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एक दिन नायिका, अगले दिन खलनायिका

Fri, 05 Dec 2014 08:37 PM IST
क्षमा शर्मा
क्षमा शर्मा Updated Fri, 05 Dec 2014 08:37 PM IST
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One day hero, next day zero

एक शाम जैसे टीवी पर वीरगाथा काल जीवित हो उठा। रोहतक की दो बहनों की वीरता की कहानी हर चैनल दिखा रहा था और आगे बढ़कर लफंगों और शोहदों को दो हाथ लगा रहा था। यहां तक कहा गया कि वे लड़कियां छेड़ने वालों को इसलिए पीट सकीं, क्योंकि उन्होंने जींस पहन रखी थी। इस संदर्भ में लगभग पच्चीस साल पहले इटली के जज के दिए एक फैसले की याद आ गई। दुष्कर्म के एक मामले की सुनवाई कर रहे उस जज ने फैसला सुनाते हुए कहा था कि जो लड़कियां जींस पहनती हैं, उनके साथ दुष्कर्म कैसे किया जा सकता है?

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रोहतक की बहनें रातोंरात सेलिब्रिटी बन गईं। जिन तीन लड़कों पर छेड़खानी का आरोप था, वे सेना के फिजिकल टेस्ट में पास हो गए थे। मगर सेना का अगले ही दिन बयान आया कि छेड़खानी करने वालों को सेना में नहीं लिया जाएगा। हरियाणा की खट्टर सरकार ने भी घोषणा कर दी कि 26 जनवरी को इन बहनों को वीरता पुरस्कार दिया जाएगा। लेकिन अगले ही दिन इन लड़कियों से जुड़ा दूसरा वीडियो आ पहुंचा। इसमें ये बहनें पार्क में बैठे एक लड़के को पीट रही थीं। लड़कियों के गांव के लोगों और कई औरतों ने कहा कि इन बहनों को गाली-गलौज तथा मारपीट करने और घटना का वीडियो बनवाने की आदत है। पांच औरतों ने शपथपत्र देकर यह कहा कि वे उस बस में थीं और उसमें छेड़खानी की कोई घटना हुई ही नहीं थी। सारी लड़ाई सीट को लेकर थी। एक लड़के ने एक बूढ़ी औरत को सीट देने के लिए कहा था, जिस पर लड़कियां नाराज हो गईं और उस लड़के को गाली देने और पीटने लगीं। वह बस से उतरकर भागा, तो उन्होंने उसका पीछा किया। बस के ड्राइवर और कंडक्टर ने कहा कि उन्होंने बस को पुलिस स्टेशन ले जाने की बात कही थी, मगर बहनों ने ही मना कर दिया।
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अब हुआ यह कि रातोंरात वुमैन एम्पावरमेंट का गान करने वाले चैनल दाएं-बाएं हो गए। इन बहनों को वीरता पुरस्कार देने की घोषणा करने वाली हरियाणा सरकार के प्रवक्ता ने सफाई दी कि उन्होंने तो मीडिया में देखकर ही यह फैसला किया था। पूछने वाली बात यह है कि आखिर इतनी जल्दी क्या थी। जांच-पड़ताल तो कर ली होती। सरकार को तो टीवी चैनलों की तरह टीआरपी की जरूरत नहीं होती। कलेक्टर ने भी कहा कि वह इस मामले की निष्पक्ष जांच करेंगे। अब भला कौन झूठ बोल रहा है, और कौन सच, यह तो जांच के बाद पता चलेगा, मगर उन लड़कों का तो भविष्य चौपट हो गया। अगर उन्होंने छेड़खानी की थी, तो उन्हें सजा जरूर मिले, लेकिन यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया, तो उन्हें सजा क्यों मिलनी चाहिए?
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लड़कियां प्रतिवाद करें, यह तो ठीक है, मगर वे भी फोटो सैशन की फिराक में रहें, यह ठीक नहीं। इससे औरतों के ही हितों को नुकसान पहुंचता है। जो औरतें कह रही हैं कि बस में छेड़खानी नहीं हुई थी, वे भी औरतें ही हैं। अब किसे सही माना जाएगा, किसे गलत?


इस मामले में दादरी में हुई एक घटना याद आ रही है। सड़क पर एक गाड़ी जा रही थी। उसे एक लड़का चला रहा था। उससे आगे चलने वाली गाड़ी ने अचानक ब्रेक लगाया, तो उसे भी ब्रेक लगाना पड़ा। लड़के के पीछे चलने वाली गाड़ी में कई लड़कियां सवार थीं। वे फौरन गाड़ी से उतरीं और लड़के को पीटने लगीं। लड़कियां आखिर लड़कों की नकल क्यों करना चाहती हैं? जिन घटनाओं से हम बचना चाहते हैं, उनकी नकल करना तो वैसा ही बन जाना हुआ। इसी तरह मीडिया, खासकर टीवी, को भी चाहिए कि वह पूरी जांच-पड़ताल के बाद ही ऐसी घटनाओं को सुर्खियां बनाएं।

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