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पाकिस्तान : अविश्वास प्रस्ताव से कैसे बचेंगे इमरान, राह में हर तरफ रोड़े और अस्थिर सरकार के मायने

Sat, 12 Mar 2022 03:13 AM IST
mariana babar मरिआना बाबर
Updated Sat, 12 Mar 2022 03:13 AM IST
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सार
प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान के पास जनरल बाजवा को दूसरा विस्तार देने से इनकार करने और नए सेना प्रमुख के नाम की घोषणा करने का अधिकार है। उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। जब उनसे मीडिया ने पूछा कि क्या वह एक नए सेना प्रमुख के नाम की घोषणा करने जा रहे हैं, तो इमरान खान ने जवाब दिया कि जनरल बाजवा के सेवानिवृत्त होने में अभी नवंबर तक का समय है और वह तब फैसला करेंगे।
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Pakistan: How will PM Imran Khan avoid no confidence motion, obstacles in the way and meaning of unstable government
इमरान खान(फाइल) - फोटो : पीटीआई

विस्तार

पाकिस्तान में अविश्वास प्रस्ताव कभी सफल नहीं हुआ, भले ही राष्ट्रपति और सुरक्षा प्रतिष्ठान ने मिलकर सदन के नेता को नेशनल एसेंबली से बाहर निकालने का प्रयास किया हो। 1989 में ताकवर राष्ट्रपति गुलाम इसहाक खान और सेनाध्यक्ष ने अपनी सारी शक्तियों के साथ यह सुनिश्चित करने की पूरी कोशिश की थी कि पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की अध्यक्ष और तत्कालीन प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित किया जाए। 



लेकिन वह प्रयास विफल हो गया और बेनजीर भुट्टो की सरकार तब तक अस्थिर रही, जब तक कि एक बार फिर राष्ट्रपति गुलाम इशाक खान ने संविधान 58-2बी में एक विशेष संशोधन का इस्तेमाल नहीं किया। इसने राष्ट्रपति को बेनजीर सरकार को बर्खास्त करने का अधिकार दे दिया। बाद में, अपने दूसरे कार्यकाल में जब बेनजीर भुट्टो ने अपने करीबी सहयोगी और विश्वासपात्र, फारूक लेघारी को नए राष्ट्रपति के रूप में लाया था, तो उन्होंने उन्हें धोखा दिया और उसी सांविधानिक संशोधन के जरिये उनकी सरकार को बर्खास्त कर दिया। 


वर्ष 2008 में जब बेनजीर भुट्टो की हत्या के बाद उनके पति आसिफ जरदारी पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने, तो उन्होंने सबसे पहला काम संविधान संशोधन 58-2बी को हटाने का किया था। वह एक साहसी और लोकतांत्रिक कदम था, खासकर जब पीपीपी ने अपना प्रधानमंत्री चुना था। इसलिए अब अविश्वास प्रस्ताव ही मौजूदा प्रधानमंत्री को हटाने का एकमात्र सांविधानिक तरीका है। पिछले दिनों पाकिस्तान में संयुक्त विपक्ष द्वारा सभापति कार्यालय में अविश्वास प्रस्ताव लाने का कदम प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए एक आश्चर्य और सदमे के रूप में आया है। 

विपक्षी नेताओं ने मीडिया को बताया कि लड़ाई जारी है। इसके साथ ही खबर है कि पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ लंदन से वापस पाकिस्तान लौट सकते हैं। विपक्ष से लिखित अनुरोध प्राप्त होने के चौदह दिनों के भीतर संसद का सत्र बुलाने के लिए सभापति कानून और संविधान द्वारा बाध्य हैं। सरकार संकेत दे रही है कि संसद के कक्षों का नवीनीकरण किया जा रहा है और इस्लामिक सम्मेलन संगठन के 23 मार्च के विशेष सत्र के लिए तैयार किया जा रहा है, इसलिए नेशनल असेंबली का सत्र नहीं बुलाया जा सकता है। 

यह सरकार की ओर से सिर्फ एक बहाना है, क्योंकि राजधानी इस्लामाबाद में और भी कई इमारतें हैं, जिन्हें स्पीकर नेशनल असेंबली घोषित कर सकते हैं और वहां सत्र बुलाया जा सकता है। लेकिन जिस सवाल का किसी के पास बहुत स्पष्ट जवाब नहीं है, वह यह है कि क्या सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा इमरान खान के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव के दौरान बिल्कुल तटस्थ रहने वाले हैं। उन्होंने इमरान खान को प्रधानमंत्री निवास में लाने और तीन साल तक समर्थन देने में प्रमुख भूमिका निभाई, लेकिन उसके बाद इस रिश्ते को इमरान खान ने ही खत्म कर दिया। 

जब उन्होंने एक नए आईएसआई प्रमुख के लिए अधिसूचना जारी करने से इनकार कर दिया, जिसे जनरल बाजवा चाहते थे। सेना प्रमुख के लिए अपने उच्चपदस्थ प्रमुख अधिकारियों को बदलते रहना एक नियमित मामला है और वर्षों से यह परंपरा रही है कि प्रधानमंत्री सैन्य मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते हैं। लेकिन इमरान खान पुराने आईएसआई प्रमुख को बरकरार रखना चाहते थे, जिन्होंने पिछले तीन साल से उन्हें कई राजनीतिक लड़ाइयां जीतने में मदद की थी।

प्रधानमंत्री के रूप में इमरान खान के पास जनरल बाजवा को दूसरा विस्तार देने से इनकार करने और नए सेना प्रमुख के नाम की घोषणा करने का अधिकार है। उन्हें कोई नहीं रोक सकता है। जब उनसे मीडिया ने पूछा कि क्या वह एक नए सेना प्रमुख के नाम की घोषणा करने जा रहे हैं, तो इमरान खान ने जवाब दिया कि जनरल बाजवा के सेवानिवृत्त होने में अभी नवंबर तक का समय है और वह तब फैसला करेंगे। जब हर कोई यह सवाल पूछ रहा था, तो इसका एक जवाब अंग्रेजी अखबार डॉन में आया। 

अखबार ने लिखा कि 'हालांकि मौजूदा संकट में सैन्य प्रतिष्ठान की संलिप्तता का कोई सबूत नहीं है। वास्तव में अपने सामान्य अभ्यास में उसे लोकतांत्रिक परंपराओं की खातिर राजनीति से अलग रहना चाहिए। आईएसआई प्रमुख की नियुक्ति को लेकर सेना के साथ प्रधानमंत्री के तनाव ने भी उनकी सरकार को कमजोर बना दिया है। उनके इस गैर-जरूरी बयान को, कि सेना प्रमुख के कार्यकाल विस्तार पर फैसला करने के लिए उनके पास नवंबर तक का समय है, इस संदर्भ में भी देखा जाता है।'

संयुक्त विपक्ष का कहना है कि अविश्वास प्रस्ताव को पारित कराने के लिए उनके पास जरूरत से अधिक संख्या बल है, क्योंकि सत्तारूढ़ तहरीक-ए इंसाफ पार्टी के दर्जनों सांसदों ने उनसे संपर्क किया है और वादा किया है कि वे इमरान खान के खिलाफ मतदान करेंगे। पाकिस्तान तहरीक-ए इंसाफ पार्टी के भीतर आंतरिक विद्रोह है, जहां पार्टी सदस्यों को लगता है कि वे पार्टी के टिकट पर अगला चुनाव नहीं जीत सकते, क्योंकि पार्टी लोगों के बीच बहुत अलोकप्रिय हो गई है। 

इसलिए उन्हें लगता है कि विपक्षी दलों से वादा करके उनसे टिकट पाना बेहतर है, जो बहुत मजबूत और मुल्क में लोकप्रिय है। यहां तक कि पंजाब जैसे सबसे अहम और ताकतवर प्रांत में भी (जहां अभी पीटीआई सरकार है) पार्टी के नेता मुख्यमंत्री के खिलाफ बगावत कर रहे हैं। पीटीआई सरकार अपना आधे से ज्यादा कार्यकाल पूरा कर चुकी है, लेकिन पार्टी का अंदरूनी विद्रोह विपक्षी गठबंधन की तुलना में सरकार के लिए बड़ी चुनौती पेश कर रहा है। 

ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री पार्टी के भीतर विद्रोह को शांत करने के लिए अपने चुने हुए पंजाब के मुख्यमंत्री, उस्मान बुजदार को हटाने के लिए तैयार हैं, लेकिन जब तक वह ऐसा करेंगे, तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। राजनीतिक विश्लेषक जाहिद हुसैन का मानना है कि 'अविश्वास मत का परिणाम देश में राजनीति के भविष्य को निर्धारित करेगा। पीटीआई सरकार को हटाने से मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता समाप्त नहीं हो सकती है। विपक्षी दलों के बीच अभी इस बात पर कोई सहमति नहीं है कि जब अविश्वास प्रस्ताव पारित हो जाएगा, तो उनका अगला कदम क्या होगा। दूसरी तरफ विपक्ष की हार से सरकार और अधिक निरंकुश हो सकती है।'

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