सत्ता में हक मांगती भारतवंशी औरतें, दुनिया में बज रहा डंका
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अमेरिका में भारतीय मूल की कमला हैरिस के उपराष्ट्रपति बनने और न्यूजीलैंड में केरल में जन्मीं प्रियंका राधाकृष्णन के वहां की नई कैबिनेट में जगह बना लेने के साथ ही यह तो स्पष्ट हो गया है कि अब भारतवंशी महिलाएं भी राजनीति में अपनी हिस्सेदारी चाहती हैं। वे डॉक्टर, इंजीनियर, बैंकर या कोई और नौकरी करके ही संतोष नहीं कर लेना चाहती हैं। यह सात समंदर पार बसे भारतीयों में पहली बार बड़े स्तर पर देखने में आ रहा है। जिस भारतवंशी महिला ने सबसे पहले राजनीति में अपनी एक खास जगह बनाई, वह त्रिनिदाद टोबैगो की कमला प्रसाद बिसेसर थीं। वह किसी भी देश की राष्ट्राध्यक्ष बनने वाली पहली भारतवंशी महिला थीं। उनके पुरखे बिहार के बक्सर से त्रिनिदाद गए थे। कमला प्रसाद ने 2009 में प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते हुए भगवत गीता की प्रतिज्ञा ली थी। वैसे त्रिनिदाद में उनसे पहले बासुदेव पांडे 1995 से 2001 के दौरान प्रधानमंत्री रहे थे। लेकिन कमला जी की सफलता से भारत या दुनिया भर में फैले करोड़ों भारतवंशी नावाकिफ ही रह गए थे। तब तक सोशल मीडिया भी आज की तरह से सशक्त नहीं हुआ था।
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पर कमला हैरिस और प्रियंका राधाकृष्णन भारतवंशी महिलाओं के लिए उदाहरण के रूप में उभरेंगी। ये जरूरी भी है। आखिर सिर्फ भारतवंशी पुरुष ही क्यों सियासत करें? किसी देश के पहले भारतवंशी राष्ट्राध्यक्ष तो कैरिबियाई देश गयाना के छेदी जगन थे। छेदी जगन के पिता और मां उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले से गयाना ले जाए गए थे। छेदी जगन 11 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। उन्होंने गिरमिटिया का संघर्ष करीब से देखा था। वह 1961 में गयाना के प्रधानमंत्री चुने गए और 1992-1997 के दौरान वहां के राष्ट्रपति भी रहे। उन्होंने गयाना में पीपल्स प्रोगेसिव पार्टी का गठन किया। गयाना में उनसे प्रभावित होकर भारतवंशियों ने राजनीति में बड़े पैमाने पर आना शुरू किया। उनके बाद भरत जगदेव भी राष्ट्रपति बने। छेदी जगन के राष्ट्रपति बनने से पहले त्रिनिडाड और गयाना में गोरे या अश्वेत ही राजनीति कर रहे थे।
अंग्रेज मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और बिहार से साल 1839 से लेकर साल 1920 तक बहुत बड़ी संख्या में लोगों को गन्ने के खेतों में काम करने के लिए लेकर जाते रहे। उनमें से कुछेक तो फिर से अपने देश लौटे, पर अधिकतर दूर देश में जाकर ही बस गए। इन देशों में शिव सागर राम गुलाम (मारीशस), नवीन राम गुलाम (मारीशस), वासुदेव पांडे (त्रिनिदाद-टोबैगो), महेन्द्र चौधरी (फिजी), अनिरूद्ध जगन्नाथ (मारीशस), चंद्रिका प्रसाद संतोखी (सूरीनाम) वगैरह राष्ट्राध्यक्ष बनते रहे। पर कमला प्रसाद बिसेसर ने पुरुषों के एकछत्र राज को तोड़ा। देखा जाए तो उपर्युक्त देशों में भारतवंशियों का राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बनना बहुत कठिन भी नहीं है, क्योंकि इन सभी देशों में, जिन्हें लघु भारत या भारत के बाहर भारत कहा जा सकता है, में भारतवंशियों की आबादी खासी अधिक है।
पर भारतवंशी एस. रंगानाथन सिंगापुर जैसे देश के भी राष्ट्रपति बन रहे हैं। सिंगापुर में चीनी लगभग 76 फीसदी हैं। फिर मलेय भी मजे में हैं। यह मामूली उपलब्धि नहीं है। कमला हैरिस की अभूतपूर्व उपलब्धि पर चर्चा करते हुए एक बात याद रखी जाए कि उनके साथ एक दर्जन भारतवंशी अमेरिका की राज्य विधानसभाओं के लिए हुए चुनावों में जीते हैं। इनमें पांच महिलाएं भी हैं। इनके नाम हैं जेनिफर राजकुमार (न्यूयॉर्क), नीमा कुलकर्णी (केंटकी), केशा राम (वेरमंट), पदमा कुप्पा (मिशीगन) और वंदना स्लेटर (वाशिंगटन)। इनके अलावा चार भारतीय मूल के उम्मीदवार अमेरिका की प्रतिनिधि सभा में पहुंचे हैं। इनमें एक महिला प्रमिला जयपाल भी हैं। ये सब नतीजे साबित कर रहे हैं कि भारतवंशी महिलाएं खुलकर राजनीति में आ रही हैं।
अगर बात न्यूजीलैंड की लेबर पार्टी सरकार में बनी मंत्री प्रियंका राधाकृष्णन की करें, तो उन्होंने भी एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है। उन्हें प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न सरकार में जगह मिली है। हालांकि न्यूजीलैंड में भारतीय मूल के लोग सांसद बने हैं, पर मंत्री बनना सिद्ध कर रहा है कि आर्डर्न को उनमें बहुत उम्मीदें नजर आ रही हैं। यह अब शीशे की तरह साफ है कि भारतवंशी महिलाएं आने वाले समय में दुनिया के अलग-अलग देशों की राष्ट्राध्यक्ष भी बनेंगी।