{"_id":"2f6f870b3062b06bdc50cf18fe8dfa66","slug":"now-time-to-know-aap","type":"story","status":"publish","title_hn":"अब तो अपने आप को पहचानें","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
अब तो अपने आप को पहचानें
यशवंत व्यास
Updated Thu, 12 Dec 2013 02:17 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
अगर आप यह इंतजार करें कि जब हर चौराहे की बत्ती हरी हो जाए, तब घर से निकला जाए, तो आप कभी घर से नहीं निकल सकेंगे। - जिग जिगलर
विज्ञापन
हमें किसी दोस्त को पहचानने के लिए उसके नाक की नाप नहीं लेनी पड़ती। - एडवर्ड डिबोनो
ये दोनों सूक्तियां स्वयं को महापुरुष बनाने के प्रबंधकीय नुस्खे सुझाने वाले प्रख्यात लोगों की है। इन सूक्तियों से कई मैनेजर अनुप्राणित होते हैं। लेकिन कांग्रेस और उनके प्रचारकों को इनसे अद्भुत प्रेरणा मिलती प्रतीत होती है।
विज्ञापन
वे चौराहों की हर बत्ती को अपने हिसाब से हरा करने के लिए ट्रैफिक नियंत्रण कक्ष में खड़े हो जाने को जिंदगी का सूत्र मानते हैं। वे दोस्तों को पहचानने के लिए नाक की नाप नहीं लेते, बल्कि पहले नाक की नाप तय करके उसे दोस्ती का मीटर घोषित करने में यकीन रखते हैं।
विज्ञापन
यही वजह है कि बेहद दिलचस्प अंदाज में वे हार, जीत, रणनीति, नायक, सांप्रदायिकता और विकास का कहावत-कोश प्रकाशित करते हुए अत्यंत मुदित नजर आते हैं। यह मुद्रा अब भी है और लगता है कि जरा मौका लगा, फिर खिल जाएगी।
नौ सद्विचार
ताजा विधानसभा नतीजों का जो खास सबक है, वह अपने आप की पहचान का है। 'आप' के केजरीवाल को कोसने वाले विश्लेषक अब भी अपना राग चला रहे हैं, गोया उनके लिए यही सबसे बड़ा खतरा है कि तथाकथित व्यक्ति केंद्रित राजनीति का उदय हो रहा है।
इंदिरा गांधी से लेकर राहुल-मोदी तक व्यक्ति केंद्रित राजनीति में कोई संदेश न खोजने वाले ये महान विश्लेषक आम आदमी की इस अकुलाहट का उत्तर खोजने से क्यों डरते हैं कि उसे कोई दलगत विचार अब आश्वस्त नहीं करता?
ठीक इसके उलट इसे मानने में क्या संशय होना चाहिए कि यही विश्लेषक इन घटनाओं को एक ही समय में एक साथ घटित होते देखने से तो कई नहीं डरते-
1. धैर्य : आसाराम और नारायण साईं का सत्य
2. पत्रकारिता : तरुण तेजपाल और थिंक फेस्ट के प्रायोजक
3. न्याय : जस्टिस गांगुली और इंटर्न के क्षण
4. शासन : मंत्री, तिहाड़ और फेरबदल
5. प्रशासन : वाड्रा-डीएलएफ मामला उठाने पर चार्जशीटेड खेमका
6. राजनीति : सीजी, टूजी, थ्रीजी और अनंत जी-हुजूरी
7. बाजार : राडिया के टेप और रोज की रोटी-सब्जी
8. माफिया : शिक्षा, जमीन, स्वास्थ्य और शराब पर कॉमन कब्जा
9. दर्शन : विकास के साथ-साथ भ्रष्टाचार
बिजूका और मजाक
हमें सुझाव दिया जाता है कि एक ही महीने में यदि यह सब एक ही केंद्र से घटित होता है, तो भी इसे इस तरह देखना 'सिनिसिज्म' है। हमें सिर्फ दंगों को देखना चाहिए या कॉमनवेल्थ गेम्स के फ्लाईओवर देखना चाहिए। या तो कार चलाने वाले देखिए या तलवार चलाने वाले देखिए।
अगर आसानी से यह साबित किया जा सके कि सब एक-दूसरे की फोटो कॉपी हैं, तो ओरिजिनल से काम चलाने में ही भलाई है। यही समझाने में जंतर-मंतर, रामलीला से लेकर गुड़गांव-मुजफ्फरनगर एक कर देने की राजनीतिक चतुराई दिखाई जा रही है और यह मानने में ही तकलीफ हो रही है कि मोदी मजाक नहीं हैं, केजरीवाल खेत में खड़ा बिजूका नहीं हैं।
ये संयुक्त संदेश है। मगर संदेश को समझते हुए भी न समझने की शक्ति सिर्फ और सिर्फ अहंकार से ही आती है। कांग्रेस के पास अहंकारों के उत्तर सिर्फ अहंकार में हैं। मामूली से मामूली आदमी भी जानता है कि कांग्रेस का कोई पत्र सोनिया-राहुल के बिना नहीं खटक सकता, मगर प्रस्तुति ऐसी होती है, जैसे मंत्रियों-कामगारों की गलती दुरुस्त करने के लिए उन्हें मजबूरन आगे आना पड़ता है।
हर समय अल्पसंख्यकों के डर, प्रशासकीय कलाबाजी और सत्ता बनाए रखने की क्षमता का हवाला देते हुए भविष्य की ओर देखने का आह्वान किस्से बनाता है, झांकी सजाता है या 'देखो दूसरे भी उतने ही बुरे हैं' का भय दिखाता है। जब इसकी अति होती है तो अपने ही गढ़े हुए किस्से इतने सच लगते हैं कि सच्चाई भी उनके लिए 'बिजूका' और 'मजाक' हो जाती है।
एक सच्ची कहानी
जनता जंतर-मंतर पर भी इकट्ठी हुई थी। जनता मोदी की रैलियों में भी इकट्ठी हुई थी। तब एक महान समाजवादी नेता भी सत्तासीन भद्रजनों के साथ संसद में चीख रहे थे कि ये सिविल सोसायटी हम जनता के चुने हुए लोगों को सिखाएगी कि देश कैसे चलाना है? इनकी फिल्म चलाना बंद करो।
मोदी के भाषण को मनमोहन-राहुल के साथ दिखाना शुरू हो गया तो एक क्रांतिकारी विचार दिया गया - इस कॉरपोरेट षड्यंत्र को रोको। गोया कॉरपोरेट, जनता को चला ले जाएंगे या संसद में एक बार चले गए लोग जनता के सिर काटने के एकमात्र अधिकारी हो जाएंगे।
चंदे के हिसाब वाले जानते हैं कि कारोबारी उस हर आदमी की जेब भरने को तैयार मिलेंगे जो राज-काज को दाएं-बाएं कर सकता हो। उन्हें मोदी या राहुल से कोई फर्क नहीं पड़ता। उधर जिंदगी का हिसाब करने वाले भी जानते हैं कि जिन्हें उन्होंने चुनकर भेजा, उन्हें तिहाड़ की सेवा के लिए तो नहीं ही भेजा था।
तब खेल क्या बचता है? सिर्फ मुद्राओं का? सिर्फ मुहावरों का? सिर्फ किस्से-कहानियों का? ऐसे में एक सच्ची कहानी बिना लाइसेंस का डर दिखाए जिंदा-जावेद खड़ी है। केजरीवाल की शक्ल में इसने प्रकट किया है कि परेशान हाल जनता को रास्ता दो, वह बाजीगरों का बाजार उठाना चाहती है। ईमानदार विकल्प संभव है।
पारंपरिक राजनीति ने नरेन्द्र मोदी से निस्तेज पड़ी कांग्रेस को अब भी यदि लूट के नैतिक नियम बनाने से शर्म की अनुभूति नहीं होती तो उसके विश्लेषण इसी 'चालीसा' पर टिके रहेंगे कि एक दिन सब निराश होकर फिर उसकी ही शरण में लौटेंगे।
यह सचमुच कितना भयानक है।
आहट को सुनने के बजाय, अहंकार का पाठ!
इस पाठ से जो बचेगा, वही अंतत: बचेगा।
अभी तो कलावती की कहानी का सच भी यही है।