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उपन्यास की जमीन

Sat, 21 Dec 2013 09:36 PM IST
सुनील वत्स
सुनील वत्स Updated Sat, 21 Dec 2013 09:36 PM IST
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Novel of the land

उपन्यास की जमीन, संपादक- कृष्ण कुमार

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प्रकाशक-विजया बुक्स ,दिल्ली
मूल्य-495 रुपये

रचना की इस जमीन पर जिंदगी के कितने घर हैं?

-सुनील वत्स

वास्तव में रचना की जमीन की कोई हद नहीं होती है और न ही कोई बंदिश। 'उपन्यास की जमीन' कृति को पढ़ते हुए बाबू श्यामसुंदर दास की पढ़ी हुई एक बात याद आती है, ‘यदि हम साहित्य को जीवन की व्याख्या मानें तो आलोचना को उसकी व्याख्या की व्याख्या मानना पडे़गा।’ कोई साहित्यकार अपनी जिंदगी के छोटे-छोटे लम्हों और अनुभवों के जिन तत्वों से साहित्य का सृजन करता है, आलोचना उन्हीं तत्वों का मूल्यांकन करती है, यानी सम्यक भाव से कृति का समग्र मूल्यांकन। क्योंकि आलोचना में किसी किस्म के पूर्वाग्रह का कोई स्थान नहीं है।

हां, इतना जरूर है कि किसी उपन्यास को अनुभव की कसौटी पर कसना उसकी पहली बुनियादी शर्त है। ऐसे में अगर उपन्यास में उत्तर आधुनिक जिंदगी की दास्तां हो तो यह और भी लाजिमी हो जाता है। जहां यथार्थ की गहनता और जिंदगी का अनुभव सबसे अहम पहलू बनकर उभरते हैं। कुछ ऐसे ही नामचीन आलोचकों ने कथाकार मिथिलेश्वर की कृतियों को आधार बनाकर समकालीन उपन्यासों का अपने समय के संदर्भ में मूल्यांकन करते हुए उपन्यासों की जमीन खंगाली है। जिनका संकलन शिक्षक, कथाकार और आलोचक कृष्ण कुमार ने किया है।
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इन उपन्यासों की जमीन में आम इंसान के सपनों की टूटन, बिखरते मूल्यबोध से उपजी कुंठा, रिश्तों के बीच पसरती खामोशी, भीतरी और बाहरी द्वंद्वों के पाटों में पिसते हुए जज्बात और सबसे अहम हर तरह के अंतर्विरोधों के स्वर पाए जा सकते हैं। यहां काल्पनिकता है भी तो सिर्फ जीवन की उम्मीद को जगाने के लिए। हालांकि यह भी थोथी ही साबित होती है। वजह है कि उत्तर आधुनिकता हर उस चीज का विरोध करती है, जिससे वह पैदा होती है।
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मिथिलेश्वर के राजनीतिक उपन्यास 'सुरंग में सुबह', ग्रामीण जीवन के लगातार बदलते यथार्थ पर 'यह अन्त नहीं', स्त्री और दलित विमर्श पर 'माटी कहै कुम्हार से', वास्तविक प्रेम पर 'प्रेम न बाड़ी उपजै', रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर 'युद्धस्थल' और सामंती समाज की पृष्ठभूमि पर लिखा गया उपन्यास 'झुनिया' की आलोचकों ने गहनता से पड़ताल की है। जैसे वरिष्ठ आलोचक मैनेजर पांडेय ने 'सुरंग में सुबह' के जरिये लोकतंत्र के संकटों की पहचान की है।

उनके मुताबिक, उपन्यास से गुजरते हुए सांप्रदायिकता को देश के लिए बड़े खतरे के रूप में जाना जा सकता है। उन्होंने झूठ और लूट के पूंजीवाद पर आधारित लोकतंत्र के बजाय किसी तीसरे किस्म के लोकतंत्र की तलाश को अनिवार्य बताया है। वहीं प्रभा खेतान ने इसे उत्तर आधुनिक करार देते हुए उपन्यास को जमीन से जुड़ा बताया है। वहीं ‘यह अन्त नहीं' को वरिष्ठ साहित्यकार विजेंद्र नारायण सिंह ने बीसवीं सदी का महाकाव्यात्मक आख्यान कहा है।


किताब में शिव कुमार मिश्र, विनोद शाही, प्रफुल्ल कोलख्यान, विश्वरंजन, रामसुधार सिंह, बलराज पांडेय, विवेक द्विवेदी, गोपाल राय और रंजना श्रीवास्तव जैसे चर्चित आलोचकों के लेखों का संग्रह किया गया है। उपन्यास की नई जमीन की समझ विकसित करने में ये लेख पाठकों के लिए काफी अहम साबित हो सकते हैं।

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