारिक रूप से नवाज शरीफ का समर्थन कर रही है। यानी सेना किसी भी सूरत में नवाज शरीफ को सत्ता दिलाने की कोशिश करेगी। कुछ समय पहले नवाज शरीफ कह चुके हैं कि 'कश्मीर का मसला इस्लामाबाद शालीनता के साथ हल करना चाहता है। हमारे देश की समस्याएं न तो भारत की देन हैं और न अमेरिका की। हमने अपने पांव पर खुद ही कुल्हाड़ी मारी है।' मगर अब नवाज शरीफ की पार्टी मुस्लिम लीग (नवाज) ने जो चुनावी घोषणा पत्र जारी किया है, उसमें भारत से कश्मीर को लेकर अगस्त, 2019 का फैसला वापस लेने के लिए शर्त लगाई है, लेकिन उनकी यह शर्त कभी पूरी नहीं होगी। इस चुनावी गहमागहमी के बीच ईरान से पाकिस्तान की ठन गई है, जबकि कुछ दिनों पहले तक दोनों अच्छे मित्र थे। अचानक पाकिस्तानी आतंकवादियों ने ईरान पर मिसाइल से हमला कर दिया और फिर अगले दिन ईरान ने जवाबी कार्रवाई की। इससे दोनों देशों में जान-माल का भारी नुकसान हुआ। इसके तुरंत बाद दोनों ने इस विवाद को आपसी बातचीत से सुलझाने की घोषणा कर दी। इस घटना से पूरी दुनिया हैरान रह गई, क्योंकि ईरान सरकार को इस साल कई अंतरराष्ट्रीय विवादों से निपटना है।

भारत से तो पाकिस्तान के रिश्ते खराब हैं ही, अफगानिस्तान के साथ रिश्ते भी निचले स्तर पर पहुंच गए हैं। पाकिस्तान में करीब 40 लाख अफगान नागरिक हैं, जिनमें 17 लाख अवैध रूप से रह रहे हैं। पाकिस्तान ने अवैध अफगानियों को वापस भेजना शुरू कर दिया है और अब तक पांच लाख अफगानी वापस भेजे भी जा चुके हैं। चूंकि अफगानिस्तान की तालिबान सरकार के पास भी उनको खिलाने-रखने का माकूल इंतजाम नहीं है, इसलिए दोनों देशों के बीच तल्खी बढ़ी है। इसके अलावा दोनों मुल्कों के बीच तनाव का एक और कारण डूरंड रेखा है। डूरंड रेखा अफगानिस्तान व पाकिस्तान के बीच 2,430 किलोमीटर अंतरराष्ट्रीय सीमा है। पिछली सरकारों की तरह अफगान की मौजूदा सरकार डूरंड रेखा को सीमा के रूप में मान्यता देने की तैयार नहीं है। सीमा पर पाकिस्तानी सैनिकों और तालिबान के बीच अक्सर झड़पें होती रहती हैं। इसे हल किए बगैर दोनों देशों के संबंधों में सुधार नहीं आ पाएगा।

उम्मीद करनी चाहिए कि पाकिस्तान में जो नई सरकार सत्ता में आएगी, वह लोकतंत्र के नाम पर आतंक के घिनौने खेल को इजाजत नहीं देगी और जनता के गंभीर मसलों को दूर करेगी, अन्यथा पाकिस्तान में अस्थिरता व अनिश्चितता जारी रहेगी। अब देखना है कि पाकिस्तान की राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है!

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