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तेल और अर्थव्यवस्था: ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी से आमजन परेशान, वैश्विक अस्थिरता का गहरा असर

Tue, 26 May 2026 07:03 AM IST
Pavan अमर उजाला
अमर उजाला Published by: Pavan Updated Tue, 26 May 2026 07:03 AM IST
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सार
संकट की जड़ भले ही पश्चिम एशियाई युद्ध हो, लेकिन पिछले करीब दो हफ्तों में पेट्रोल-डीजल के दाम चौथी बार बढ़ना, आम आदमी के लिए परेशान करने वाला है, तो अर्थव्यवस्था के लिए भी यह एक गंभीर चुनौती बन रहा है।
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Oil and economy: Rising fuel prices upset the public, with global instability having a profound impact
तेल और अर्थव्यवस्था - फोटो : ANI

विस्तार

देश में बीते तकरीबन दो हफ्तों के भीतर ईंधन की कीमतों में चौथी बार बढ़ोतरी होना आम उपभोक्ताओं के लिए तो परेशान करने वाला है ही, अर्थव्यवस्था के लिए भी इसके गंभीर निहितार्थ हैं। पश्चिम एशियाई युद्ध और उसके कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि हो चुकी है, लेकिन सरकारी स्वामित्व वाली तेल व डीजल कंपनियों ने करीब दो हफ्ते पहले तक बढ़ी कीमतों को उपभोक्ताओं पर नहीं थोपा था। यही नहीं, पिछले चार वर्षों में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में कोई खास वृद्धि नहीं हुई, अलबत्ता 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले एक बार ईंधन की कीमतों में कटौती ही हुई थी।


उल्लेखनीय है कि पेट्रोल व डीजल की खुदरा कीमतें नियंत्रण मुक्त हैं, लेकिन व्यवहार में ईंधन के खुदरा बाजार में 90 फीसदी हिस्सेदारी रखने वाली सरकारी स्वामित्व वाली तेल व डीजल कंपनियां सरकार से परामर्श करके कीमतों को स्थिर रखती हैं। अंतरराष्ट्रीय तेल की कीमतों में उछाल आने पर उन्हें नुकसान होता है, और कीमतों में गिरावट आने पर उन्हें मुनाफा होता है। लेकिन अब वैश्विक परिस्थितियों और तेल कंपनियों को प्रतिदिन हो रहे करीब एक हजार करोड़ रुपये के नुकसान के मद्देनजर सरकार के समक्ष विचारणीय बिंदु शायद यही था कि ईंधन की कीमतों में एकमुश्त वृद्धि की जाए या फिर चरणबद्ध ढंग से। जाहिर है कि चरणबद्ध तरीका चुना गया।


इस वर्ष फरवरी तक कच्चे तेल की औसत कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, जो हाल में करीब 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। अमेरिका व ईरान के बीच तनाव कम होने की उम्मीदों के चलते कच्चे तेल की कीमतों में फिलहाल कुछ गिरावट जरूर आई है, लेकिन इससे उपभोक्ताओं को राहत मिलेगी, इसमें संशय है, क्योंकि जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हुई थीं, तब भी सरकारी तेल कंपनियों ने ईंधन महंगा नहीं किया था। ध्यान रखना चाहिए कि कच्चे तेल की खरीद डॉलर में होती है। इसलिए, जब रुपया कमजोर होता है, तो भले ही वैश्विक तेल कीमतें गिरी हों, कच्चे तेल का आयात महंगा हो ही जाता है।

लिहाजा, यह समय ऊर्जा नीति पर पुनर्विचार का भी है। इलेक्ट्रिक वाहनों, सार्वजनिक परिवहन, जैव ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश बढ़ाना अब केवल पर्यावरणीय जरूरत नहीं, बल्कि आर्थिक अनिवार्यता भी है। ऐसे में, सरकार ने उचित ही एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रमों और अक्षय ऊर्जा में निवेश बढ़ाया है, जिससे भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। फिर भी, जब तक देश ईंधन के आयात पर अत्यधिक निर्भर रहेगा, तब तक वैश्विक अस्थिरता का असर आम लोगों की रसोई से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक महसूस होता रहेगा।
 
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