अब क्या हो गया है वक्त को
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सिनेमा में हम जो दिखाते हैं, वह जीवन से ही आता है। मैंने अभी तक जो फिल्में बनाई हैं, वे मेरी जिंदगी से जुड़ी हैं। उनके विषय ऐसे हैं, जिनके बारे में मैं सोचता रहा हूं। जिन बातों में मेरा विश्वास है। चाहे अहिंसा की बात हो या शिक्षा व्यवस्था की। मैं फिल्मों के लिए कहानियां ढूंढता रहता हूं। कहानियां जीवन से आती हैं। मेरी फिल्मों में कई ऐसे लोकप्रिय दृश्य रहे हैं, जो मैंने आंखों से देखे या जिनमें मैं स्वयं पात्र रहा। थ्री इडियट्स के माधवन की बात करता हूं। मेरे पिता नागपुर में टाइपराइटिंग इंस्टीट्यूट चलाते थे। टाइपराइटर्स-कैलकुलेटर बेचते थे। मैंने तब 12वीं तक पढ़ाई की थी और आगे कॉमर्स पढ़ रहा था। फाइनल एग्जाम सिर पर थे और मैं परीक्षा में नहीं बैठना चाहता था। डर था कि फेल हो जाऊंगा, तो डांट पड़ेगी। हफ्ता भर हो गया। मैं पिताजी से कहना चाहता था कि मुझे अकाउंट्स का डेबिट-क्रेडिट समझ में नहीं आता। आगे यह नहीं पढ़ूंगा। आखिरकार परीक्षा से एक दिन पहले हिम्मत करके पिताजी से मन की बात कह दी। उन्होंने एक सेकेंड मुझे देखा और कहा कि तो क्या समस्या है? छोड़ दो। मेरे साथ आ जाओ, काम करो। उस समय मुझ पर से जो दबाव हटा और जो राहत तथा खुशी मैंने महसूस की, वैसा एहसास आज तक नहीं हुआ। यही दृश्य मैंने माधवन और उसके पिता को लेकर सिनेमाई अंदाज में बुना था।
कई बार अलग-अलग बातें मिलकर एक ठोस बात बन जाती है। लगे रहो मुन्नाभाई में एक व्यक्ति बार-बार सीढ़ियों से उतरते हुए एक दरवाजे के सामने थूकता है, और जिसका घर है, वह बेबस होकर सोचता है कि थूकने वाले का क्या करे। मैं एक बार मुंबई में बाइक पर कहीं जा रहा था और डबल डेकर बस में ऊपर से किसी ने थूका, जो मुझ पर गिरा। मैं बाइक छोड़कर गुस्से से बस में घुस गया कि कौन है...और बस चल पड़ी। मेरी स्थिति अजीब हो गई। अचानक महूसस हुआ कि क्या कर रहा हूं...किसे पकड़ूंगा। मैं उतर आया। फिर एक घटना मेरी सासू मां से जुड़ी है। ग्राउंड फ्लोर पर उनका घर और छोटा बगीचा था। ऊपर रहने वाली एक महिला अंडे के छिलके और कचरा फेंका करती थी। नीचे से नौकरानी चिल्लाती थी, तो ऊपर से वह गाली देती थी। एक दिन सासू मां ने अंडे के छिलके और फेंका गया कचरा एक पॉलीथिन में भरा। उस महिला के घर पहुंचीं और मुस्कराते हुए कहा कि यह लीजिए, आपका सामान नीचे गिर गया था। उसके बाद ऊपर वाली महिला ने कभी कचरा नहीं फेंका। दोनों घटनाओं को मिलाकर फिल्म का दृश्य बना, जिसमें गांधीजी का संदेश बुना था कि अगर आप किसी चीज का गुस्से से सामना करेंगे तो गुस्सा ही लौटेगा।
मेरे सिनेमा में व्यंग्य होता है। मुझे लगता है कि बचपन में जो कुछ आप पढ़ते हैं, उनका जीवन और सोच पर गहरा असर होता है। नागपुर के पास जबलपुर में मेरे पसंदीदा लेखक हरिशंकर परसाई रहते थे। उनके व्यंग्य अच्छे लगते थे। परसाई जी को खूब पढ़ता था। उन दिनों किताबें इतनी आसानी से नहीं मिलती थी। मुझे परसाई जी के सारे व्यंग्य चाहिए थे। छोटी-छोटी किताबें मिलती थीं। उनका संपूर्ण संकलन जब मुझे मिला, तो मैंने सोचा कि इसे पूरा पढ़ूंगा, तब उनसे मिलने जाऊंगा। लेकिन जब तक सारा कुछ पढ़ा, वह गुजर गए। उनसे मिलने की मेरी इच्छा रह गई। शरद जोशी को भी खूब पढ़ा। स्कूल-कॉलेज के दिनों में साहित्य पढ़ता था। कविताएं अच्छी लगती थीं। हरिवंश राय बच्चन की ढेरों कविताएं कंठस्थ थीं।
12वीं के बाद मैंने पिताजी के काम में हाथ बंटाने के साथ कॉलेज में बी.कॉम की पढ़ाई शुरू की थी। फर्स्ट ईयर में मेरी ऐसे लोगों से मुलाकात हुई, जिन्हें नाटक का शौक था। हमने एक ग्रुप बना लिया, आवाज। इसके बाद नाटकों को लेकर हम गंभीर हो गए। आवाज बनाने के अगले तीन साल बाद हमने पूरे जुनून के साथ नाटक किया। हम नाटक तैयार करते थे, टिकटें छापते और बेचते थे। नतीजा यह कि शहर में नियमित अंतराल से थियेटर होने लगा था। यहां पिताजी ने फिर मेरी जिंदगी को नई राह दिखाई। मुझे लगता है कि वह वक्त और समाज से आगे के इंसान थे। बहुत प्रोग्रेसिव। वह विभाजन के दौरान पाकिस्तान से आए थे। उन्होंने नाटकों के प्रति मेरा जुनून देखा, तो कहा कि तू फिल्मों में जा। लोगों को लगा कि वह पागल हो गए हैं, नागपुर से किसी को कह रहे हैं फिल्मों में जाने को। लेकिन उन्होंने खुद पूना इंस्टीट्यूट का प्रॉस्पेक्टस लाकर दिया। यहीं से मेरी जिंदगी बदल गई। पढ़ाई के दिनों में मैं बहुत औसत छात्र था, जबकि इंस्टीट्यूट में मुझे छात्रवृत्ति मिलने लगी, क्योंकि मैं बढ़िया कर रहा था। पिता को गुजरे अब दो साल हो गए हैं। उन्होंने मेरी तीनों फिल्में देखी और बहुत खुश हुए।
पहले मैं वक्त निकाल कर जितना पढ़ता था, अब उतना नहीं पढ़ पाता हूं। अक्सर सोचता हूं कि पहले तो खूब वक्त हुआ करता था, अब क्यों नहीं होता। क्या हो गया है वक्त को? ऐसा लगता है कि अब वक्त बिखर जाता है। हाथ नहीं आता। हालांकि रात को कुछ जरूर पढ़ता हूं, क्योंकि पढ़े बगैर नींद नहीं आती। पहले ज्यादातर कहानी-किस्से पढ़ता था, लेकिन आठ-दस साल से फिक्शन पढ़ना कम हो गया है। अब नॉन-फिक्शन पढ़ने में ज्यादा मजा आता है। मुझे लगता है कि छोटे शहरों में बहुत कहानियां बिखरी हैं। कई बार मन करता है कि लिटरेचर से भी कहानियां लूं। कभी कुछ ठोस मिला, तो जरूर फिल्म बनाऊंगा।