अब अध्यक्षीय शैली की सरकार
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हालिया संसदीय चुनाव में अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तरह प्रचार अभियान चलाकर देश भर में पांच सौ से अधिक रैलियों को संबोधित करने वाले नरेंद्र मोदी ने अध्यक्षीय शैली की सरकार के गठन में समय नहीं गंवाया। भारत में ऐसा इससे पहले कभी नहीं देखा गया था। पर्याप्त बहुमत के साथ सरकार की कमान संभालने के बाद वह अपने ढंग से शासन को आकार देने में तेजी से जुट गए हैं। मंत्रिमंडल में बेशक नए लोगों के साथ वरिष्ठ भी शामिल हैं, पर सरकार के प्रमुख निर्णयों पर अब तक मोदी की असंदिग्ध छाप रही है। उन्हें नेतृत्व संभाले हुए लगभग एक हफ्ता हुआ है, पर जिस आत्मविश्वास और कुशलता से उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में फैसले लिए हैं, वह दर्शाता है कि इसके लिए उन्होंने वर्षों तैयारी की है और उन मुद्दों पर चिंतन किया है, जिनसे भारत जूझता है। संदेश स्पष्ट है-वही होगा, जो वह चाहते हैं और कोई विरोध बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। अध्यादेश के जरिये अपने प्रधान सचिव के तौर पर नृपेंद्र मिश्र की नियुक्ति इसका उदाहरण है।
हर सप्ताह केंद्रीय मंत्रियों और सचिवों के साथ बैठक का उनका फैसला यह सुनिश्चित करेगा कि उनके फैसले और कामकाज समग्र उद्देश्य की दिशा में हैं। जरूरत पड़ने पर वह हस्तक्षेप करने से हिचकेंगे नहीं। यानी सारी शक्ति उन्हीं के पास केंद्रित होगी। मंत्रिमंडल के प्रमुख होने के नाते सफलता का सारा श्रेय उनको जाएगा, लेकिन अगर कोई गड़बड़ी हुई, तो उसका दोष भी उन्हें ही स्वीकार करना पड़ेगा। मंत्रीगण दरअसल उनके ऑर्केस्ट्रा के संगीतकार हैं, जबकि वह सभी दिशाओं में छड़ी लहराकर निर्देश देने वाले। आलोचक कह सकते हैं कि वह शक्ति का कुछ ज्यादा ही केंद्रीकरण कर रहे हैं और ज्यादा जोखिम ले रहे हैं, लेकिन क्या मोदी ने कभी जोखिम उठाने से परहेज किया है? राष्ट्रवादी हिंदू नेता होने के नाते वह 'वीरभोग्या वसुंधरा' के शताब्दियों पुराने कथन पर विश्वास करते हैं। पटेल और नेहरू के बाद पार्टी और सरकार में इतनी मजबूत स्थिति में दूसरे किसी नेता को नहीं देखा गया। अगर यही स्थिति बनी रही, तो वह दिन दूर नहीं, जब भाजपा कार्यकर्ता यह नारा देंगे-मोदी ही भारत है, भारत ही मोदी है! वैसे में संघ के मुख्यालय नागपुर का क्या होगा?
अलबत्ता मोदी के व्यक्तित्व में एक जबर्दस्त बदलाव देखा जा सकता है; चुनाव प्रचार के दौर की आक्रामकता के दिन गए। प्रधानमंत्री बनते ही वह बहुत सचेत हो गए हैं और यह महसूस कर रहे हैं कि 1.2 अरब भारतीयों की उम्मीदें उन पर टिकी हैं। एक अधीर राष्ट्र की बढ़ती आकांक्षाएं पूरी करना मोदी के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकता है।
अपने शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान समेत दक्षेस देशों के नेताओं को बुलाने का उनका फैसला साहसी था, क्योंकि पार्टी और संघ में कई ऐसे लोग थे, जिन्हें पाकिस्तान से संबंध बढ़ाने पर आपत्ति थी। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल के साथ समस्याएं नई नहीं हैं, पर वह उनसे ऊपर उठना चाहते थे। आर्थिक रूप से विकसित, समृद्ध और शांतिपूर्ण दक्षिण एशिया की अपनी सोच का हिस्सा बनने के लिए उन्होंने उन सबको आमंत्रित किया। शपथ ग्रहण के अगले ही दिन उन्होंने दक्षेस नेताओं से द्विपक्षीय बातचीत की। शपथ ग्रहण के चौबीस घंटे से भी कम समय में कभी किसी प्रधानमंत्री ने इतने पड़ोसी नेताओं के साथ बात नहीं की। चीन को आमंत्रित कर वह कूटनीतिक मोर्चे पर इससे भी बड़ा कदम उठा सकते थे, पर उससे अमेरिका और जापान को गलत संदेश जाता; खासकर जापान में, जो चीन की बढ़ती आक्रामकता की काट के रूप में भारत से नजदीकी संबंध बना रहा है।
दक्षेस देशों के नेताओं को बुलाने के निर्णय ने मोदी को एक परिपक्व एवं दूरदर्शी नेता के रूप में पेश किया, जो लीक से हटकर चलने का साहस रखता है। वर्षों तक संघ के प्रचारक रहने के बावजूद नवाज शरीफ को आमंत्रित करने के फैसले ने उन्हें शांतिदूत के रूप में पेश किया। प्रतीकात्मक तौर पर देखें, तो उनकी यह पहल वाजपेयी की लाहौर बस यात्रा से ज्यादा महत्वपूर्ण थी।
लेकिन विदेशी मोर्चे पर उपलब्धियां उनके कार्यकाल को यादगार नहीं बनाएंगी। वह सफल तो तब होंगे, जब अपने पूर्ववर्तियों से विरासत में मिली समस्याओं का कारगर समाधान खोज पाएंगे। महंगाई से हर कोई परेशान है। काले धन को वापस लाने की बात कहना आसान है, इस दिशा में कुछ निर्णायक कर पाना कठिन। हां, नवगठित एसआईटी यदि कोई ठोस परिणाम लाती है, तो उसका स्वागत किया जाएगा। मोदी ने चीन और जापान, दोनों देशों का दौरा किया है और उनकी नजर विदेशी निवेश पर है। यदि अर्थव्यवस्था रफ्तार पकड़ती है, तो निवेश की झड़ी लग जाएगी। आधारभूत परियोजनाओं के जरिये रोजगार निर्माण, भ्रष्टाचार एवं आपराधिक मामलों का त्वरित निष्पादन, समयबद्ध एवं प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र और गरीबी उन्मूलन की दिशा में गंभीर प्रयास का ही देश पर व्यापक प्रभाव हो सकता है।
मोदी यदि प्रधानमंत्री कार्यालय को सुपर पीएमओ बनाते हैं, तो भी उनके लिए उचित यही होगा कि वह प्रमुख राष्ट्रीय मुद्दों पर आम सहमति बनाएं। वह जानते हैं कि भारत गुजरात नहीं है, लेकिन वह इतने चतुर हैं कि केंद्र की सरकार भी अच्छी तरह चला सकते हैं। इसकी पूरी संभावना है कि वह दिल्ली को अपने ढंग से बदलने में सफल हों। भारतीय राजनीति में मोदी ने कम समय में ही अपना जैसा दबदबा बना लिया है, वैसा न तो मोरारजी देसाई, न नरसिंह राव और न ही अटल बिहारी वाजपेयी का था। मोदी एक विचार हैं, जिसका वक्त अब आ गया है।