{"_id":"5c238710bdec2256d14f3e8b","slug":"opportunities-for-india-in-maldives","type":"story","status":"publish","title_hn":"मालदीव में भारत के लिए अवसर","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया","slug":"opinion"}}
मालदीव में भारत के लिए अवसर
Wed, 26 Dec 2018 07:20 PM IST
Nootan Gupta
आनंद कुमार
आनंद कुमार
Published by: Nootan Gupta
Updated Wed, 26 Dec 2018 07:20 PM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
मालदीव में भारत के लिए अवसर
भारत-मालदीव के द्विपक्षीय रिश्ते को पिछली अब्दुल्ला यामीन की सरकार में गहरा धक्का लगा था, लेकिन विपक्ष के संयुक्त उम्मीदवार इब्राहिम मोहम्मद सोलिह के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों के संबंध पटरी पर लौटते दिख रहे हैं। पिछली सरकार के दौरान हुए नुकसान की भरपाई और द्विपक्षीय रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के इरादे से सोलिह ने हाल ही में भारत की यात्रा भी की। इस यात्रा के जरिये उन्होंने यही संदेश देने की कोशिश की कि भारत और मालदीव करीबी पड़ोसी और साझेदार हैं और यामीन के कार्यकाल में जो कुछ हुआ वह अपवाद था।
राष्ट्रपति बनने के बाद सोलिह की यह पहली यात्रा थी, जिससे इसका महत्व समझा जा सकता है। मालदीव की नई सरकार गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है और उनकी यात्रा एक मकसद भारत से मदद हासिल करना भी था, ताकि नई सरकार स्थिरता ला सके। सत्ता संभालने के बाद सोलिह को यह एहसास हुआ कि यामीन के शासनकाल में हुए भारी भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के कारण सरकारी खजाना खाली पड़ा है। इससे भी बदतर यह कि यामीन ने चीन से भारी कर्ज ले रखे थे, जिसे वापस लौटाना मालदीव की नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
दरअसल यामीन ने चीन को अनेक आधारभूत संरचना से जुड़ी परियोजनाओं का ठेका बढ़ी हुई लागत के आधार पर दे रखा था। चीन वहां की राजधानी माले को वहां के हवाई अड्डे से, जो कि एक अन्य द्वीप हुलहुले में स्थित है, जोड़ने के लिए एक मील लंबे पुल का निर्माण कर रहा है। इसके अलावा वह वहां एयरपोर्ट के विस्तार और हुलहुले द्वीप में आवासीय परियोजना भी बना रहा है। इनकी वजह से मालदीव भारी कर्ज से लद गया। हालांकि मालदीव कर्ज की राशि हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अनुमान के मुताबिक उसका कुल कर्ज 3.7 अरब डॉलर के बराबर है और यह वहां की जीडीपी के 53 फीसदी के बराबर है। मालदीव पर चीन का 1.4 अरब डॉलर का कर्ज है।
इसका बड़ा हिस्सा यामीन द्वारा किए गए संदिग्ध ऋण समझौते से संबंधित है। चीन ने हाल के समय में खासतौर से बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) शुरू करने के बाद से भारी-भरकम आधारभूत संरचनाओं का निर्माण शुरू किया है, जिसके लागत का भुगतान करना संबंधित देशों के लिए भारी पड़ रहा है। इसी वजह से श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह से संबंधित परियोजना में कर्ज के बदले हिस्सेदारी देनी पड़ी।
मालदीव भी बीआरआई के कारण कर्ज से पीड़ित देश है। उसे इस बात का भी भय है कि चीन कर्ज को दबाव का हथियार बनाकर उसकी संप्रभुता का हनन कर सकता है। मालदीव की नई सरकार इस जटिल परिस्थिति से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। वह भारत से आर्थिक मदद चाहती है, ताकि अपने वित्तीय संकट को दूर कर सके। भारत ने जहां तक संभव हो मालदीव की मदद की है। उसने मालदीव को 1.4 अरब डॉलर का पैकेज दिया है, जिसमें से 20 करोड़ डॉलर बजटीय सहायता है। शेष राशि रियायती ऋण के रूप में है।
अब्दुल्ला यामीन के शासनकाल में भारत-मालदीव द्विपक्षीय संबंध बेहद तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच गया था। यामीन चीनियों के हाथों की कठपुतली बन गए थे। वह ऐसी नीतियों को आगे बढ़ा रहे थे, जिससे लगा मानो मालदीव के लोगों का भविष्य चीन के हाथ गिरवी में चला गया। एक आकलन के मुताबिक मालदीव के प्रत्येक नागरिक पर चीन का आठ हजार डॉलर कर्ज बकाया है। परियोजनाओं की बढ़ी लागत को यामीन ने यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की थी कि इन्हें बहुत कम समय में पूरा कर लिया गया। हालांकि वहां का संयुक्त विपक्ष मान ही रहा था कि इन परियोजनाओं को राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए आगे बढ़ाया गया है।
दूसरी ओर यामीन ने भारतीय परियोजनाओं में देरी करने की कोशिश की। वास्तव में उन्होंने माले हवाई अड्डे के विस्तार से संबंधित परियोजना को रद्द कर दिया था, जिसका ठेका भारतीय कंपनी जीएमआर को आवंटित हुए थे। उन्होंने बाद में यह ठेका चीनी कंपनी को दे दिया। इस फैसले की वजह से मालदीव को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने जीएमआर के पक्ष में फैसला दिया और फिर मालदीव को इस कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई करनी पड़ी थी। यामीन सरकार द्वारा खड़ी की गई बाधाओं के कारण मालदीव के सैन्य कर्मियों से संबंधित एक प्रशिक्षण अकादमी और एक विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण जैसी भारतीय परियोजनाओं को वहां मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
यामीन ने प्रतिरक्षा के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। मालदीव की पिछली सरकार ने भारतीय टेक्नीशियंस को वीजा नहीं दिया था, जिससे वहां तटीय रडार स्थापित करने का काम अधूरा पड़ा है। यामीन ने यहां तक कि भारत सरकार से यह तक कह दिया था कि वह अपने हेलीकॉप्टरों को वापस ले जाए जो उसने मालदीव को दिया है। डोर्नियर विमान के मुद्दे पर भ्रम था। यामीन संभवतः पाकिस्तान से कर्ज लेकर यह विमान खरीदना चाहते थे, जबकि भारत तोहफे के तौर पर इसे देने को तैयार था।
राष्ट्रपति सोलिह की भारत यात्रा के दौरान हालांकि रक्षा सहयोग प्राथमिकता में नहीं था, लेकिन उनकी सरकार ने भारत प्रथम की नीति पर सहमति जताई, जिसे यामीन ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। दोनों देशों ने सहमति जताई है कि वे अपने क्षेत्रों का इस्तेमाल अहितकारी लक्ष्यों के लिए नहीं करेंगे। अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि मालदीव पर चीन का प्रभाव तुरंत खत्म हो जाएगा। खुद सोलिह कह चुके हैं कि चीन मालदीव का मित्र है। इधर, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों ने माले में अपने दूतावास खोले हैं, जिससे मालदीव का भू-रणनीतिक महत्व पता चलता है। मालदीव में बाहरी दिग्गजों की रुचि यह सुनिश्चित करेगी कि भारत को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए समय, ऊर्जा और संसाधन खर्च करने होंगे।
-लेखक आईडीएसए में प्रोफेसर हैं।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
राष्ट्रपति बनने के बाद सोलिह की यह पहली यात्रा थी, जिससे इसका महत्व समझा जा सकता है। मालदीव की नई सरकार गंभीर वित्तीय संकट से जूझ रही है और उनकी यात्रा एक मकसद भारत से मदद हासिल करना भी था, ताकि नई सरकार स्थिरता ला सके। सत्ता संभालने के बाद सोलिह को यह एहसास हुआ कि यामीन के शासनकाल में हुए भारी भ्रष्टाचार और गड़बड़ियों के कारण सरकारी खजाना खाली पड़ा है। इससे भी बदतर यह कि यामीन ने चीन से भारी कर्ज ले रखे थे, जिसे वापस लौटाना मालदीव की नई सरकार के लिए आसान नहीं होगा।
दरअसल यामीन ने चीन को अनेक आधारभूत संरचना से जुड़ी परियोजनाओं का ठेका बढ़ी हुई लागत के आधार पर दे रखा था। चीन वहां की राजधानी माले को वहां के हवाई अड्डे से, जो कि एक अन्य द्वीप हुलहुले में स्थित है, जोड़ने के लिए एक मील लंबे पुल का निर्माण कर रहा है। इसके अलावा वह वहां एयरपोर्ट के विस्तार और हुलहुले द्वीप में आवासीय परियोजना भी बना रहा है। इनकी वजह से मालदीव भारी कर्ज से लद गया। हालांकि मालदीव कर्ज की राशि हासिल करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन अनुमान के मुताबिक उसका कुल कर्ज 3.7 अरब डॉलर के बराबर है और यह वहां की जीडीपी के 53 फीसदी के बराबर है। मालदीव पर चीन का 1.4 अरब डॉलर का कर्ज है।
इसका बड़ा हिस्सा यामीन द्वारा किए गए संदिग्ध ऋण समझौते से संबंधित है। चीन ने हाल के समय में खासतौर से बेल्ट ऐंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) शुरू करने के बाद से भारी-भरकम आधारभूत संरचनाओं का निर्माण शुरू किया है, जिसके लागत का भुगतान करना संबंधित देशों के लिए भारी पड़ रहा है। इसी वजह से श्रीलंका को हंबनटोटा बंदरगाह से संबंधित परियोजना में कर्ज के बदले हिस्सेदारी देनी पड़ी।
मालदीव भी बीआरआई के कारण कर्ज से पीड़ित देश है। उसे इस बात का भी भय है कि चीन कर्ज को दबाव का हथियार बनाकर उसकी संप्रभुता का हनन कर सकता है। मालदीव की नई सरकार इस जटिल परिस्थिति से बाहर निकलने की कोशिश कर रही है। वह भारत से आर्थिक मदद चाहती है, ताकि अपने वित्तीय संकट को दूर कर सके। भारत ने जहां तक संभव हो मालदीव की मदद की है। उसने मालदीव को 1.4 अरब डॉलर का पैकेज दिया है, जिसमें से 20 करोड़ डॉलर बजटीय सहायता है। शेष राशि रियायती ऋण के रूप में है।
अब्दुल्ला यामीन के शासनकाल में भारत-मालदीव द्विपक्षीय संबंध बेहद तनावपूर्ण स्थिति में पहुंच गया था। यामीन चीनियों के हाथों की कठपुतली बन गए थे। वह ऐसी नीतियों को आगे बढ़ा रहे थे, जिससे लगा मानो मालदीव के लोगों का भविष्य चीन के हाथ गिरवी में चला गया। एक आकलन के मुताबिक मालदीव के प्रत्येक नागरिक पर चीन का आठ हजार डॉलर कर्ज बकाया है। परियोजनाओं की बढ़ी लागत को यामीन ने यह कहकर जायज ठहराने की कोशिश की थी कि इन्हें बहुत कम समय में पूरा कर लिया गया। हालांकि वहां का संयुक्त विपक्ष मान ही रहा था कि इन परियोजनाओं को राजनीतिक मकसद पूरा करने के लिए आगे बढ़ाया गया है।
दूसरी ओर यामीन ने भारतीय परियोजनाओं में देरी करने की कोशिश की। वास्तव में उन्होंने माले हवाई अड्डे के विस्तार से संबंधित परियोजना को रद्द कर दिया था, जिसका ठेका भारतीय कंपनी जीएमआर को आवंटित हुए थे। उन्होंने बाद में यह ठेका चीनी कंपनी को दे दिया। इस फैसले की वजह से मालदीव को भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा था, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने जीएमआर के पक्ष में फैसला दिया और फिर मालदीव को इस कंपनी को हुए नुकसान की भरपाई करनी पड़ी थी। यामीन सरकार द्वारा खड़ी की गई बाधाओं के कारण मालदीव के सैन्य कर्मियों से संबंधित एक प्रशिक्षण अकादमी और एक विशेष आर्थिक क्षेत्र के निर्माण जैसी भारतीय परियोजनाओं को वहां मुश्किलों का सामना करना पड़ा।
यामीन ने प्रतिरक्षा के क्षेत्र में द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। मालदीव की पिछली सरकार ने भारतीय टेक्नीशियंस को वीजा नहीं दिया था, जिससे वहां तटीय रडार स्थापित करने का काम अधूरा पड़ा है। यामीन ने यहां तक कि भारत सरकार से यह तक कह दिया था कि वह अपने हेलीकॉप्टरों को वापस ले जाए जो उसने मालदीव को दिया है। डोर्नियर विमान के मुद्दे पर भ्रम था। यामीन संभवतः पाकिस्तान से कर्ज लेकर यह विमान खरीदना चाहते थे, जबकि भारत तोहफे के तौर पर इसे देने को तैयार था।
राष्ट्रपति सोलिह की भारत यात्रा के दौरान हालांकि रक्षा सहयोग प्राथमिकता में नहीं था, लेकिन उनकी सरकार ने भारत प्रथम की नीति पर सहमति जताई, जिसे यामीन ने ठंडे बस्ते में डाल दिया था। दोनों देशों ने सहमति जताई है कि वे अपने क्षेत्रों का इस्तेमाल अहितकारी लक्ष्यों के लिए नहीं करेंगे। अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगा कि मालदीव पर चीन का प्रभाव तुरंत खत्म हो जाएगा। खुद सोलिह कह चुके हैं कि चीन मालदीव का मित्र है। इधर, ब्रिटेन और जापान जैसे देशों ने माले में अपने दूतावास खोले हैं, जिससे मालदीव का भू-रणनीतिक महत्व पता चलता है। मालदीव में बाहरी दिग्गजों की रुचि यह सुनिश्चित करेगी कि भारत को इस क्षेत्र में अपना प्रभाव बनाए रखने के लिए समय, ऊर्जा और संसाधन खर्च करने होंगे।
-लेखक आईडीएसए में प्रोफेसर हैं।