यह नया 'नॉर्मल' भयावह है, पी चिदंबरम का सरकार पर तीखा तंज
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परिवर्तन प्रकृति का नियम है। आज का भारत 1200 वीं या 1600 वीं सदी का भारत नहीं है, यह 17 फीसदी साक्षरता वाला भारत भी नहीं है, जब उसने 1947 में स्वतंत्रता हासिल की थी, न ही वह भारत है, जिसमें अर्थव्यवस्था के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण क्षेत्रों पर राज्य का नियंत्रण हो। कोई भी एक बदलाव नाटकीय रूप से देश की दिशा बदल सकता है। 1991 में डॉ. मनमोहन सिंह ने वित्त मंत्री के रूप में ऐसा काम किया, उस समय तक जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। उन्होंने लाइसेंसों और परमिट से संबंधित सारी जरूरतों को तकरीबन खत्म कर दिया। वाणिज्य मंत्री के रूप में मैंने नई विदेश व्यापार नीति की घोषणा की, जिसकी शुरुआत अप्रत्याशित तरीके (भारत के संदर्भ में) से इस एलान के साथ हुई कि 'आयात और निर्यात मुक्त हो जाएंगे'। दो चरणों वाले हस्तांतरण के साथ तीन नीतिगत घोषणाओं ने देश को नई और अपरिवर्तनीय दिशा की ओर मोड़ दिया।
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कुछ परिवर्तन समय के साथ होते हैं और उनकी ओर तभी ध्यान जाता है, जब उसका प्रभाव व्यापक रूप में होने लगता है। ऐसे अनेक उदाहरण हैंः क्या कोई बता सकता है कि किस तारीख को हर जगह नजर आने वाले एसटीडी/आईएसडी/पीसीओ के बोर्ड गायब हो गए? या किस दिन से श्रोताओं ने समाचार सुनने के लिए ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) को सुनना बंद कर दिया? या किस दिन से कॉलेज जाने वाली लड़कियों ने, यहां तक कि रूढ़िवादी दक्षिण तक में, साड़ी की जगह जींस या सलवार कमीज को अपना लिया?
गर्व का उभार
हर परिवर्तन एक 'न्यू नॉर्मल' यानी नई सामान्य स्थिति से परिचित करवाता है। जब सूचीबद्ध कंपनियों के बोर्ड के 17 फीसदी पदों पर महिलाएं काबिज हैं; जब रुपये में भुगतान करने वाला भारत से जारी किया गया क्रेडिट कार्ड हर देश में स्वीकार्य है; जब कोई भी व्यक्ति ट्रंक काल बुक करने की यातना से गुजरे बिना दुनिया में कहीं भी फोन पर बात कर सकता हो; जब कोई भी व्यक्ति ईएमआई पर कार, ट्रक या दुपहिया खरीद सकता हो; जब कोई भी व्यक्ति भोजन से लेकर दवा और कपड़ों तक खरीदने के ऑनलाइन ऑर्डर दे सकता हो और सामान उसके घर पर पहुंच जाए; जब कोई भी व्यक्ति मेडिकल बीमा खरीद सके और अस्पताल में भर्ती होने या किसी तरह की सर्जरी करवाने पर हुए उसके अधिकांश खर्च की इससे भरपाई हो सके; जब ग्रामीण भारत के खिलाड़ी भारतीय क्रिकेट टीम का हिस्सा बन जाएं; और जब भारतीय मूल के कार्यकारी गूगल, माइक्रोसॉफ्ट, आईबीएम, एडोबे, नोकिया, कॉग्निजेंट, मास्टरकार्ड, जेरॉक्स और रेकिट बेंकिसर के प्रमुख बन जाएं, तब हमारे दिलों में गर्व का उभार होता है।
कुछ 'न्यू नॉर्मल' असहज कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हो पाया हूं कि अदालतें वर्चुअल अदालतों में बदल जाएं और सारी सुनवाई वीडियो के जरिये करने लगें। नियमित आवेदन और छोटे मामले तो वर्चुअल अदालतों में सुने जा सकते हैं, लेकिन जब कानून से जुड़े बड़े सवाल हों या जटिल तथ्य हों, तो बहस और विश्लेषण की जरूरत पड़ती है, ऐसे में शारीरिक रूप से उपस्थित होकर सुनवाई करने का कोई विकल्प नहीं हो सकता। जज के साथ वकील की आंखों का संपर्क महत्वपूर्ण होता है। और यदि कोर्ट कई सदस्यों वाली पीठ हो, तो जजों की भाव-भंगिमाओं से वकील को महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश मिलते हैं।
परेशान करने वाले तथ्य
कुछ अन्य 'न्यू नॉर्मल' चिंता, भय या हताशा के रूप में परेशान करने वाले संदेश देते हैं। भारत में 'न्यू नॉर्मल' कुछ इस तरह से है-
-प्रधानमंत्री एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित किए बिना सरकार के प्रमुख के रूप में अपने दो कार्यकाल पूरा करेंगे।
-संसद में या सर्वदलीय बैठक में बोलने के अधिकार को माइक्रोफोन के 'म्यूट' बटन को एक अंगुली से दबाकर नियंत्रित किया जाएगा या उससे वंचित ही कर दिया जाएगा।
-एक वरिष्ठ नौकरशाह सार्वजनिक रूप से कहेगा 'टू मच डेमोक्रेसी' (बहुत अधिक लोकतंत्र) और उसे कोई नसीहत भी नहीं दी जाएगी।
-विशेष विवाह अधिनियम, जो कि अंतर धार्मिक विवाह को मंजूरी देता है, उसे चुपके से बदल दिया जाएगा और उसकी जगह एक ऐसा कानून आ जाएगा, जो अंतर धार्मिक जोड़े में से पुरुष को दंडित करेगा।
-निर्वाचित विधायकों के बहुमत से बनी सरकार बहुसंख्यक शासन में बदल जाएगी।
-मीडिया (या उसका बड़ा हिस्सा) को सत्तारूढ़ दल या तो नियंत्रित करेगा या झुकने को विवश कर देगा।
-वाचडॉग के रूप में काम करने के लिए स्थापित की गई संस्थाएं या तो रिक्तियों के कारण खोखली हो जाएंगी या फिर वहां वफादार सेवकों की भर्ती की जाएगी।
-कानून के समक्ष और न्याय तक पहुंच के मामले में कुछ लोग अन्य लोगों की तुलना में अधिक बराबर होंगे।
-चुनावी चंदे को सत्तारूढ़ दल नियंत्रित और संचालित करेगा।
-गैर सरकारी और गैर मुनाफा कमाने वाले संगठनों को दबाया जाएगा और देश से बाहर फेंक दिया जाएगा।
-जांच एजेंसियां और देशद्रोह विरोधी कानूनों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, लेखकों और कवियों धमकाने या जेल में डालने के लिए किया जाएगा।
-आर्थिक ताकत के एकाधिकारवाद को बढ़ावा दिया जाएगा और सक्रिय रूप से उसका समर्थन किया जाएगा।
क्या आपको गर्व है?
ऊपर दिए गए इन सारे उदाहरणों को एक साथ पढ़िए, इसमें दिए गए कुछ विशेषणों को पक्षपाती बताकर खारिज कर दीजिए और अपने दिल पर अपना हाथ रखकर अपनी चेतना को जगाइए और खुद से यह सवाल कीजिएः क्या मुझे इस नए नॉर्मल पर गर्व है, मेरा देश जिस ओर आगे बढ़ रहा है?
जरा उत्तर प्रदेश के कथित लव जिहाद विरोधी अध्यादेश पर गौर कीजिए, जिसे 28 नवंबर, 2020 को लागू किया गया है। महज 11 दिनों के भीतर इसके तहत पांच मामले दर्ज किए गए हैं। एक मामले में लड़की के परिवार ने पुलिस को बताया कि दोनों परिवार वालों ने विवाद सुलझा लिया है, लड़की ने एक अन्य लड़के से शादी कर ली है और परिवार ने कोई शिकायत भी दर्ज नहीं की है। फिर भी, लड़के के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई। एक अन्य मामले में प्राथमिकी दर्ज करने और गैरजमानती वारंट जारी करने के बाद पुलिस ने उसके समन का जवाब न देने पर लड़के के परिवार की संपत्ति जब्त करने की धमकी दी। कोई भी अंदाजा लगा सकता है कि उत्तर प्रदेश में दो युवाओं का प्रेम में पड़ना और शादी करना सबसे बड़ा अपराध है! हत्या, बलात्कार, हमला या चोरी से संबंधित बढ़ते मामलों की तुलना में मुख्यमंत्री और सारे पुलिस बल का ध्यान इसी ओर है, जिससे लोग उत्तर प्रदेश के इस 'न्यू नॉर्मल' के आदी हो गए हैं। उत्तर प्रदेश का यह 'न्यू नॉर्मल' भारत के लिए भी 'न्यू नॉर्मल ' बन सकता है। यह भयावह है।