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नायक नहीं, लोक की प्रतिष्ठा

Wed, 25 Jan 2017 07:29 PM IST
रामचंद्र राही
रामचंद्र राही Updated Wed, 25 Jan 2017 07:29 PM IST
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Not hero, but common man to be stablsh
रामचंद्र राही

यह भारत के लोगों के लिए गौरव की बात है कि हमारे देश में साम्राज्यवाद की गुलामी से मुक्ति के बाद बालिग मताधिकार की बुनियाद पर गणतंत्र की अवधारणा प्रतिष्ठित की गई और एक संविधान की रचना की गई, जिसकी मर्यादा में हम आगे बढ़ रहे हैं। गणतंत्र के दो पहलू हैं-एक गण और दूसरा तंत्र। महात्मा गांधी ने आजादी के बाद एक योजना बनाई थी कि चूंकि राज्य सदियों से एक मान्य शक्ति का केंद्र है और राजशाही, साम्राज्यशाही से आगे बढ़ते हुए हम लोकशाही तक आए हैं, जिसमें निर्णायक केंद्र बिंदु लोक है। इसलिए गांधी जी ने कहा था कि हमारी संस्थाएं लोकतंत्र के बुनियाद पर स्थापित हों। उन्होंने एक ऐसी अवधारणा दी थी कि हर निर्वाचन क्षेत्र में संगठित और जागरूक मतदाताओं का एक मंडल होगा, जो यह तय करेगा कि हमारा प्रतिनिधित्व कौन व्यक्ति करेगा। उस प्रतिनिधि का नियंत्रण लोक के हाथ में होगा, तभी हमारा लोकतंत्र एक वास्तविक लोकतंत्र का विकल्प पेश कर सकेगा। लेकिन यह संयोग कहिए या दुर्भाग्य कि हमारे देश के प्रबुद्ध लोगों ने इस बात को उतनी तरजीह नहीं दी।

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जब से हम भारत के लोगों ने देश को लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित कर संविधान को स्वीकार किया, उसके बाद से ज्यादातर लोकतंत्र का स्वरूप पार्टियों के इर्द-गिर्द सिमट गया। पार्टियां लोगों को खेमे में बांटकर सत्ता पर अपनी पकड़ बनाने की कोशिश करने लगीं। नतीजतन आज हमारा लोकतंत्र नेता, धनपति और अफसरशाही के नियंत्रण में आ गया है। इससे शक्ति नीचे की जगह ऊपर केंद्रित हो गई है। इसलिए हम देख रहे हैं कि हमारा लोकतंत्र लोक की शक्ति बढ़ाने के बजाय राज्य की शक्ति बढ़ाने की दिशा में जा रहा है। हमारे लोकतंत्र में जो एक नया मूल्य जोड़ा गया था कि मतदाता निर्णायक भूमिका में होगा, उसका एक आध्यात्मिक मूल्य भी है। हमारे देश में सदियों से यह मान्यता रही है कि हर व्यक्ति ब्रह्म रूप है, लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि सभी लोगों को बराबरी का हकदार माना जाए। हमारे संविधान में यह स्थापित किया गया है कि हर व्यक्ति को मनुष्य होने के नाते बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। लेकिन कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की शक्ति में इजाफा नहीं हुआ, वह निरंतर राज्याश्रित होता चला गया। आज समाज का प्रबुद्ध वर्ग भी इस दिशा में नहीं सोचता कि शक्ति लोगों तक कैसे पहुंचे। नेता को यह फिक्र रहती है कि अपने नियंत्रण में राज्य सत्ता कैसे रहे और उसके लिए कैसे जनसमर्थन हासिल किया जाए। मतदाताओं को जाति-धर्म, वर्ग आदि के संकीर्ण खेमे में बांटकर और लोभ-लालच दिखाकर समर्थन हासिल करने के प्रयास होते हैं। नतीजतन देश का आम आदमी यानी लोक, तंत्र के जाल में फंसता चला गया है। इसलिए आम आदमी को जो संविधान ने अधिकार दिए हैं, उसका भी वह पूरी तरह से उपयोग नहीं कर पा रहा है।
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लोकतंत्र सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में भी बराबरी की आकांक्षा जगाता है। अपने अनुभवों के आधार पर मैं कह सकता हूं कि बालिग मताधिकार के कारण आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में कुछ बुनियादी परिवर्तन तो हुए हैं, लेकिन बराबरी नहीं आ पाई है, जिस कारण विभिन्न क्षेत्रों में संघर्ष चल रहा है।
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आज पूरी दुनिया में एक नई पदावली का प्रचलन बढ़ा है, जिसे पोस्ट ट्रुथ कहा जा रहा है, जिसका मतलब है हकीकत से परे। इसमें एक भ्रम पैदा किया जा रहा है, जिसका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, सिर्फ प्रचार के जरिये कृत्रिम संकटों का भ्रम पैदा किया जा रहा है। साथ ही, संकटों से मुक्ति दिलाने के लिए नया नायक गढ़ा जा रहा है। लोकतंत्र में हमने आम आदमी को प्रतिष्ठित किया था, पर अब फिर से नायक की प्रतिष्ठा हो रही है। ऐसा वैश्विक स्तर पर समानता को खत्म करने के लिए हो रहा है, जिसकी झलक हमने अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में देखा है और इसकी कुछ झलक अपने देश में भी दिखी, जो शुभ संकेत नहीं है।

लेकिन हताश होने की जरूरत नहीं है। हमारे गणतंत्र की विशेषता यह है कि इसमें गतिशीलता है, जिसमें हर पांच साल पर लोगों को अपना प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिलता है। कोई अगर चाहे भी तो इतिहास के चक्र को पीछे धकेल कर राजशाही या अधिनायकवाद को प्रतिष्ठित नहीं कर सकता। हाल के कुछ वर्षों में चुनाव प्रक्रिया में हुए सुधारों ने लोकतंत्र को मजबूती दी है। हालांकि अब भी काफी सुधार की जरूरत महसूस की जा रही है। पिछले कुछ वर्षों में कई महत्वपूर्ण कानून बने हैं, जैसे सूचना का अधिकार, शिक्षा का अधिकार और खाद्य सुरक्षा कानून, जिसने आम आदमी को सशक्त बनाया है। हमारी संसद ने जितने प्रगतिशील कानून बनाए हैं, उनसे देश का कायाकल्प होने की संभावना है, लेकिन उन पर ठीक से अमल नहीं हो पाता, इसलिए समस्याएं बनी रहती हैं। वास्तव में हमारा लोकतंत्र इस समय संक्रमण के दौर से गुजर रहा है, जिसमें आम आदमी को सशक्त बनाने की कोशिश भी हो रही है, लेकिन सारे संसाधनों को पूंजीपति वर्ग को सौंपने के प्रयास भी हो रहे हैं। विकास की परिभाषा बदल रही है। इसकी वजह यह है कि आर्थिक संरचना में आम आदमी की भागीदारी सुनिश्चित नहीं है। संसद में गंभीर बहस कम होती है और अध्यादेशों का सहारा लिया जाता है। इससे लोकतंत्र कमजोर होगा। गणतंत्र दिवस पूर्ण स्वराज के संकल्प को याद करने और समाज को सशक्त बनाने के लिए संकल्प लेने का मौका है।


खुशी की बात है कि हमारा देश युवा राष्ट्र कहलाता है, जहां कामकाजी उम्र के युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। ये युवा अपने बुनियादी सवालों को उठाने और भविष्य निर्धारण करने में सक्षम हैं। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। बेशक शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन जैसी चुनौतियां अब भी हमारे सामने हैं, पर देश के युवाओं और आम लोगों की क्षमता हमें उज्ज्वल भविष्य के लिए आशान्वित करती है। हमें लोकतंत्र के प्रगतिशील मूल्यों का संरक्षण करना चाहिए और अंतिम व्यक्ति को मजबूत बनाने की कोशिश करनी चाहिए।

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