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सुरक्षा बलों की एक चुनौती यह भी

Wed, 06 Dec 2017 07:02 PM IST
शिवदान सिंह
शिवदान सिंह Updated Wed, 06 Dec 2017 07:02 PM IST
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One more challenge for the security forces
शिवदान सिंह

कुछ समय पहले एक अंग्रेजी दैनिक के मुख्य पृष्ठ पर खबर छपी कि छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा के विरुद्ध तैनात अर्ध सैनिक बलों के 36 जवानों ने इसी साल जनवरी से लेकर 30 सितंबर के बीच आत्महत्या कर ली। इस खबर से पूरा देश स्तब्ध एवं दुखी होने के साथ चिंतित भी है कि राष्ट्र की सुरक्षा में तैनात सैनिक आत्महत्या जैसा कदम क्यों उठा रहे हैं।


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इस राज्य में सीमा सुरक्षा बल, केंद्रीय पुलिस बल, सीआईएसएफ तथा आईटीबीपी की कुल तीस बटालियन तैनात हैं, जिनमें करीब तीन लाख सैनिक कार्यरत हैं। ये सब राज्य में लंबे समय से चले आ रहे नक्सली आतंकवाद के विरुद्ध घने जंगलों में अभियान चला रहे हैं। नक्सली विकास कार्यों, जैसे सड़क निर्माण इत्यादि में बाधा डालकर राज्य को अविकसित ही रखना चाहते हैं। नक्सली हमलों ने सुरक्षाकर्मियों में असुरक्षा की स्थिति पैदा कर दी है। इन बलों के जवान अक्सर एक अनजाने भय से ग्रस्त रहते हैं, जिससे इनका मानसिक स्वास्थ्य प्रभावित होकर इनमें अवसाद पैदा करता है। बिना आराम तथा प्रशिक्षण के लंबे समय तक ऐसे अशांत क्षेत्रों में तैनाती, परिवारों से दूरी तथा कुशल मानव प्रबंधन तथा स्वस्थ सैनिक परंपराओं का अभाव भी उनकी इस स्थिति के लिए जिम्मेदार है।

देश में विकास के साथ सामाजिक बदलाव भी आए हैं, जिस कारण संयुक्त परिवार बिखर कर एकल परिवार बन गए। आज सूचना युग में परिवारों की समस्याएं फौरन मोबाइल फोन द्वारा सैनिकों तक पहुंच जाती है और इस स्थिति में ड्यूटी के कारण यदि ऐसे सैनिक को छुट्टी नहीं मिलती, तो वह अपने आपको असहाय पाकर आत्महत्या जैसा दुर्भाग्यपूर्ण कदम उठा लेता है। आंकड़ों के अनुसार, इसी क्षेत्र में 2006 से लेकर 2017 तक 115 सैनिकों ने आत्महत्याएं की, यह आंकड़ा 2017 के सितंबर तक 36 पहुंच गया।

अक्सर देखा जाता है कि इन अर्ध सैनिक बलों में आईजी स्तर या इससे ऊपर के अधिकारी भारतीय पुलिस सेवा से प्रतिनियुक्ति पर आते हैं, जिन्हें इन बलों से उस तरह का लगाव नहीं होता, जिस प्रकार सेना का अधिकारी अपने अधीनस्थों से रखता है, क्योंकि ये पुलिस अधिकारी दो-तीन साल की निश्चित अवधि पूरा करके अपने राज्यों में वापस लौट जाते हैं। सेना में एक सैनिक की हर गतिविधि के लिए नियत प्रक्रिया डिफेंस सर्विसेज रेग्यूलेशन में अंकित है और इसके विरुद्ध आचरण करने पर हर स्तर के सैन्यकर्मी के खिलाफ उचित कार्रवाई का प्रावधान है।
 
यहां पर विचारणीय है कि अर्ध सैनिक बल लंबे समय से पूर्वोत्तर, पंजाब, कश्मीर एवं छत्तीसगढ़ में आतंकवाद का सामना कर रहे हैं, पर उन्हें सर्वाधिक नुकसान छत्तीसगढ़ में उठाना पड़ा है। सशस्त्र सेना चिकित्सा पत्रिका ने एक सर्वेक्षण में पाया है कि 96 प्रतिशत भारतीय सैनिक अपने मानसिक स्वास्थ्य के बारे में बात ही नहीं करना चाहते। इस कारण वे अपनी मानसिक समस्याओं से चुपचाप अकेले जूझते रहते हैं तथा इस स्थिति में अक्सर अवसाद से ग्रसित हो जाते हैं। जबकि अमेरिका में 97 प्रतिशत सैनिक अपनी समस्याओं के बारे में खुलकर बात करते हैं। इस कारण उन्हें समय रहते मनोवैज्ञानिक सहायता मिल जाती है तथा वहां पर सशस्त्र बलों में आत्महत्याओं के आंकडे़ कम हैं। ऑनलाइन काउंसिलिंग का प्रावधान भी होना चाहिए, जिससे गोपनीयता रखते हुए एक सैनिक विशेषज्ञ से सलाह लेकर अपने मानसिक स्वास्थ्य को अच्छा बनाकर आत्महत्या जैसी कायराना हरकत से बचकर अपने परिवार तथा देश की सेवा कर सके।
 
-लेखक सेवानिवृत्त कर्नल हैं

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