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अवांछित होने का दर्द

Thu, 08 Mar 2018 07:10 PM IST
मनीषा सिंह
मनीषा सिंह Updated Thu, 08 Mar 2018 07:10 PM IST
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Pain of being unwanted
मनीषा सिंह

भारतीय समाज में एक अदद लड़के की चाह में लड़कियां पैदा की जाती हैं और फिर उन्हें 'अवांछनीय' कोटे में डाल दिया जाता है। वर्ष 2017-18 के आर्थिक सर्वे ने इस अंतर को बाकायदा दर्ज करते हुए बताया है कि देश में 2.1 करोड़ बेटियां ऐसी हैं, जिनके पैदा होने की उम्मीद उनके परिवारों ने नहीं की थी। इस सर्वेक्षण में अवांछित बेटियों के साथ 6.3 करोड़ 'गायब' बेटियों का आंकड़ा भी दिया गया है। यानी गर्भ में बेटी की सूचना मिलने पर देश में अब तक 6.3 करोड़ भ्रूण हत्याएं कराई गई हैं। पिछले कुछ दशकों में निकाले गए औसत के मुताबिक हर साल करीब 20 लाख ऐसी बेटियां गायब हो जाती हैं, जिनके मां-बाप उन्हें दुनिया में नहीं लाना चाहते। इन 'गायब' या 'अनचाही' बेटियों का असर देश के सामाजिक परिदृश्य पर इस तरह पड़ा कि उत्पादन क्षेत्र से जुड़े आर्थिक विकास में लैंगिक अनुपात बिगड़ गया है और महिला सशक्तिकरण का मुद्दा हाशिये पर चला गया है। देश के कार्य बल में महिलाओं की जो हिस्सेदारी 2005-06 में 36 फीसदी थी, वह 2015-16 में घटकर 24 प्रतिशत रह गई। ये हालात तब हैं, जब देश में 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' और सुकन्या समृद्धि जैसी योजनाओं के साथ सरकारी और निजी क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं को मातृत्व के लिए 26 सप्ताह का अवकाश देने और 50 से अधिक कर्मचारियों वाली फर्मों में क्रेच की सुविधा अनिवार्य की गई है। साफ है कि सरकारी स्तर पर महिला सशक्तिकरण की योजनाओं का तभी कुछ हासिल है, जब समाज के स्तर पर लड़कियों को अनचाहा मानने की प्रवृत्ति थमे।


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हमारे समाज में अब भी बेटियों को बोझ माना जाता है। वहां अब भी लड़के-लड़की का भेद जारी है और इस कारण गर्भ से ही बेटियों के साथ उपेक्षा व हिकारत शुरू हो जाती है। इस भेदभाव का ही परिणाम है कि 1991 में जहां राष्ट्रीय स्तर पर जन्मे लड़कों के मुकाबले लड़कियों की संख्या 42 लाख कम थी, वह अंतर 2001 में बढ़कर 71 लाख पहुंच गया था। बीते करीब डेढ़ दशक में आंकड़ों की यह खाई और गहरी हो चुकी है।

लैंगिक भेदभाव खत्म करने की दो शर्तें हैं। पहली यह कि महिलाओं को समुचित शिक्षा मिले और दूसरी, उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़े। राजनीति में तो स्त्रियों का दखल बढ़ा है, पर महिला आरक्षण विधेयक अब भी जिस तरह लोकसभा में अटका है, उससे संदेह होता है कि हमारा समाज महिलाओं को बराबरी पर लाने का इच्छुक नहीं है। महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण अहम है, पर स्त्री शिक्षा का समुचित प्रबंध भी जरूरी है। खाड़ी और उत्तर अफ्रीकी देशों में लंबे समय तक लैंगिक असमानता कायम रही, पर अब खाड़ी देशों ने महिलाओं को शिक्षा दिलाने में निवेश करना शुरू कर दिया है। नतीजतन संयुक्त अरब अमीरात में विश्वविद्यालय स्तर की उच्च शिक्षा में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। आगे चलकर इसका असर यह होगा कि महिलाएं अच्छे रोजगारों पर अपना आधिपत्य जमाएंगी।

भारत में भी हालात बदले जा सकते हैं, पर इसकी पहल समाज के स्तर पर करनी होगी। समाज को अपनी यह मानसिकता बदलनी होगी कि जो स्त्री घर से बाहर काम करने निकली है, उसका उद्देश्य घर और समाज में पुरुषों को नीचा दिखाना नहीं, घर-समाज में बराबरी का योगदान देना है। इसी तरह घरेलू कामकाज को कुशलता से निपटाने वाली महिलाओं के आर्थिक महत्व को समझने और श्रेय देने की जरूरत है। तभी लैंगिक असमानता की हालत में सुधार आ सकता है।

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