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खेलों में हमारी हिस्सेदारी

Fri, 14 Sep 2012 03:56 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Fri, 14 Sep 2012 03:56 PM IST
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our stake in games
ओलंपिक का मौसम आते ही मेरा मन उदास हो जाता है। जब मैं यह देखती हूं कि भारत की टीम में अधिकारी ज्यादा और खिलाड़ी कम हैं, तो तकलीफ होती है, मगर उससे ज्यादा तकलीफ इसलिए कि अगर भारत को एक-दो सोने के पदक मिलते भी हैं, तो हम इसको बड़ी जीत मानेंगे। हम यह नहीं स्वीकार करेंगे कि सवा सौ करोड़ की आबादी के इस देश के लिए ओलंपिक में इतने थोड़े मेडल मिलना शर्म की बात है, खुशी की नहीं। सबसे ज्यादा उदासी मुझे यह सोचकर होती है कि हमारा यह हाल न होता, अगर हमने आम लोगों को वे मौके दिए होते, जो अन्य देशों में दिए जाते हैं। खास तौर पर काबिल खिलाड़ियों को।
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मिसाल के तौर पर अगर हमे तैराकी में स्वर्ण पदक जीतने हों, तो हम उन बच्चों को ढूंढकर प्रशिक्षण क्यों नहीं देते, जो छोटी उम्र में ही दो पैसे कमाने के लिए पुरानी बावलियों में कूदने का काम करते हैं। फतेहपुर सिकरी जैसी जगहों पर मैंने गहरी बावलियों में बच्चों को कूदते देखा है और हैरान रह गई हूं उनका हुनर देखकर। घुड़सवारी में अगर जीतने हैं मेडल, तो हम क्यों नहीं उन घोड़ीवालों के बच्चों को ट्रेनिंग देने काम करते हैं, जो बचपन में ही सीख जाते हैं पहाड़ों और जंगलों में घुड़सवारी करना? और जिमनास्टिक्स में मेडल जीतने हैं, तो क्यों नहीं बाजीगरों के बच्चों को प्रशिक्षण देते हैं, जो बचपन में सीख जाते हैं कच्ची रस्सियों पर कलाबाजी करना। हर तरह के खेलों में इस तरह की सैकड़ों मिसालें मिल जाएंगी और ऐसे राजनेता भी मिल जाते हैं, जो दशकों से ऐसी बातें करते आए हैं।
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मुझे याद है एक पुरानी बात, जो मैंने बहुत साल पहले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय हेमवती नंदन बहुगुणा से सुनी थी। उस समय बहुगुणा जी दिल्ली में केंद्रीय मंत्री थे और तब भी ओलंपिक खेल हो रहे थे। भारत की टीम, जैसे अकसर होता था, खाली हाथ मुंह लटकाए लौटी थी और इसका जिक्र मैंने जब किया, तो बहुगुणा जी थोड़े जज्बाती होकर कहने लगे कि हम खिलाड़ियों को गांवों में नहीं, शहरों में ढूंढते हैं और यही है सारी समस्या की जड़। उन्होंने कहा, 'हमारे गांवों में जो लोग रहते हैं, उनको परिश्रम की आदत बचपन से ही होती है। ऊपर से वे हट्टे-कट्टे भी ज्यादा होते हैं शहरी लोगों से, लेकिन उनको कोई पूछता ही नहीं है। उनको मालूम ही नहीं होता कि ओलंपिक नाम की कोई चीज है। 'बिलकुल ठीक कहा था बहुगुणा जी ने।
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चीन, रूस, अमेरिका जैसे देशों की टीमें ढेरों मेडल इकट्ठा करते लौटती हैं ओलंपिक से सिर्फ इसलिए कि जब खिलाड़ियों को ढूंढने निकलते हैं वहां के खेल अधिकारी, तो शहरों तक नहीं सीमित रखते। भारत जैसे देश में, जहां 70 फीसदी जनता देहातों में रहती है, और भी आवश्यकता है खिलाड़ियों की खोज को शहरों से आगे ले जाने की। ऐसा इसलिए है, क्योंकि खेल क्षेत्र पर वर्षों से ऐसे राजनीतिकों और अधिकारियों का कब्जा हो गया है, जिन्होंने इसे व्यवसाय का साधन बना लिया है। कॉमनवेल्थ खेलों के घोटालों की जिम्मेदारी हमने सुरेश कलमाडी के सिर थोपकर उन्हें खलनायक बनाकर तिहाड़ की हवा खाने के लिए भेज दिया, लेकिन जो असली खलनायक थे, वे दंडित नहीं हुए हैं आज तक। खेल मंत्री के खिलाफ क्यों नहीं हुई कार्रवाई?

दिल्ली सरकार के उन मंत्रियों के खिलाफ क्यों नहीं कार्रवाई हुई, जिनकी जिम्मेदारी थी खेल गांव और स्टेडियम वक्त पर तैयार करने की? जब आई है बात स्टेडियमों की, तो यह भी कहना जरूरी हो जाता है कि खेलों के खत्म हो जाने के बाद हम इन्हें खंडहर बन जाने देते हैं, लेकिन आम आदमी को अंदर घुसने तक नहीं देते। जिन देशों को ओलंपिक्स में मिलते हैं ढेरों मेडल, उनके खिलाड़ियों को बाइज्जत बुलाया जाता है स्टेडियमों में। उन्हें प्रशिक्षण और पोषण की हर तरह की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। जब तक भारत के गांवों और छोटे शहरों में नहीं बनते हैं ऐसे स्टेडियम जिनमें छोटे बच्चे भी आसानी से अपनी ट्रेनिंग कर सकें, तब तक हमको ओलंपिक में शानदार प्रदर्शन करने का सपना भी भूल जाना चाहिए।


मेरा तो यह मानना है कि जब तक हर खेल के लिए हम तैयार न कर सकें बेहतर खिलाड़ी, हमें ओलंपिक से दूर रहना चाहिए। बेहतर होगा तब तक अगर हम उन स्टेडियमों और प्रशिक्षण केंद्रों के निर्माण पर ध्यान देने का काम करें, जिनके अभाव के कारण देश का झंडा झुक जाता है हर बार ओलंपिक जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में। आखिर में यही कहूंगी कि जब एक स्वर्ण पदक मिलने के बाद टीवी पत्रकार पागलों की तरह उछलना शुरू करते हैं, मुझे बहुत शर्म आती है, क्योंकि छोटे छोटे देश भी हमसे ज्यादा कमाल करते हैं ओलंपिक में।
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