पीके कोई काम नहीं करना चाहिए
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देखो जी, यूपी में पीके भले टैक्स फ्री हो गई हो, पर बुजुर्गों की यह बात माननी चाहिए-पीके कोई काम नहीं करना चाहिए। डॉक्टर भी यही कहते हैं, घरवाले भी और कानून भी। पीके कोई त्योहार नहीं मनाना चाहिए, पीके पार्टी नहीं करनी चाहिए, जश्न नहीं मनाना चाहिए, नववर्ष भी नहीं मनाना चाहिए, जो कि अक्सर पीके ही मनाया जाता है। भाई सर्दी का मौसम है। फिर यह तो दिल्ली की सर्दी है, कोई मामूली सर्दी नहीं। इसके सामने तो इंग्लैंड की सर्दी भी शरमा जाए, शिमला की सर्दी भी सिसकारियां भरने लगे। इसका कनेक्शन सीधे साइबेरिया से जुड़ता है। वैसे ही, जैसे दिल्ली की गर्मी का सीधा कनेक्शन राजस्थान के मरुस्थल से जुड़ता है और बेमौसम की बारिश का सीधा कनेक्शन वेस्टर्न डिस्टरबेंस से जुड़ता है।
टशन में आप यह समझ लेते हो कि पीके गर्मी मिलेगी। पर ऐसा जरूरी नहीं। उल्टे सर्दी की मार भी पड़ सकती है, ऐसा डॉक्टरों का कहना है। गुलाबी सर्दी का मतलब यह तो नहीं कि पीके सब कुछ गुलाबी ही देखो। वैसे ही, जैसे बिजली का मंडोला में पीके भैंस भी गुलाबी ही दिखती थी। जबकि अपने यहां तो मुहावरे में काला अक्षर भी भैंस बराबर ही होता है। वैसे किस्से तो भूरी भैंस के भी खूब मिल जाएंगे। पर गुलाबी भैंस के कतई नहीं मिलेंगे।
पीके ड्राइविंग भी नहीं करनी चाहिए। गाड़ी पर कंट्रोल ही नहीं रहता जी। और अब तो यह साबित हो गया है कि पीके फिल्म भी नहीं बनानी चाहिए। तारीफें मिलते-मिलते आलोचना होने लगती है। विरोध में आंदोलन होने लगते हैं। पीके कोई वाहियात सी, बेसिर पैर वाली, उलजुलूल फिल्म बना दो, तो किसी को कोई ऐतराज नहीं होता। दर्शक भी सिनेमाघरों की तरफ जाने के बजाय घर में टेलीविजन देखना पसंद करेंगे। पर पीके नाम से कोई फिल्म नहीं बनानी चाहिए। कम से कोई सेंसिबल फिल्म तो नहीं ही बनानी चाहिए। इससे दर्शक नाराज हो सकते हैं कि हमारा नशा क्यों खराब किया, हमें नींद से क्यों जगा दिया, हमारे दिमाग पर इतना बोझ क्यों डाल दिया, आदि-आदि।