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चिंता: इंसानों और जानवरों के बीच बढ़ते संघर्ष से कैसे मिलेगी निजात?

Tue, 13 Feb 2024 07:08 AM IST
शिव शरण शुक्ला सुभाष गुप्ता
सुभाष गुप्ता Published by: शिव शरण शुक्ला Updated Tue, 13 Feb 2024 07:08 AM IST
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सार
वनों की बहुलता वाला राज्य उत्तराखंड कई मामलों में अनूठा है। बाघ और गुलदारों की संख्या बढ़ने के साथ ही राज्य में स्नो लैपर्ड की तादाद में भी काफी वृद्धि दर्ज हुई है। केवल इतना ही होता, तो यह प्रकृति प्रेमियों के लिए खुशखबरी होती, पर वन्य जीवों की आबादी बढ़ने के साथ ही इंसानों से उनके टकराव का हिंसक होते जाना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। राज्य बनने के बाद से 2023 तक उत्तराखंड में बाघों व गुलदारों ने 514 से अधिक लोगों की जान ली है।
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ow to get rid of the increasing conflict between humans and animals?
तेंदुआ - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

उत्तराखंड में इंसान और वन्य जीवों का टकराव लगातार बढ़ रहा है। तेंदुए और बाघों के आक्रामक तेवर इस टकराव को खूनी बना रहे हैं। अब ये टकराव घर के आंगन में अकेले खेलते अबोध बालक को उठाकर ले जाने तक पहुंच चुके हैं। राजधानी देहरादून से लेकर राज्य के दूर के गांवों तक में बाघों और तेंदुओं (गुलदारों) का आतंक इस कदर बढ़ गया है कि देहरादून में वन विभाग की टीमों को रात में गश्त लगानी पड़ रही है और श्रीनगर में रात का कर्फ्यू लगा दिया गया है।



वनों की बहुलता वाला राज्य उत्तराखंड कई मामलों में अनूठा है। बाघ और गुलदारों की संख्या बढ़ने के साथ ही राज्य में स्नो लैपर्ड की तादाद में भी काफी वृद्धि दर्ज हुई है। केवल इतना ही होता, तो यह प्रकृति प्रेमियों के लिए खुशखबरी होती, पर वन्य जीवों की आबादी बढ़ने के साथ ही इंसानों से उनके टकराव का हिंसक होते जाना एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। राज्य बनने के बाद से 2023 तक उत्तराखंड में बाघों व गुलदारों ने 514 से अधिक लोगों की जान ली है। इस दौरान 1,850 से अधिक लोग वन्य जीवों के हमलों में घायल हुए हैं। भालुओं, हाथियों, जंगली सुअरों के हमलों में मारे जाने वालों की संख्या भी सैकड़ों में है। देहरादून में गुलदार के बार-बार घुस आने और कई इलाकों में हमलों की घटनाएं होने के कारण लोग दहशत में हैं। राजधानी देहरादून की घनी आबादी वाले इलाके गढ़ी कैंट, रेसकोर्स, धर्मपुर, एफआरआई, घंघोड़ा, कौलागढ़ आदि में गुलदार अक्सर घूमते देखे गए हैं। यही नहीं, गुलदार को जल्द पकड़ने की मांग को लेकर धरना-प्रदर्शन भी होने लगे हैं।


इस चुनौती से निपटने के लिए कोई प्रयास न किया गया हो, ऐसा भी नहीं है। वन्य जीवों के हमलों में जान गंवाने वाले लोगों के परिवारों को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि बढ़ाई गई है और वनों तथा वन्य जीव अभयारण्यों के नजदीक रहने वाले लोगों को जागरूक करने के लिए भी कदम उठाए गए हैं, पर टकराव कम होते नजर नहीं आते।

उत्तराखंड में गुलदारों की संख्या काफी बढ़ गई है। वर्ष 2015 में गुलदारों की संख्या 2,335 थी, जो 2023 तक 3,115 तक पहुंच चुकी है। इस बीच बाघों की आबादी बढ़कर 560 पहुंच गई है। वन विभाग के अधिकारी राज्य को विश्व में बाघों की आबादी के हिसाब से सबसे अधिक घनत्व वाला राज्य बताते हैं। विभागीय अधिकारियों के अनुसार, बीते 16 वर्षों में उत्तराखंड में बाघों की संख्या में 314 प्रतिशत इजाफा हुआ है।

मगर बाघ, गुलदार, हाथी, भालू और सांप जिस तरह लोगों की जान ले रहे हैं, वह इंसानों पर तो भारी पड़ ही रहा है, इन वन्य जीवों के लिए भी कम खतरा नहीं है। इंसानों से बढ़ते टकराव उनके लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं। जंगलों में वन्य जीवों का घनत्व बढ़ना और जंगलों के आसपास इंसानी आबादी में लगातार वृद्धि इस संघर्ष की एक बड़ी वजह मानी जा रही है। वन्य जीवों की आबादी बढ़ने पर गर्व करने के बजाय इस खूनी संघर्ष ने सरकार को भी चिंता में डाल दिया है। राज्य सरकार ने अब इसे रोकने के लिए नई रणनीति बनाई है। राज्य वन मंत्री सुबोध उनियाल कहते हैं कि जंगलों की सीमा पर बसे गांवों में स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था की जा रही है और बड़ी घास व झाड़ियों को काटने के लिए वन विभाग को मशीनें दी जा रही हैं। आम लोगों में जागरूकता लाए बगैर इस टकराव को नहीं रोका जा सकता। इसलिए जागरूकता लाने के लिए भी कई कदम उठाए गए हैं। जंगलों में कैमरा ट्रैप बढ़ा दिए गए हैं, ताकि वन्य जीवों की गतिविधियों पर नजर रखी जा सके। जहां गतिविधियां अधिक होंगी, उस क्षेत्र के लोगों को सर्तक कर दिया जाएगा। इसके साथ ही विभिन्न क्षेत्रों के जंगलों की वन्य जीव क्षमता का अध्ययन किया जा रहा है। विभिन्न जंगलों में वन्य जीवों का घनत्व जानने के बाद यह तय किया जाएगा कि किस क्षेत्र से किस जीव को शिफ्ट करना है या कोई दूसरा उपाय किया जाना है।

-लेखक वरिष्ठ पत्रकार और देहरादून में पत्रकारिता के प्रोफेसर हैं।

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