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जाति के दायरे से निकलकर
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 03 Jan 2013 12:24 AM IST
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भारत ही नहीं, दुनिया के सभी धर्मग्रंथों में 'सभी मानव समान हैं' की सीख दी गई है। इन ग्रंथों में बताया गया है कि मानव-मानव में विभेद करने से उस समाज का निर्माण नहीं किया जा सकता, जहां प्रभु आसानी से विचरण कर सकें। इसी से जुड़ा एक प्रसंग भक्त नरसी मेहता से संबंधित है, जो जूनागढ़ में गृहस्थ जीवन बिताते हुए पूजा-उपासना तथा रोगियों की सेवा में लगे रहते थे।
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एक दिन एक जाटव कुलोत्पन्न भक्त ने उनसे पूछा, क्या आप मेरे घर पधार कर, संकीर्तन कर उसे पवित्र कर सकते हैं? मेहता जी ने कहा, क्यों नहीं, तुम तैयारी करो, मैं समय पर पहुंचकर वहां कीर्तन करूंगा। नरसी मेहता हरिजन के घर पहुंचे। उन्होंने तन्मय होकर संकीर्तन किया और प्रसाद ग्रहण किया। उनकी जाति के कुछ रूढ़िवादी नागर ब्राह्मणों को जब यह पता चला, तो उन्होंने पंचायत कर नरसी मेहता को अंत्यज (जाटव) के घर कीर्तन करने के आरोप में जाति से बहिष्कृत कर दिया।
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नरसी मेहता ने नागर जाति के मुखिया से विनम्रता से कहा, भगवद्भक्तों की कोई जाति नहीं होती। जो भी एक साथ संकीर्तन करते हैं, वे सब एकाकार होकर एक जाति के हो जाते हैं। आप लोगों ने मुझे केवल एक जाति के दायरे से निकालकर सचमुच में मुझ पर बड़ा उपकार किया है। मैं आप सबका आभारी हूं। मुखिया नरसी जी का मुंह देखता रह गया।
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