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शहीद दिवस: भगत सिंह के हक में लाहौर से उठी आवाज, इम्तियाज रशीद कुरैशी बने चेहरा

Sudhir Vidhyarthi सुधीर विद्यार्थी
Updated Sat, 23 Mar 2024 07:34 AM IST
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सार
शहीद भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज रशीद कुरैशी शादमान चौक का नाम भगत सिंह चौक रखने की आवाज उठा रहे हैं।
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Pakistan Imtiaz Rashid Qureshi raising voice for renaming Shadman Chowk as Bhagat Singh Chowk in Lahore
भगत सिंह - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

वर्ष 1931 में लाहौर जेल में जिस जगह क्रांतिकारी भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी पर लटकाया गया था, वहां अब शादमान चौक है। बंटवारे के बाद पाकिस्तान की धरती पर इन इंकलाबियों का नामो-निशान मिटा दिया गया, जबकि यह शहर आजादी के योद्धाओं का बड़ा केंद्र था। 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान लाठी चार्ज में घायल लाला लाजपत राय की मृत्यु के बाद ‘हिंदुस्तान समाजवादी प्रजातंत्र संघ’ के क्रांतिकारी भगत सिंह और राजगुरु ने लाहौर में पुलिस अफसर सांडर्स को मार कर इसका बदला लिया और उन्होंने लाहौर की सड़कों पर ‘नौकरशाही सावधान!’ के पोस्टर भी चिपकाए। उसके बाद ‘लाहौर षड्यंत्र केस’ का प्रसिद्ध मुकदमा यहीं चला। उन्हीं दिनों क्रांतिकारी दल के सेनापति चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भगत सिंह को जेल से छुड़ाने की योजना बनी, लेकिन एक साथी के शहीद हो जाने की वजह से आजाद को वह योजना स्थगित करनी पड़ी। लाहौर में चले मुकदमे में भगत सिंह और उनके साथी को फांसी की सजा दे दी गई।


लाहौर का शादमान चौक भले ही अब भीड़-भरा चौराहा हो, लेकिन यहां इंकलाब की अनुगूंज अब भी मद्धिम नहीं पड़ी है, जबकि भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को 95 वर्ष बीत चुके हैं। यह हमारे इतिहास और संस्कृति की ताकत है कि 1947 में हुए देश के अप्राकृतिक विभाजन के बाद भी लाहौर ने भगत सिंह और उनके साथियों के अप्रतिम बलिदान को भुलाया नहीं है, बल्कि वहां के शहीद भगत सिंह मेमोरियल फाउंडेशन के अध्यक्ष इम्तियाज रशीद कुरैशी, एडवोकेट लाहौर हाईकोर्ट और उनके सहयोगी निरंतर इस मुहिम को जिंदा रखे हुए हैं।


कुरैशी ने ही सबसे पहले लाहौर उच्च न्यायालय में उस फैसले का विरोध किया था, जिसके तहत भगत सिंह को फांसी की सजा सुनाई गई थी। उनका कहना था कि सांडर्स को मारे जाने की जो प्रथम सूचना रिपोर्ट 17 दिसंबर, 1928 को थाना अनारकली में दर्ज की गई थी, उसमें भगत सिंह नामजद नहीं थे। यह अकाट्य है कि आजाद के नेतृत्व में राजगुरु और भगत सिंह ने सांडर्स को मारा था और उसमें आजाद सहित दल के अन्य सदस्य भी शामिल थे। भगत सिंह और राजगुरु जब सांडर्स को मारकर भागे, तो उनके पीछे पड़ने वाले पुलिस कॉन्स्टेबल चानन सिंह को खबरदार करने और फिर बात न मानने पर उसे गोली का निशाना बनाने वाले आजाद ही थे। इस क्रांतिकारी घटना के साक्षियों की संस्मृतियां भी यही साबित करती हैं।

ऐसे में, मेरा यह मानना रहा है कि एक बड़ी बेंच के सम्मुख भगत सिंह को निर्दोष साबित करने की न्यायिक मुहिम का अब कोई अर्थ नहीं है, बल्कि जरूरी यह है कि भगत सिंह के इंकलाबी सपने को जमीन पर उतारने के लिए उनके समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष विचारों को गति देने का बड़ा अभियान चलाया जाए, जिसमें लाहौर के लोग भी आगे आएं। कुरैशी अनेक वर्षों से लाहौर के शादमान चौक पर अपने कुछ मित्रों के साथ इकट्ठे होकर भगत सिंह को शहादत दिवस और उनके जन्मदिन के मौके पर याद करने से चूकते नहीं हैं, हालांकि ऐसा करने के लिए उन्हें निरंतर पाकिस्तानी कट्टपंथियों और प्रशासन से बड़ी लड़ाई लड़नी पड़ी है।

खुशी की बात है कि कुरैशी ने पांच नवंबर, 2018 को लाहौर उच्च न्यायालय से राज्य सरकार और जिला प्रशासन के लिए यह आदेश भी हासिल कर लिया कि शादमान चौक का नामकरण शहीद भगत सिंह के नाम पर कर दिया जाए, जबकि पाकिस्तान के कट्टरपंथी इसका लगातार विरोध कर रहे थे। पाकिस्तान में हम इसे इंकलाब के पैरोकारों की बड़ी जीत के तौर पर देख रहे हैं, जिसका श्रेय कुरैशी को जाता है।

नौकरशाही ने जब उच्च न्यायालय के आदेश का पालन नहीं किया, तो कुरैशी न्यायालय के आदेश की अवमानना का मुद्दा लेकर फिर अदालत जा पहुंचे। एक मार्च, 2024 को लाहौर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश शम्स महमूद मिर्जा ने ‘भगत सिंह चौक’ न बनाए जाने के मामले पर सुनवाई के बाद पश्चिमी पंजाब की सरकार के मुख्य सचिव जाहिद अख्तर जमान, डिप्टी कमिश्नर व प्रशासक लाहौर राफिया हैदर को अदालत की मानहानि याचिका के मद्देनजर 26 अप्रैल को पेश होने का नोटिस जारी किया है। यह कुरैशी की बड़ी जीत है। उम्मीद है कि उनकी यह मुहिम उस जगह को भगत सिंह चौक का नाम दे सकेगी, जहां ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने लाहौर जेल में बने उस समय के फांसीघर में उनसे जीने का अधिकार छीन लिया था।
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