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पोशाक अश्लील है या मानसिकता
तस्लीमा नसरीन
Updated Wed, 29 Oct 2014 01:04 PM IST
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बांग्लादेश के लक्स टेलीविजन चैनल की 'आई सुपरस्टार' प्रतियोगिता के एक एपिसोड में एक लड़की साड़ी के ऊपर ब्लाउज पहनकर आई, तो हंगामा मच गया। साधारणतः महिलाएं ब्लाउज के ऊपर से साड़ी पहनती हैं। लेकिन ब्लाउज को साड़ी के ऊपर पहनना, जिससे वह अलग दिखे, मुझे अच्छा लगा। यह नया चलन है। बांग्लादेश की वह लड़की फैशन डिजाइनर बताई जाती है। शायद इसीलिए उसे यह आइडिया आया होगा। लेकिन उस लड़की को जिस तरह निशाना बनाया गया, वह गलत है।
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कपड़े कई तरह से पहने जा सकते हैं, और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। उन दुर्वासाओं को शायद नहीं मालूम कि पेटीकोट पहनने का चलन भी बहुत पुराना नहीं है। साड़ी में चुन्नट डालने की परंपरा भी नई है।
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इस पूरे इलाके में साड़ी का चलन भी बहुत नया नहीं है। एक समय स्त्री-पुरुष, दोनों धोती बांधते थे। दक्षिण भारत की औरतें पुरुषों की तरह ही लुंगी पहनती थीं। प्राचीन भारत में महिलाएं वक्ष के ऊपर ओढ़नी या वक्षबंधिनी डाल लेती थीं। ऐसे कपड़ों में सिलाई नहीं होती थी। उस समय हिंदुओं में बगैर सिले कपड़े पहनने की परंपरा थी। इसकी वजह मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं, लेकिन हिंदू परंपरा में तब सिले वस्त्र पहनना अपवित्र माना जाता था।
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भारतीय उपमहाद्वीप की महिलाएं धीरे-धीरे धोती से साड़ी तक पहुंचीं। साड़ी को भी तब संस्कृत में सात्तिका बोलते थे। ओडिशा में सत्त्ारहवीं शताब्दी में साड़ी बांधने की 'मछली की पूंछ' शैली आई, जिसमें आंचल को मछली की पूंछ की तरह कंधे से नीचे झुला दिया जाता था। यानी महिलाओं की धोती ही धीरे-धीरे साड़ी में रूपांतरित हुई।
अंग्रेजों के आने के बाद यहां ब्लाउज-पेटीकोट की शुरुआत हुई। मुस्लिम महिलाएं अपने साथ घाघरा ले आई थीं। उस घाघरा को देखकर ही पेटीकोट सिलने की शुरुआत हुई। भारत में साड़ी का इतिहास हमलोगों की ही साड़ियों का इतिहास है। हिंदू ही हमारे पूर्वपुरुष और हमारी पूर्वनारी हैं। बंगाली जाति के रूप में हम 1971 में पैदा नहीं हुए। बंगालियों की परंपरा हजारों वर्ष पुरानी है। इस उपमहाद्वीप में साड़ी के इतिहास से जो वाकिफ हैं, वे इसे पहनने के बदलते तौर-तरीके पर कभी ऐतराज कर ही नहीं सकते।
हमारी पूर्वनारियां नग्न रहती थीं, वृक्ष के छाल और पशुओं के चमड़े से अपना शरीर ढंकती थीं। इस युग की हम नारियां ब्लाउज पर आंचल डालती हैं। आज के दौर का हमारा पहनावा हमेशा के लिए चलन में नहीं रह सकता। यह पहनावा भी आने वाले दिनों में विदा होगा। तब कपड़े पहनने की कोई नई शैली, कोई नया तरीका आएगा। मनुष्य के दिमाग में हमेशा ही नए-नए विचार आते हैं। अगर लड़कियां साड़ी के ऊपर अलग से ब्लाउज पहन रही हैं, तो उन्हें पहनने दीजिए। अगर आपको पसंद नहीं, तो आप मत पहनिए।
कोई पोशाक अश्लील नहीं है। इसी तरह वस्त्रहीनता भी अश्लीलता नहीं। अमेजन के जंगलों या अंडमान द्वीप में नग्न घूमते आदिवासियों को क्या कोई अश्लील कह सकता है? अश्लीलता का तर्क हमने गढ़ा है। अश्लीलता शब्द अश्लील है। मनुष्य का कुत्सित मस्तिष्क अश्लील है। जो मर्द यह सोचता है कि हमारी पसंद के कपड़े न पहनने वाली औरत चरित्रहीन है, वह पुरुष अश्लील है। जो यह तर्क गढ़ता और उसे नियम के तौर पर लागू करवाने की कोशिश करता है, कि कम कपड़े पहनने वाली लड़कियां बलत्कृत होने के लिए ऐसा करती हैं, वह मनुष्य और वह व्यवस्था अश्लील है। जो इस सोच पर यकीन करता है कि पुरुष जो चाहे पहन सकता है, पर औरतों को ऐसा नहीं करना चाहिए, वह सोच अश्लील है।
कुछ वर्ष पहले की एक गर्मियों में मैं बर्लिन में थी। एक शाम को तैराकी के उद्देश्य से मैं एक झील के पास पहुंचकर स्तब्ध रह गई। सड़क किनारे एक फैले हुए मैदान में सैकड़ों स्त्री-पुरुष और बच्चे 'सन बाथ' कर रहे थे। धूप सेंकते हुए बीच-बीच में वे झील में उतरकर तैराकी का मजा ले रहे थे। हम लोग जैसे पिकनिक मनाते हैं, वैसे ही दिन भर के भोजन और पानी का इंतजाम सबके पास था। मुझे पूरे वस्त्रों में देखकर वे न सिर्फ चकित थे, बल्कि कुछ की आंखों में घृणा के भी भाव थे। पूरे कपड़ों में होने के बावजूद मैं वहां शर्मसार और सिर झुकाए खड़ी थी।साफ है कि अश्लीलता बोध एक मानसिकता है। इसका हमारी पोशाक से कोई संबंध नहीं। कोई पूरे वस्त्रों में अश्लील लग सकता है, तो कोई बगैर वस्त्रों के।
मैं किसी पोशाक को अश्लील नहीं मानती। लेकिन कथित अश्लीलता दूर करने के लिए जो पोशाक तैयार कर लड़कियों के शरीर पर जबरन डाले गए हैं, जिन पोशाकों ने लड़कियों और महिलाओं की चलने-फिरने की स्वाभाविकता छीन ली है, मैं उन पोशाकों को अश्लील मानती हूं; जैसे हिजाब या बुर्का, जिनके कारण महिलाओं का चलता-फिरता जीवन कारागार में तब्दील हो गया है।
कहते हैं, औरतों को 'बुरी नजरों' से बचाने के लिए इन पोशाकों का इजाद हुआ है। पर नजर अगर सचमुच बुरी होगी, तो वे बुर्के में ढंकी औरतों पर भी टिकेगी, और नीयत साफ होगी, तो कम कपड़ों में लड़कियों-महिलाओं को देखकर भी गलत खयाल नहीं आएंगे। अगर वाकई कम कपड़े बलात्कार जैसी दुर्घटना को आमंत्रित करने की वजह होते, तो बलात्कार के बढ़ते आंकड़ों की हम कल्पना नहीं कर सकते थे, क्योंकि आज भारत जैसे देशों में भी कम कपड़ों में घर से दफ्तर तक जाने वाली लड़कियों-महिलाओं की संख्या बहुत है। यह लड़कियों-महिलाओं को ही तय करने का अधिकार दीजिए न कि वे क्या पहनती हैं, क्या पहनना चाहती हैं!
बांग्लादेश के समाज में भी अब भी अज्ञान का अंधकार है। वहां बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं और गगनचुंबी शॉपिंग सेंटर तो हैं, लेकिन स्वस्थ मानसिकता का विराट अभाव है। इसी कारण कोई लड़की साड़ी के ऊपर ब्लाउज पहन लेती है, तो तूफान खड़ा हो जाता है। वहां स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों की कमी नहीं है, लेकिन वास्तविक 'शिक्षा' से शिक्षित लोग कम ही हैं। उन संस्थाओं से निकलकर युवा या तो डिग्रीधारी अशिक्षित बनते हैं या फिर कट्टरवादी।