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पाकिस्तान का कबूलनामा: रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान से दोहरा चरित्र उजागर... भारत के दावे की भी पुष्टि
Sat, 26 Apr 2025 08:06 AM IST
ज्योति भास्कर
अमर उजाला, नई दिल्ली
अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Sat, 26 Apr 2025 08:06 AM IST
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पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ (फाइल)
- फोटो :
एएनआई
विस्तार
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ का बयान, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक रूप से कबूला है कि पाकिस्तान सरकार तीन दशकों से आतंकी संगठनों को समर्थन और प्रशिक्षण देने का ‘गंदा काम’ करती आई है, पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को तो उजागर करता ही है, भारत के उस दावे की भी पुष्टि करता है, जिसे वह दशकों से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोहराता आया है कि पाकिस्तान आतंकवाद का पनाहगाह है। यह कबूलनामा उस नीति की पोल भी खोलता है, जिसमें पाकिस्तान ने एक ओर खुद को आतंकवाद का शिकार बताया, वहीं दूसरी ओर आतंक को अपनी रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया।
चाहे वह अफगानिस्तान में तालिबान को समर्थन देना हो, या भारत के खिलाफ जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-ताइबा जैसे संगठनों को पनाह देना-पाकिस्तान की भूमिका हमेशा संदेह के घेरे में रही है।
पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का यह बयान पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद आया है, जिसकी जिम्मेदारी द रेजिस्टेंस फ्रंट (टीआरएफ) ने ली, जो पाकिस्तान समर्थित लश्कर-ए-ताइबा का एक मुखौटा संगठन है। पाकिस्तान ने अपनी आदत के अनुसार इस हमले के पीछे भारत का हाथ होने के आरोप लगाकर मामले को और जटिल करने की कोशिश की, लेकिन यह कबूलनामा उसके दावों को खोखला ही साबित करता है। अलबत्ता यह बयान वैश्विक राजनीति और आतंकवाद के अंतर्संबंधों पर भी गंभीर सवालिया निशान लगाता है।
यह अमेरिका व पाकिस्तान के गठजोड़ की उस स्याह सच्चाई को भी उजागर करता है, जो दशकों से दक्षिण एशिया की शांति को निगलती रही है। यह पहला अवसर नहीं है, जब पाकिस्तान की भूमिका पर सवाल उठे हैं, पर यह पहली बार है, जब खुद पाकिस्तान के एक शीर्ष मंत्री ने माना कि उन्होंने विदेशी हितों-खासकर अमेरिका-की पूर्ति के लिए आंतकी संगठनों को समर्थन व धन मुहैया कराया था। यह दरअसल, उस राष्ट्र की आत्म-स्वीकृति है, जिसने हमेशा आतंकवाद को एक रणनीतिक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया।
आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में पाकिस्तान की यह स्वीकारोक्ति एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को उस सच्चाई से रू-ब-रू कराती है, जिसे भारत लंबे समय से उजागर करता आया है। भारत को इस कबूलनामे को एक कूटनीतिक अवसर के रूप में इस्तेमाल करते हुए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सशक्त ढंग से उठाना भी चाहिए। जब एक देश का रक्षा मंत्री खुद यह मान रहा है कि उनका देश ‘गंदा काम’ कर रहा था, तो फिर इस पर चुप्पी आतंकवाद को और बल देने वाली होगी।