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बच्चों की सेहत बिगाड़ रहा है खुले में शौच
गार्डनर हैरिस
Updated Tue, 11 Nov 2014 11:19 PM IST
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एक नए शोध के आने के बाद, जिसका यह निष्कर्ष था कि साफ-सफाई में लापरवाही भी बच्चों में कुपोषण बढ़ाती है, यूनिसेफ ने विगत सोमवार को नई दिल्ली में तीन दिनों के एक सम्मेलन की शुरुआत की है। यह कांफ्रेंस लोगों में स्वच्छता के प्रति जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से आयोजित की गई है, ताकि बच्चों को अपूर्ण शारीरिक विकास जैसी समस्याओं से बचाया जा सके।
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यूनिसेफ की उप-कार्यकारी निदेशक गीता राव गुप्ता ने सम्मेलन की शुरुआत करते हुए बताया कि 1960 के दशक में किस तरह उनका बचपन दिल्ली में बीता और कैसे उस दौर में वह बिना जूते पहने ही पड़ोस के मैदान में क्रिकेट खेलती थीं, जहां बगल में ही ग्वालों और चरवाहों की शौचालयविहीन बस्ती थी। खेल के दौरान वह अक्सर घासों पर दौड़ती थी, जो मानव अपशिष्ट से भरे होते थे। उन्होंने कहा, 'शायद इसलिए मैं काफी पतली थी और कुपोषित दिखती थी, जो मेरी मां के लिए चिंता का एक बड़ा कारण था।'
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भारत की आबादी का आधा हिस्सा या कम से कम 62 करोड़ लोग खुले में शौच करते हैं। और हालिया शोध यह बताता है कि बच्चों की करीब आधी आबादी के शारीरिक विकास के अवरुद्ध होने का यह बड़ा कारण हो सकता है। हालांकि कई शोधकर्ता इससे सहमत हैं कि असंतुलित आहार और खानपान की आदतें भी भारत में कुपोषण के लिए जिम्मेदार हैं, पर कइयों का यह मानना है कि गंदगी कुपोषण के महत्वपूर्ण कारकों में एक हो सकता है। इसकी वजह यह है कि मानव और पशुओं के मल से जीवाणु संबंधी ऐसा संक्रमण फैलता है, जो बच्चों में पोषक तत्व अवशोषित करने की क्षमता को कमजोर कर देता है।
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हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पॉपुलेशन हेल्थ के प्रोफेसर डॉ एस वी सुब्रमण्यम ने खुलासा किया है कि यह समस्या गरीब घरों में ही नहीं, संपन्न तबकों के बच्चों में भी है। इसकी वजह यह है कि बेशक संपन्न घरों में शौचालय की सुविधा होती है, पर उनके आसपास के विपन्न घरों में ऐसा नहीं होता। नतीजतन मक्खियों और पानी के माध्यम से वह भी इस बैक्टीरिया से संक्रमित होते हैं। इसलिए सुब्रमण्यम कहते हैं, 'आपके घर में शौचालय का होना भी आपकी सुरक्षा की गारंटी नहीं है।'
बौनेपन की वजह से बच्चा शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर होता है। दुनिया भर में शारीरिक रूप से अपूर्ण बच्चों में से 40 फीसदी बच्चे दक्षिण एशिया में हैं। दक्षिण एशिया में अपेक्षाकृत कम शौचालय और दुनिया के अन्य भागों की तुलना में यहां जनसंख्या का घनत्व काफी ज्यादा होना इसके कारण हो सकते हैं। दक्षिण एशिया में यूनिसेफ की क्षेत्रीय निदेशक कैरिन हल्शॉफ कहती हैं, 'अगर हमने खुले में शौच करना बंद नहीं किया, तो इसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा कि बच्चों को कितना भोजन दिया जाए, क्योंकि उनका विकास अवरुद्ध ही रहेगा।'
हालांकि दिल्ली विश्वविद्यालय में दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से जुड़े डॉ डीन स्पीयर्स काफी आशान्वित हैं। उनकी मानें, तो वक्त तेजी से बदल रहा है। वाकई पांच वर्ष पहले तक कुपोषण पर होने वाली बहसों में गंदगी की समस्या बमुश्किल ही शामिल होती थी, मगर अब हम इसके बारे में बात करने लगे हैं। और यह निश्चय ही भविष्य के लिए सुखद संकेत है।