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दरक रही है हमारी छवि

तवलीन सिंह Updated Mon, 28 Jan 2013 09:25 AM IST
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दावोस पहुंची इस बार, तो पहले दिन से ही लोगों ने मुझसे पूछना शुरू किया निर्भया के बारे में। महिलाओं में खास असर दिखा उसकी दास्तान का। मेरी एक पुरानी स्विस दोस्त ने इन शब्दों में बात छेड़ी मुझसे मिलते ही, क्या दंडित होंगे वे लोग, जिन्होंने ऐसा किया उस लड़की के साथ? क्या यह बात सच है कि भारत में लड़कियों के साथ अक्सर ऐसा होता है और दंडित कभी नहीं होते हैं बलात्कारी?
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मैंने जब पूछा कि ये बातें उसको कैसे मालूम हुई, तो उसने बताया कि 16 दिसंबर की घटना के बाद रोज स्विस टीवी पर निर्भया का हाल बताया जाता था और बातें होती थीं भारत में बलात्कार की घटनाओं की।

हम बातें ही कर रहे थे दावोस के एक रेस्टोरेंट में कि एक भारतीय उद्योगपति हमारे साथ आकर बैठ गए। भारत की बदनामी सुनते हुए खुद को रोक न सके। कहने लगे कि महिलाओं के साथ जुल्म हर मुल्क में होता है और बिल्कुल गलत होगा यह कहना कि सिर्फ भारत की महिलाओं के साथ इस तरह की घिनौनी घटनाएं घटती हैं।

इस पर मेरी दोस्त ने कहा, मानती हूं मैं कि महिलाओं के साथ जुल्म स्विट्जरलैंड में भी होता है, लेकिन जब पीड़ित महिला किसी पुलिस थाने में पहुंचती है, तो वहां उसके साथ गलत हरकतें नहीं होती हैं। क्या यह सही नहीं है कि बलात्कार पुलिस वाले खुद करते हैं?

निर्भया की कहानी ऐसे छू गई है लोगों के दिलों में कि रोज अखबारों में कुछ न कुछ छपता रहा है, जब से मैं आई हूं यहां। जस्टिस वर्मा की रिपोर्ट के बारे में पढ़ने को मिला और मालूम हुआ बीबीसी से कि जज साहब ने स्पष्ट कर दिया है कि समस्या कानून के कमजोर होने की नहीं है, समस्या है पुलिस कार्रवाई में संवेदनहीनता की, समस्या है न्याय होने में विलंब की।

यहां के किसी अखबार में पढ़ा कि बलात्कार के 95,000 मामले भारतीय अदालतों में अटके पड़े हैं और दिल्ली शहर में पिछले वर्ष 600 से ज्यादा बलात्कार के मामले दर्ज हुए, जिनमें से सिर्फ एक में न्याय हुआ है।

हर साल की तरह इस साल भी भारत के सबसे धनी उद्योगपति आए हैं दावोस और अपने कई वरिष्ठ मंत्री भी। हर साल की तरह इस साल भी लंबे चर्चे हो रहे हैं भारत की आर्थिक और राजनीतिक स्थिति की।

सबकी कोशिश है कि भारत को ऐसा पेश किया जाए कि विदेशी निवेशक आकर्षित होकर अपने देश में निवेश करने दौड़े-दौड़े आएं। लेकिन इस साल निर्भया की कहानी ने भारत के चेहरे पर ऐसा गहरा दाग छोड़ा है कि खूबियां कुछ छिप-सी गई हैं उस दाग के नीचे।

जहां जाती हूं, जिक्र घूम-फिरकर आ जाता है भारत की महिलाओं की स्थिति पर, और लोग कहना शुरू कर देते हैं कि जिस देश में महिलाओं के साथ ऐसा हो सकता है, और जिस देश में न्याय मिलने में दशकों लग सकते हैं, उस देश में निवेश क्या करना? सामाजिक और न्यायिक सुधार का साथ-साथ होना बहुत जरूरी है, और जब तक उनका अभाव रहेगा भारत में, तब तक भारत पूरी तरह से विकसित देश नहीं बन सकेगा।

कुछ साल पहले दावोस में भारत के बारे में सिर्फ अच्छी बातें हुआ करती थीं। यहां तक कि 2006 में एक ऐसा धमाकेदार आंदोलन किया गया भारत की छवि को चमकाने के मकसद से कि दावोस के बाजारों में हिंदी फिल्मों के गाने सुनने को मिले और यहां के रेस्टोरेंट भारतीय मसालों की खुशबू से भर गए थे। ऐसा लगता है कि निर्भया की कहानी ने उस पुराने भारत की यादें ताजा कर दी हैं, जिन्हें लोग भूल चुके थे। शायद हम भी भूल गए थे उस भारत को, और यह भी कि पिछले बीस वर्षों की समृद्धि के नीचे वह भारत आज भी वैसा ही जिंदा है।

माना कि तीस करोड़ लोगों को आज हम मध्यवर्ग में गिन सकते हैं, माना कि लोगों के पास सहूलियतें बढ़ी हैं, लेकिन निर्भया की कहानी ने हमको याद दिलाया है कि इन चीजों के आने के बावजूद देश की मानसिकता अभी बदली नहीं है। और न ही उन संस्थानों में आधुनिकता आई है, जिनकी जिम्मेदारी है आम आदमी और आम औरत की सुरक्षा करना। न्यायमूर्ति वर्मा कमेटी की रिपोर्ट पर अगर प्रधानमंत्री गंभीरता से अमल करना चाहते हैं, तो पहले तो पुलिस प्रशिक्षण में तब्दीली लाएं और उसके बाद न्यायिक सुधार के बारे में भी सोचें। 
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