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राम की कमी न हो जाए

Sun, 13 Oct 2013 05:28 PM IST
अशोक गौतम
अशोक गौतम Updated Sun, 13 Oct 2013 05:28 PM IST
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Otherwise lack of Ram

जब दशहरे वाले दिन रावण के रेडीमेड अंग-प्रत्यंग उठाए उनके मोहल्ले के लोग हमारे मोहल्ले की खाली जगह में आकर उसका अंग-अंग जोड़ने लगे, तो मैं दंग रह गया। मोहल्ले की दुनिया को देख-देखकर नजरें गंवाए चश्में तक पहुंचे बुजुर्गों को इस बारे में मैंने बताया, तो उन्होंने चुप्पी साध ली। मैंने काका के आगे हाथ जोड़कर कहा, अपने मोहल्ले में ले देकर सरकारी बंदे हैं ही कितने? हमारी नाक क्या मोहल्ले की नाक नहीं है? अगर आप यों ही इस मोहल्ले में रावण बनवाते रहे, तो अपना तो हौसला ही पस्त जाएगा! कहां तो आपको चाहिए कि आप हमारी हौसला अफजाई करें... और कहां आप...?

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और मेरे लाख विरोध के बाद भी दोपहर को ही मोहल्ले में पौना रावण खड़ा हो गया। पर वे जितनी बार रावण का सिर अकड़ से खड़ा करना चाह रहे थे, उसका सिर शर्म से उतना ही नीचे हो रहा था। जब वे रावण का सिर खड़ा करते-करते हार गए, तो मेरे पास आए, बोले, भाई साहब! हम तो थक गए इस पुतले रावण का सिर खड़ा करते-करते, पता नहीं यह अबके क्या हो रहा है? कुछ करो। आप पुलिस में हो। शायद आपसे डर जाए।  उधर दिल्ली से राम की रावण दहन यात्रा शुरू होने वाली है और एक यह रावण है कि...
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मैंने पुलिस की वर्दी पहनी और ड्यूटी पर हाजिर हो गया। जब मैं वर्दी पहन रावण के पास पहुंचा, तो मैं उसे देख कर हैरान रह गया! उसकी आंखों से पानी नहीं, खून के आंसू बह रहे थे। मैंने उससे पूछा, भाई साहब! ये क्या हो रहा है? अरे यहां तो लोग इतने संवेदनहीन हो गए हैं कि उनके पास अपने लिए भी आंसू नहीं बचे हैं और एक तुम हो कि हद से परे इमोशनल होकर खून के आंसू बहा रहे हो? वह कातर भाव में बोला, हे मेरे दोस्त! एक बात तो बताओ?
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मैंने कहा, पूछो, अगर उस समय कोई नामी वकील कर लेते, तो हर साल यह दिन न देखना पड़ता!

गंभीर होकर वह बोला, ये आज के रावण मुझसे कहीं ज्यादा बुरे नहीं हैं क्या मेरे दोस्त? खैर! रूपक के रूप में जलना, तो मुझे आज भी है, पर काश! मेरे हर बार जलने से तुम कुछ सीख पाते, तो मेरा जलना सार्थक होता! इसलिए मुझसे कुछ सीखो यार! कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में रोज रावण जलाने के लिए राम बाहर से मंगवाने पड़े!

मैं हैरान-परेशान उसे देख रहा था।

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