फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Our responsibility towards nature and the 'smartness' of the national media on issues related to life

ग्रेट निकोबार द्वीप: प्रकृति को लेकर हमारी जिम्मेदारी और जीवन से जुड़े मसलों पर राष्ट्रीय मीडिया की 'होशियारी'

Sun, 06 Apr 2025 07:19 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 06 Apr 2025 07:19 AM IST
विज्ञापन
सार
पारिस्थितिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो ग्रेट निकोबार परियोजना से द्वीप के मूल निवासी हाशिए पर चले जाएंगे। पौधों, कीड़ों, पक्षियों, जानवरों और सरीसृपों की कई दुर्लभ और स्थानिक प्रजातियां तथा इनके प्राकृतिक आवास खतरे में आ जाएंगे।
 
loader
Our responsibility towards nature and the 'smartness' of the national media on issues related to life
सांकेतिक तस्वीर। - फोटो : Freepic

विस्तार

सार्वजनिक चर्चा में ‘राष्ट्रीय मीडिया’ से ज्यादा भ्रामक कोई भी शब्द नहीं है, क्योंकि इस श्रेणी में आने वाले अखबार, पत्रिकाएं और टीवी चैनल उस राष्ट्र के बारे में संकीर्ण दृष्टिकोण रखते हैं, जिसका वे प्रतिनिधित्व करने का दावा करते हैं। वे भारत को राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र या एनसीआर से ही सबकुछ देखते हैं। सत्ता से उनकी भौगोलिक निकटता उन्हें लुभाती भी है और संतुष्ट भी करती है, इसलिए अखबारों की राय वाले पन्नों पर कैबिनेट मंत्रियों द्वारा उपदेशात्मक लेखों की भरमार रहती है और टेलीविजन पर भारत की विविधता और जटिलता को विभिन्न दलों के राजनेताओं के बीच शोरगुल में बदल दिया जाता है।



पिछले कुछ सालों में ‘राष्ट्रीय मीडिया’ के बारे में मेरा संदेह लगातार बढ़ता गया है। हाल ही में सामने आए एक राष्ट्रीय मुद्दे और इससे जुड़ी अनियमितताओं पर लेखों के दो बेहतरीन संकलनों से इसकी पुष्टि हुई। ऐसी अनियमितता कभी भी टेलीविजन स्टूडियो के बहस का विषय नहीं हो सकती है। जिस अनियमितता के बारे में मैं बात कर रहा हूं, वह ग्रेट निकोबार द्वीप के नियोजित विनाश से संबंधित है। इसके बारे में मैंने फ्रंटलाइन पत्रिका के मार्च में छपे विशेष अंक तथा पंकज सेखसरिया द्वारा संकलित एक पुस्तक में पढ़ा है। इस संग्रह का नाम है- ‘द ग्रेट निकोबार बिट्रेयल’ और इसका उपशीर्षक है- ‘जान-बूझकर एक कमजोर द्वीप को आपदा की ओर धकेलना’। सेखसरिया ने स्वयं कई सालों तक अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में रहकर शोध किया है और उनके द्वारा संकलित पुस्तक के योगदानकर्ताओं को भी उस क्षेत्र का पूरा ज्ञान है।


इस निबंध में केंद्र सरकार के जिस प्रोजेक्ट के निहितार्थों को उजागर किया गया है, उसका नाम ऑरवेलियन है- ‘ग्रेट निकोबार द्वीप का समग्र विकास’। इस परियोजना की वर्तमान लागत 80 हजार करोड़ रुपये आंकी गई है और उम्मीद है कि यह निश्चित रूप से बढ़ेगी। इस लागत में द्वीप पर एक ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, एक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा और एक टाउनशिप का निर्माण करने की योजना बनाई गई है। इस टाउनशिप में कई लाख लोगों को बसाया जाएगा।

करीब 910 वर्ग किलोमीटर में फैला ग्रेट निकोबार, निकोबार द्वीप समूह का सबसे बड़ा द्वीप है। गौर करने वाली बात यह है कि द्वीप भूकंप प्रभावित क्षेत्र में शामिल है, जो पिछले दशक में करीब 400 से ज्यादा भूकंप के झटके झेल चुका है। 2004 में आई सुनामी में ग्रेट निकोबार पूरी तरह से तबाह हो गया था, जिसके दुष्परिणाम द्वीप पर रहने वाले आदिवासियों को भुगतने पड़े थे। इस सुनामी के कारण सैकड़ों लोग मारे गए थे और अनेक बेघर हो गए थे।सुनामी अप्रत्याशित थी। ऐसे में यह नई परियोजना द्वीप की प्राकृतिक और सांस्कृतिक अखंडता के लिए खतरनाक है। बंदरगाह का निर्माण विशालकाय कछुए के घोंसलों को नष्ट करने के अलावा पारिस्थितिकी को अत्यधिक नुकसान पहुंचा कर किया जाएगा। यह टाउनशिप लगभग 130 वर्ग किलोमीटर में फैले   हरे-भरे जंगल को नष्ट कर देगी, जिसमें 10 मिलियन से अधिक पेड़ हैं। इस द्वीप पर पौधों, कीड़ों, पक्षियों, जानवरों और सरीसृपों की कई दुर्लभ तथा स्थानिक प्रजातियां हैं। अब ये सभी खतरे में हैं, साथ ही   इनके जलीय और स्थलीय प्राकृतिक आवास भी खतरे में हैं।

यह सभी पारिस्थितिकी की कीमत पर होगा। सामाजिक रूप से देखा जाए तो द्वीप के मूल निवासी हाशिए पर चले जाएंगे, जो जनजातीय समुदायों की रक्षा करने वाले सांविधानिक प्रावधानों का घोर उल्लंघन है। वर्तमान में इस द्वीप की आबादी 8,500 है। अगर परियोजना पूरी गति के साथ चलती है तो इसके 40 गुना बढ़ने की संभावना है, जिसका प्रभाव द्वीप की संस्कृति तथा पर्यावरण पर बड़ा और अपरिवर्तनीय होगा।

द्वीपों के बारे में विशिष्ट जानकारी रखने वाले अजय सैनी और अन्विता अब्बी द्वारा हाल ही में लिखे गए लेख में बताया गया है कि “ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट सिर्फ एक पारिस्थितिक तबाही नहीं है, बल्कि यह विकास के नाम पर भाषाई और सांस्कृतिक विनाश जैसा काम है।”
‘द ग्रेट निकोबार बिट्रेयल’ में लिखे लेख में पर्यावरण संरक्षणकर्ता मनीष चांडी ने 1990 के दशक में द्वीप पर अपनी पहली यात्रा और प्रतिभाशाली पक्षी विज्ञानी रवि शंकरन से मुलाकात का जिक्र किया है। शंकरन ने यहां कहा है, “याद रखें, यह उनकी भूमि है। ऐसे में उनके अधिकार हमारे अधिकारों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।” महंगी और विनाशकारी परियोजना को क्रियान्वित करने वालों ने इस सलाह को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया है। यह एक ऐसी परियोजना है, जिसे केंद्र सरकार ने बिना किसी पारदर्शिता, जवाबदेही और सबसे अधिक प्रभावित होने वाले भारतीयों के साथ बिना परामर्श के तैयार किया है।

आर्थिक आधार पर भी इसे उचित नहीं ठहराया जा सकता है। फ्रंटलाइन में प्रकाशित एक लेख में एम राजशेखर ने कहा कि राज्य में बंदरगाह और पर्यटन से होने वाली संभावित आय बहुत ही कम है। ऐसे में परियोजना आर्थिक रूप से भी व्यवहार्य नहीं है। इन निबंधों को पढ़ते हुए मैं पारिस्थितिकी की रक्षा और विकास को बढ़ावा देने के लिए नियुक्त सार्वजनिक संस्थाओं के निर्णय से स्तब्ध रह गया। सेखसरिया द्वारा संपादित निबंधों और फ्रंटलाइन के विशेष अंक में विस्तार से बताया गया है कि किस तरह राष्ट्रीय हरित अधिकरण, पर्यावरण एवं वन मंत्रालय, भारतीय वन्यजीव संस्थान, नीति आयोग और जनजातीय मामलों के मंत्रालय ने जमीनी स्तर पर बिना तथ्यों का आकलन किए जल्दबाजी में इसे मंजूरी दे दी। इसमें कुछ प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों की भी सहमति है।
सेखसरिया ‘बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी’ के एक पूर्व निदेशक के हवाले से कहते हैं कि 2018 के एक लेख में उन्होंने इस परियोजना को ‘सबसे अधिक चिंताजनक’ बताया था और भविष्यवाणी की थी कि यदि इसे लागू किया गया तो यह समुद्री जैव विविधता के लिए विनाश का कारण बनेगी। वैज्ञानिकों ने इस परियोजना पर रोक लगाने की बात कही है, ताकि ग्रेट निकोबार जैसे द्वीप अपनी जैव विविधता और आंतरिक पारिस्थितिक मूल्यों के लिए संरक्षित बने रहें। कुछ साल बाद जब वह सरकारी समिति के अध्यक्ष बने तो उसी वैज्ञानिक ने इस प्रोजेक्ट को मंजूरी दी, जिसने इसे विनाशकारी बताया था।

हालांकि कुछ युवा वैज्ञानिक पूरी तरह से आजाद और स्पष्ट हैं। फ्रंटलाइन के बारह पन्नों के विश्लेषण में पारिस्थितिकीविद रोहन आर्थर और टीआर शंकर रमन ने द्वीप की समृद्ध जैव विविधता का दस्तावेजीकरण किया है और आदिवासी समुदायों तथा उनके प्राकृतिक परिवेश के बीच गहरे संबंधों का वर्णन किया है। उन्होंने अपने निष्कर्ष के आधार पर इस बात पर जोर दिया कि “एक वैज्ञानिक समुदाय के रूप में यह हमारा कर्तव्य है कि हम योजनाबद्ध पारिस्थितिकीय तबाही को उपशामक उपायों के साथ मान्य न करें।”

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed