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फिर जहरीली होती हवा

Mon, 29 Oct 2018 07:07 PM IST
ज्ञानेंद्र रावत
ज्ञानेंद्र रावत Updated Mon, 29 Oct 2018 07:07 PM IST
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Once again poisonous air
ज्ञानेंद्र रावत

देश की राजधानी दिल्ली के लोग आजकल जहरीली हवा में सांस लेने को मजबूर हैं। इसका एक कारण पड़ोसी राज्यों यथा हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं पंजाब के किसानों द्वारा जलाई जाने वाली पराली को बताया जा रहा है। ठंड शुरू होने से पहले ही दिल्ली- एनसीआर की हवा देश भर में सबसे ज्यादा खराब हो गई है। दिल्ली के अलावा गुजरात में अहमदाबाद ही एकमात्र ऐसी जगह है, जहां हवा की गुणवत्ता बेहद खराब स्थिति तक पहुंच गई है। यह कहना गलत नहीं होगा कि दिल्ली गैस चेम्बर का रूप अख्तियार कर चुकी है और इसने राजनीतिक दलों को सियासत करने का एक और सुनहरा मौका दे दिया है। दिल्ली सरकार के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसौदिया कहते हैं कि दिल्ली समेत उत्तर भारत के लोग कुछ राज्यों और केंद्र सरकार की नाकामी के चलते ऐसे हालात में रहने को मजबूर हैं।


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पंजाब और हरियाणा में तीन करोड़ टन से भी अधिक पराली का उत्पादन होता है। इसमें लगभग 2.3 करोड़ टन पराली हर साल जला दी जाती है। जबकि इस साल अभी 90 फीसदी से अधिक फसल की कटाई होना बाकी है। इन दिनों वही किसान अपनी फसल काट रहे हैं, जिन्हें आलू, मटर और चारा बोना है। पूरी फसल कटने पर स्थिति क्या होगी, इसकी सहज कल्पना की जा सकती है। जबकि पंजाब प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का दावा है कि बीते दो साल की तुलना में इस साल पराली जलाने की घटनाएं पांच गुना तक कम हुई हैं। पर यह समझ से परे है, क्योंकि पराली के निपटारे की दिशा में किसी खास तकनीक का भी प्रयोग नहीं किया गया है।

राजधानी में प्रदूषण पर लगाम लगाने और उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब के किसानों को राहत देने के लिए बीते साल केंद्र सरकार ने उनसे पराली खरीदने का निर्णय लिया था। तब केंद्र ने पराली से बिजली बनाने की बात कही थी। बीते साल ही सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से इस भीषण समस्या का स्थायी समाधान निकालने को कहा था। पराली से कंपोस्ट खाद बनाने की मांग भी दिल्ली उच्च न्यायालय से की गई थी। इससे किसानों की पैदावार बढ़ने के साथ प्रदूषण पर भी लगाम लगती। पंजाब सरकार ने तो केंद्र से पुआल प्रबंधन मशीनों का सौ फीसदी खर्च उठाने को कहा था। मौजूदा समय में इन मशीनों की खरीद में 40 फीसदी खर्च राज्य को उठाना होता है। पंजाब सरकार ने पराली न जलाने वाले किसानों को प्रति क्विंटल पराली पर सौ रुपये के मुआवजे की घोषणा की थी, पर किसी अन्य राज्य ने इस संबंध में कोई कदम नहीं उठाया और न केंद्र ने ही पुआल प्रबंधन मशीनों की खरीद में राज्य को कोई राहत ही दी।

बीते साल केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने पराली जलाने की निगरानी उपग्रह से कराए जाने की घोषणा की थी। जापान ने भी इस समस्या से निपटने में मदद की पेशकश की थी, पर हुआ कुछ नहीं। किसानों के मुताबिक, एक एकड़ खेत में पराली जलाने में एक से डेढ़ हजार रुपये का खर्च आता है, वहीं खेत में मल्चर, रूटावेटर जैसी मशीनों के जरिये पराली का प्रबंधन करने में पांच से छह हजार रुपये प्रति एकड़ का खर्च है।

पंजाब व हरियाणा की सरकारों के साथ-साथ केंद्र सरकार भी किसानों के लिए कुछ नहीं कर रही। इसी कारण वहां के किसान पराली जलाने को मजबूर हैं। नतीजतन दिल्ली-एनसीआर के लोग गैस चेम्बर में सांस लेने को मजबूर हैं। आने वाले दिनों में हालात और बिगड़ेंगे, क्योंकि पंजाब और हरियाणा में पराली जलाए जाने से धुआं उठेगा और हवा का रुख दिल्ली की ओर होगा। 

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