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विरोध में नहीं होने के दुख

Thu, 03 Jan 2013 08:34 PM IST
प्रकाश पुरोहित
प्रकाश पुरोहित Updated Thu, 03 Jan 2013 08:34 PM IST
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pain of not against

अपनी सरकार हो, तो मुश्किल यह हो जाती है कि जुलूस, रैली और धरना-प्रदर्शन की आदत छूट जाती है। मन तो बार-बार हुड़सता है कि निकल पड़ें झंडे-डंडे लेकर, मगर फिर याद आता है कि किसके खिलाफ? हाथ-पैर और दिमाग में जंग लग जाता है, अगर ऐसे करतब करने को नहीं मिलें तो। कार्यकर्ता भी शिकायत करते रहते हैं कि बहुत दिन से कुछ प्रोग्राम नहीं हो रहा। मजा ही नहीं आ रहा है। गली-मोहल्ले वाले भी ताने कस देते हैं कि हो गई राजनीति...!

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सच बात तो यह है कि शहर में हर दिन ऐसे कारण बनते रहते हैं कि आप जब चाहें, मैदान में उतर आएं। बल्कि ऐसा भी लगता है कि मैदान में ही हैं और घर गए बहुत दिन हो गए हैं। टीवी टापते रहते हैं, अखबार भी जोड़-तोड़ कर पढ़ या समझ लेते हैं, मगर दिल्ली में क्या गड़बड़ी चल रही है, पल्ले ही नहीं पड़ता।
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जिस बात पर दिल्ली में हड़कंप मच जाता है, अपने को तो यहां भेजे में ही नहीं आती। अभी पिछले दिनों संसद पूरे समय जिस बात पर हिलती रही, अपनी समझ में नहीं आनी थी, सो नहीं आई! संसद की बहस भी सुनने की कोशिश की। चार-पांच मिनट में ही अपने खर्राटे उनके भाषण से भारी हो जाते थे। आश्चर्य होता है कि जो बात हमारे भेजे का दही कर रही है, उस पर नेता लोग बोले चले जा रहे हैं। पकड़-पकड़ कर बैठा रहे हैं पासवाले, मगर ऐसे अड़े हैं कि यदि नहीं बोले, तो न जाने, कौन-सा समझौता टूट जाएगा।
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वैसे यह गलत बात है कि अपनी सरकार हो तो आप बिना किसी वजह के धूम-धड़ाका भी नहीं कर सकते। वरना जब विपक्ष में थे, तो पूछते भी नहीं थे कि क्या मामला है और रैली, जुलूस, ज्ञापन कर आते थे। अब अगर जुलूस निकाल दो, तो मालूम पड़ा कि आपके निकलने की तैयारी हो रही है, क्योंकि आपने अपनी ही सरकार के खिलाफ जुलूस निकाल दिया।


तबादले-पोस्टिंग में पैसा तो है, मगर वो बात नहीं है। कार्यकर्ताओं को जोड़ने के लिए पैसा तो चाहिए, मगर पहले जरूरी है कि उनको किसी बहाने जमा तो किया जाए। अच्छा लगा कल! बात में तो दम नहीं था, मगर जुलूस दमदार था। सब मिल-जुल लिए इस बहाने, गेट-टुगेदर जैसा समझ लीजिए। चार साल में आदत बदली, सो बदली, चेहरे भी इतने बदल गए कि पहचानना मुश्किल, इसीलिए तो रोते हैं कि कुछ न कुछ होते रहना चाहिए, मिलना-जुलना हो जाता है!

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