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साहित्य : अपनी ही कविता के निशाने पर आईं दीदी, चर्चाओं में है लेखन
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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी।
- फोटो :
PTI (फाइल फोटो)
विस्तार
आजकल पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी के लेखन और उनके साहित्य की चर्चा है। उनकी एक काव्य पुस्तक कविता वितान की पहली कविता को लेकर अच्छी-बुरी हर तरह की प्रतिक्रिया मिल रही हैं। यह कविता शुरू होती है एपांग, ओपांग, झपांग, बाकी सब डांग-डांग पंक्ति से। इसी पुस्तक पर ममता को पिछले साल बांग्ला साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला था। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को नोटा से भी कम वोट मिलने पर उनकी इस कविता की पैरोडी बनाई जा रही है। अभी पश्चिम बंगाल में सरकारी कर्मचारी केंद्रीय कर्मचारियों के बराबर महंगाई भत्ते की मांग कर रहे हैं। उनके धरने में भी एक पोस्टर दिखा, जिसमें एपांग, ओपांग कविता की व्यंग्यात्मक चर्चा थी।
कोलकाता उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति अभिजीत गांगुली विगत जनवरी में माइकल मधुसूदन पुस्तकालय के एक कार्यक्रम में गए, तो वहां ममता की इस कविता पुस्तक को देखते ही उनका पारा गर्म हो गया। वह कह उठे थे कि अगर ऐसी पुस्तकें पुस्तकालयों में रखी गईं, तो दीमकों के सिवा किसी का भला नहीं होगा।
ममता बनर्जी की ऐसी ही एक कविता है- हरेकर कंबा, हंबा, हंबा, हंबा। पिछले विधानसभा चुनाव में जब भाजपा के बाहर से पहुंचे नेता पश्चिम बंगाल में धुआंधार चुनाव प्रचार कर रहे थे, तब ममता ने इसी कविता का पाठ कर व्यंग्य किया था, जिसका मतलब यह था कि बाहर के लोग बंगाल में आकर हंबा-हंबा (गाय-बैलों का रंभाना) कर रहे हैं।
ममता बनर्जी ने एकाधिक बार कहा है कि उन्होंने जान-बूझकर ऐसी कविताएं लिखी हैं। पिछले साल उन्हें यह कहते हुए सुना गया था कि जब वह बच्ची थी, तो छोटी-छोटी कविताएं पढ़ती थी, जैसे आय बृष्टि झेंपे, धान देबो मेपे, (वर्षा खूब झूमकर आओ, तुम्हें नापकर धान दूंगा)। पर उन पर तो कभी किसी ने सवाल नहीं किया। वह कह रही थीं, 'जब आप बच्चे के लिए कुछ बनाते हैं, तो आपको पहले बच्चे को कपड़े भी पहनाने होते हैं। मन बालक जैसा होना चाहिए। तभी आप बच्चे को उसके तरीके से पढ़ा सकते हैं।' साहित्य से जुड़े लोग अभिधा, लक्षणा और व्यंजना के बारे में जानते हैं। ममता की ज्यादातर कविताएं भी अभिधात्मक अभिव्यक्तियां हैं। कहा तो यह भी जा सकता है कि आज की कविता का एक बड़ा हिस्सा भी अभिधा साहित्य ही है।
ममता बनर्जी का अधिकांश लेखन गद्य में है। इसमें शक नहीं कि वह एक संवेदनशील कवयित्री व लेखिका हैं। दीदी के लेखन में वही सादगी व आक्रामकता है, जो उनके जीवन और राजनीतिक शैली में हम देखते आ रहे हैं। 'मां, माटी, मानुष' बाद में तृणमूल का नारा बना, जबकि उनके साहित्य में तो यह पहले से ही मौजूद है। वर्ष 1996 में प्रकाशित मां काव्य पुस्तक उन्होंने अपनी मां गायत्री देवी को समर्पित की थी। बंगाल की माटी पर उन्होंने सोनार बांग्ला कविता लिखी। वाम जमाने में पुलिस हिरासत से लापता हुए बिहार के प्रवासी मजदूर भिखारी पासवान के परिवार वालों की पीड़ा ममता ने फिरबे ना कविता में व्यक्त की है।
वर्ष 1995 में प्रकाशित पुस्तक अभिव्यक्ति में ममता ने अपने संघर्षमय राजनीतिक जीवन की जैसे आत्मकथा लिखी है। इस साल पुस्तक मेले में भी उनकी छह नई पुस्तकें रखी गई थीं। बहुत कम लोगों को पता होगा कि अब तक उनकी 128 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं और अन्य चार-पांच पुस्तकों पर काम चल रहा है। राजनीति में चौतरफा हमले झेलने वाली ममता लेखन के लिए इतना समय निकाल लेती हंै, तो यह साधारण बात नहीं। अपनी कई जनसभाओं में वह वेतन न लेने की बात बता चुकी हैं। उनके निजी खर्च किताबों की रॉयल्टी से पूरे हो जाते हैं।
जाहिर है, उसकी किताबें बिकती हैं। वाम मोर्चे के दौर में उसकी जनसभाओं और नुक्कड़ सभाओं में भी मार्क्सवादी साहित्य के स्टॉल लगाए जाते थे और किताबें बिकती थीं। ममता के मामले में भी शायद ऐसा ही हो कि उनकी किताबें उनसे प्यार करने वाले या तृणमूल के कैडर ही पढ़ते हों? पर यह क्या कम है कि सोशल मीडिया की इस आंधी में भी बंगाल ने पढ़ने की संस्कृति बनाए रखी है?