दहेज में ऑड नंबर की कार
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साधो, जिनके पास न ऑड है, न ईवन, वे डूब मरें। एक अदद कार न हो, तो दिल्ली पुलिस भी नहीं पूछती। कोई स्वयंसेवक गुलाब का फूल भेंट नहीं करता। पैदल चलने वाले दिल्ली की सड़कों का नजारा देख रहे हैं। पुलिस मुस्तैद है, गोया राजपथ पर शाही सवारी निकल रही हो। राजधानी में ऑड-ईवन नंबर का फॉर्मूला भी उत्सव बन गया है। जो दिल्ली से बाहर हैं, वे इस जश्न का लुत्फ दूरदर्शन पर उठा रहे हैं। मेरे मित्र ने पिछले महीने कार खरीदी। आज ऑड नंबर की गाड़ियां नहीं चलेंगी, सो कैसे निकलें? वह पत्नी को मना रहे हैं। आइडिया बुरा नहीं है। स्त्री-मुक्ति का परचम ऐसे समय बहुत काम आता है। टिकट खिड़की पर भीड़ हो, तो पत्नी ही संकटमोचक लगती है।
उस दिन दिल्ली में दो महिलाएं झगड़ रही थीं। एक ने गुस्से में बद्दुआ दी, तेरे पति कार लेकर जाएं, तो जुर्माना भरना पड़े। दूसरी ने चिढ़कर कहा, कलमुंही, तेरे पास तो कार भी नहीं है। तू जिंदगी भर एक चालान को तरसे। दो तरह के नंबरों की कारें रखने वाले मजे में हैं। जिनके पास नहीं हैं, वे पड़ोसी से कार बदलकर चलाने का मशविरा कर रहे हैं। फर्जी नंबर प्लेट से भी कार चलाने का विमर्श बुरा नहीं है। दिल्ली सरकार सड़कों की हवा माप रही है। भाजपाई नाखुश, तो कांग्रेसी बेहाल बने हुए हैं। खबरों में बने रहने का हर रोज हिट केजरीवाल फॉर्मूला। किसने सोचा था कि राजधानी में कारें एक दिन संकट का सबब बन जाएंगीं! कार वाले के लिए बस से सफर करना शर्म की इंतिहा है। कार क्या इसी दिन के लिए खरीदी थी? आज के जमाने में कार नाक है। इज्जत है। शोहरत है। स्टेटस सिंबल है। कार ओहदा है। विकास है। तरक्की है। कार रेस है। कार नजरिया है। कार जिंदगी है। कार नहीं है, तो सब कुछ बेकार है। बिना कार के तो सिर्फ हिंदी का साहित्यकार है। मेरे एक पड़ोसी के पास ईवन नंबर की कार है। वह बेटे के लिए दहेज में ऑड नंबर की गाड़ी मांग रहे हैं। दिल्ली में रहना है, तो दो कारों के बिना उद्धार कहां!