फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   on the occassion of makar sankranti

इस संक्रांतिपूर्ण समय में

Mon, 13 Jan 2014 07:20 PM IST
परिचय दास
परिचय दास Updated Mon, 13 Jan 2014 07:20 PM IST
विज्ञापन
on the occassion of makar sankranti

सूर्य जिस दिन उत्तरायण होता है, उसे हम मकर संक्रांति के रूप में जानते हैं। संक्रांति शब्द का अर्थ है-मिलन, एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक का मार्ग, सूर्य या किसी ग्रह का एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करना, दो युगों या विचारधाराओं के संघर्ष से परिवर्तित होते वातावरण से उत्पन्न स्थितियां।

विज्ञापन


संक्रांत होना ही जीवन है। परिवर्तन और संधि-इसके दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। जैसे धनु और मकर। जैसे फल और फूल। जैसे परंपरा और आधुनिकता। जैसे शब्द और वाक्य। एक दूसरे से जुड़ना, बदलना और विस्तार या विनिमय। खिचड़ी का भी यही भाव है। खिचड़ी यानी मिश्रण। विश्व के सारे समाजों और संस्कृतियों का मूलाधार ही है-मिश्रण। मकर संक्रांति को सूर्य की गति से निर्धारित किया जाता है। बच्चे की विस्मय भावना में और सृजनशील कलाकार की कल्पना में हर सूर्योदय अपने प्रकार का पहला सूर्योदय होता है।
विज्ञापन


सूर्य से जुड़ी परंपराएं संपूर्ण विश्व में हैं। हमारे देश में उसका जितना व्यवस्थित व वैज्ञानिक स्वरूप है, शायद कहीं नहीं। संगम में गंगा, यमुना, सरस्वती का एकत्रीकरण माघ में यों ही विशिष्ट नहीं बन जाता। इसमें लोक का स्पर्श और परंपरा की संरचना भी सम्मिलित है। इस परंपरा की संरचना कुछ निर्धारित मूल्यों, विश्वासों, व्यवस्थाओं और सामाजिक प्रक्रिया से बनती है और ये मूल्य, विश्वास और प्रक्रियाएं उस परंपरा का आधार होती हैं। भारतीय परंपरा के अनेक ऐसे रूप हैं, जो संरचना-रहित ही नहीं, अपितु उसके विरोधी भी होते हैं। मकर संक्रांति में सामूहिक स्नान वर्ण-जाति-स्थान-भाषा की सीमाएं तोड़ देता हैः यह इसका पारंपरिक और समकालीन दोनों रूप है।
विज्ञापन
विज्ञापन


दक्षिणायन को देवताओं की रात्रि अर्थात नकारात्मकता और उत्तरायण को देवताओं का दिन यानी सकारात्मकता का प्रतीक माना गया है। यह सकारात्मकता एक-दूसरे से मिलने यानी संगम करने, दान करने और सहस्रशीर्षानुभव से आती है। दान महत्वपूर्ण है। जिस संस्कृति में देने को महत्वपूर्ण बना दिया जाए, वहां समता के भाव की संभावना होती है।

प्रसिद्ध विचारक डायलन ने कहा था, मुझमें अनेक व्यक्ति हैं। इसे आगे बढ़ाकर समझा जा सकता है कि संक्रांति में अनेक का समाहार है। मकर संक्रांति के दिन के लिए ही महाराष्ट्र में कहा जाता है-तिल-गुड़ लो और मीठा बोलो। मीठा बोलो-यही मनुष्यता का सार है। कृषि संस्कृति में लोहरी, पोंगल और मकर संक्रांति धान्य उत्कर्ष के प्रतीक भी हैं। पोंगल में सूर्य को नेवैद्य चढ़ाया जाता है और खीर को प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है। एक मिलन का भाव-एक रहस्यात्मक अनुभूति। इस रहस्यात्मक अनुभूति में कुछ समांतर भी है, पृथ्वी से उत्पन्न होने की अन्नमय भावना है, जन्म लेने की।

यही दिन बताता है कि दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर जाना नकारात्मकता से सकारात्मकता और अंधकार से प्रकाश की ओर जाना है। सूर्य यानी तेज की कृतज्ञता। वास्तव में यह तेज बाहर और अंदर, दोनों में उतरना चाहिए। समाजशास्त्रीय रूप से कृषि आधारित उत्पादन जब निरर्थक होने लगेंगे और शहरों में आई मजदूरों की अनियंत्रित भीड़ को आर्थिक क्रियाकलाप में कोई जगह नहीं मिलेगी, तो स्थितियां बेकाबू होने को बढ़ेंगी। सचिवालय की छत से किया गया संबोधन भी अपर्याप्त लगने लगेगा। एक नई व्यवस्था चाहिए होगी। सामाजिक व राजनीतिक क्रांति व संक्रांति से स्पष्ट हो रहा है कि सत्ता संप्रभुता प्राप्त कही जाने वाली राज्यव्यवस्था के हाथों से खिसक रही है और कुछ समूहों और उपसमूहों के हाथों में पहुंच रही है। इस तरह अंधकार और प्रकाश के बीच की संक्रांति का समकाल रचा जा रहा है।


परिवर्तन शाश्वत है, परंतु उसे सकारात्मक बनाना मनुष्य की सृजनात्मकता है। संक्रांति से प्रकाश अधिक और अंधकार कम होने का भाव इसी मांगल्य का प्रतीक है। उसमें समन्वयन यानी खिचड़ी, संगमन, मिष्ठान भाव, स्नान का सहस्रशीर्ष अनुभव, लोकमन की संपृक्ति एक साथ एकत्र हैं। जेम्स जां के शब्दों में, 'विश्व एक मशीन की अपेक्षा विचार अधिक है।' यह विचार एक उजाला है, जो हमें सृजनधर्मी बनाता है। यही परिवर्तन का हेतु है। यही हमें संक्रांत करता है। यही हमें ललित बनाता है।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed