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किसान आंदोलन के बीच अब गन्ना किसानों की नई चुनौती 

Tue, 16 Feb 2021 03:46 AM IST
के. सी. त्यागी के. सी. त्यागी
के. सी. त्यागी Published by: के. सी. त्यागी Updated Tue, 16 Feb 2021 03:46 AM IST
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Now challenge from Sugarcane farmers amid farmer protest
Farmers Protest - फोटो : अमर उजाला

केंद्र सरकार द्वारा पारित तीन कृषि कानूनों को समाप्त करने की मांग को लेकर चल रहे किसानों के विरोध-प्रदर्शन और धरने को अब लगभग 80 दिन बीत चुके हैं। 11वें दौर की बातचीत के बाद भी गतिरोध कायम है। प्रधानमंत्री द्वारा राज्यसभा और बाद में लोकसभा में दिए गए वक्तव्य से कुछ बर्फ अवश्य पिघली है। आंदोलन की पवित्रता को स्वीकार कर और वार्ता के लिए हर वक्त दरवाजे खुले हैं, का निमंत्रण निस्संदेह एक सुखद वातावरण तैयार करने में सहायक हो सकता है, लेकिन धरने में बढ़ती गन्ना किसानों की हाजिरी ने एक नया मोर्चा खोल दिया है। विभिन्न जिलों एवं राज्यों से आए किसान पिछले वर्ष का बकाया


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भुगतान करने और राज्य परामर्श मूल्य बढ़ाने की मांग कर रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि 12 अक्तूबर से गन्ने की पेराई का सीजन प्रारंभ हो चुका है। लगभग 455.4 लाख टन गन्ने की मिलों में पेराई की जा चुकी है। इससे लगभग 46.04 लाख टन चीनी का उत्पादन हो चुका है। गन्ना किसानों ने अब तक लगभग 12,000 करोड़ रुपये मूल्य के बराबर गन्ना आपूर्ति की है और उन्हें मात्र 4,448 करोड़ रुपये का ही भुगतान हुआ है। उल्लेखनीय है कि पिछले पेराई सत्र का लगभग 3,000 करोड़ रुपये का भुगतान अभी बकाया है। चीनी मिल मालिक चीनी का बाजार मूल्य बढ़ाने के लिए निरंतर दबाव बना रहे हैं। उनका तर्क है कि डीजल, बिजली के दाम और मजदूरी बढ़ने से चीनी का लागत मूल्य भी बढ़ रहा है। दूसरी ओर किसान संगठनों का आकलन है कि विगत वर्षों में गन्ना उत्पादन में लागत मूल्य में प्रति बीघा 10 हजार से 13,700 रुपये तक वृद्धि हो चुकी है। अकेले डीजल में लगभग 18 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई है और मोटर पंप की बिजली दर की बढ़ोतरी में वृद्धि 700 रुपये से बढ़कर 1,750 रुपये  हो गई है। लिहाजा सरकार द्वारा घोषित गन्ना मूल्य से अब किसान घाटे के सौदे में है और अतिरिक्त बढ़े दाम की दरकार है।

इस बीच, नीति आयोग के एक कार्य बल ने किसानों की चिंता व असंतोष को और बढ़ा दिया है। आयोग ने गन्ने की खेती का रकबा घटाने की सलाह देकर उन्हें दुविधा में डाल दिया है। रिपोर्ट में गन्ने की खेती की लागत बढ़ने के कई दुष्परिणाम बताए गए हैं, लेकिन इससे निपटने वाले विकल्पों को लेकर रिपोर्ट खामोश है। बकौल नीति आयोग एक किलो चीनी बनाने में डेढ़ से दो हजार लीटर पानी खर्च होता है। देश में चावल और गन्ना खेती की सिंचाई में कुल पानी का 70 फीसदी खर्च होता है। ऐसी स्थिति में भी देश के निर्यात में सर्वाधिक हिस्सेदारी चावल और चीनी की ही है। नीति आयोग की सिफारिशों में गन्ने की खेती का रकबा कम से कम तीन लाख हेक्टेयर घटाने की जरूरत बताई गई है, जिससे 20 लाख टन चीनी का उत्पादन भी घट जाएगा। जबकि वर्तमान में लगभग पांच करोड़ किसान गन्ना उत्पादन के व्यवसाय से जुड़े हुए हैं और श्रमिक कार्य बल में भी लगभग पांच लाख श्रमिक शामिल हैं, रकबा घटने से इनके रोजगार पर असर पड़ सकता है। 

गन्ना किसानों पर यह संकट 1991 के नव उदारवादी आर्थिक नीतियों को लागू किए जाने से और बढ़ा है। पहले गन्ने का दाम तय करते समय छह मुख्य बातों का ध्यान रखना पड़ता था–गन्ना उगाई की लागत, अगर गन्ने की जगह किसान दूसरी फसल बोता है, तो उस पर कितना मूल्य मिलता है, उपभोक्ता को किस दाम पर चीनी मिल रही है, उपभोक्ता किस दाम पर खुले बाजार में चीनी खरीद रहे हैं, गन्ने से चीनी की रिकवरी कितनी है, गन्ने के सह उत्पाद जैसे शीरा, आदि से होने वाली आय। इस पुराने भार्गव फार्मूले के तहत चीनी एवं उसके सह उत्पादों की कीमतों में वृद्धि से किसानों को उसमें हिस्सा मिलता था, जो नई कार्यप्रणाली लागू होने पर स्वतः समाप्त होगा। केंद्र एवं राज्य सरकारों से अपेक्षा है कि कृषि संकट को लेकर ग्रामीणों को कई मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है, लिहाजा नई योजनाओं के क्रियान्वयन पर फैसला फिलहाल स्थगित करना राष्ट्रहित में होगा। 

(- लेखक पूर्व सांसद व जनता दल (यू) के महासचिव हैं)
 

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