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सिर्फ शौचालयों का निर्माण काफी नहीं

Sun, 09 Aug 2015 05:59 PM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Sun, 09 Aug 2015 05:59 PM IST
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Not enough to construct toilet

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की किसी एक क्षमता के बारे में प्रशंसकों के साथ अगर उनके विरोधी भी सहमत होंगे, तो वह यह है कि सबसे कम महत्वपूर्ण विषय को राजनीतिक मुद्दा बनाने में वह सफल हुए हैं। शौचालयों का ही मामला लीजिए। आज समाचारपत्र और वेबसाइट्स अगर यह लिख रहे हैं कि शौचालय को मोदी सरकार या उसकी पूर्ववर्ती मनमोहन सिंह सरकार में से किसने राजनीतिक मुद्दा बनाया, तो यह नरेंद्र मोदी के प्रचार अभियान के कारण भी संभव हुआ है। शौचालयों पर चर्चा मोदी सरकार ने प्रारंभ नहीं की है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार वर्ष 1999 में स्वच्छता कार्यक्रम की आधिकारिक शुरुआत की थी। जबकि यूपीए सरकार का अपना निर्मल भारत अभियान था। पर नरेंद्र मोदी ने स्वच्छ भारत अभियान को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ दिया। दो अक्तूबर, 2014 को शुरू किए गए इस अभियान का लक्ष्य यह है कि दो अक्तूबर, 2019 यानी महात्मा गांधी की 150वीं जन्मतिथि तक देश में खुले में शौच करना पूरी तरह खत्म हो जाए। हम उस लक्ष्य के कितने करीब पहुंचे हैं? वर्ष 2012 तक देश के 11 करोड़ ग्रामीण परिवारों के पास शौचालय नहीं थे। इनमें से 1.1 करोड़ परिवारों की सरकार ने शौचालय बनवाने में मदद की। यानी लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अगले चार वर्षों में 9.9 करोड़ परिवारों को शौचालयों की जरूरत पड़ेगी।

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मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में अब एक सप्ताह से भी कम समय रह गया है, इसे देखते हुए सरकार ने करीब 300 केंद्रीय पर्यवेक्षकों को देश भर में यह देखने के लिए भेजा है कि स्कूलों में, खासकर लड़कियों के लिए शौचालय हैं या नहीं। यह जानना महत्वपूर्ण है कि पिछले एक साल के दौरान परिवारों और स्कूलों में कुल कितने शौचालय बने हैं। लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि इनमें से कितने शौचालयों का इस्तेमाल हो रहा है। शौचालयों का निर्माण कर देना ही उसके इस्तेमाल होने की गारंटी नहीं है। जून, 2014 में रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर कॉमपेशनेट इकोनॉमिक्स (आरआईएसई) ने बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के 13 जिलों का एक सर्वेक्षण किया। उसने पाया कि जिन 40 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के घर में शौचालय हैं, उन परिवारों का भी कम से कम एक व्यक्ति खुले में शौच करता है।
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लेकिन राजस्थान के पाली और बीकानेर, पश्चिम बंगाल के नदिया और ओडिशा के अनगुल जिलों से कुछ अच्छी खबरें हैं। यहां के कुछ कार्यकुशल जिलाधीशों ने ऐसी रणनीतियां अपनाईं, जिनके अच्छे नतीजे आए। पिछले सप्ताह राजस्थान के दो जिलों के अधिकारियों से बातचीत करते हुए, जो आचरण में बदलाव लाने वाले कार्यक्रमों के संचालन में सफल हुए हैं, मुझे जानकारियां मिलीं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। सरकार और विश्व बैंक के जल और स्वच्छता कार्यक्रम ने भी इनमें से कई अधिकारियों को प्रशिक्षित किया है।
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आरती डोगरा, जो अभी हाल तक बीकानेर की डीएम थीं, कहती हैं कि हमें शौचालय गिनना छोड़ देना चाहिए। इसके बजाय हमें उन लोगों की गिनती करनी चाहिए, जो शौचालय बनने के बाद भी खुले में शौच करते हैं। 2011 की जनगणना के मुताबिक, बीकानेर में 29 फीसदी परिवारों के पास शौचालय थे। आज यह आंकड़ा बढ़कर 82 प्रतिशत हो चुका है, और शौचालयों का इस्तेमाल भी बढ़ रहा है। यह कैसे संभव हुआ? दरअसल कई तरह की रणनीतियों ने ग्रामीणों को अपने तौर-तरीकों में बदलाव के लिए विवश किया है। समुदाय के लोगों की निगरानी और बाल समितियों के गठन के सुखद नतीजे सामने आए हैं। इस काम में स्कूली बच्चों को लगाया गया है। वे तड़के ही गांवों के आसपास निकल जाते हैं, और अगर कोई खुले में शौच करता दिखे, तो सीटी बजाते हैं।

राजस्थान के पाली में काम कर चुके, और अब उदयपुर के डीएम रोहित गुप्ता कहते हैं कि शौचालयों का निर्माण समाज के उन लोगों से कराना महत्वपूर्ण होता है, जिन्हें इनका इस्तेमाल करना है। उतना ही महत्वपूर्ण यह है कि शौचालय बनाने के लिए परिवारों को दी जाने वाली राशि एडवांस में देने के बजाय तब दी जाए, जब पूरे गांव में खुले में शौच करने पर रोक लगे। पाली में अधिकारियों की टीम ने गांवों का दौरा किया और लोगों को शौच के कारण गांवों के आसपास गंदगी और उन पर उड़ती मक्खियां दिखाईं और बताया कि यही मक्खियां मंदिरों तक में जाती हैं और पूजा में आप जो चढ़ाते हैं, उन्हें तक दूषित कर देती हैं। पाली और चुरू जिलों में सैनिटेशन पार्क बने हैं, जहां किफायती शौचालयों के प्रतिरूप बने हैं, जिनके आधार पर ग्रामीण अपना शौचालय बना सकते हैं।


इनसे हम सबक सीख सकते हैं। सबक यह है कि शौचालय निर्माण के बजाय शौचालयों के इस्तेमाल पर ध्यान केंद्रित करना होगा। ग्रामीण भारत के उन लोगों की तारीफ करनी होगी, जो शौचालयों का प्रयोग करते हैं। आज किसी गांव को विकास के मद में ज्यादा राशि दो ही वजहों से मिलती है-आबादी के कारण, और राजनीतिक वजह से। इसमें स्वच्छता को भी क्यों न शामिल किया जाए, जैसा कि कुछ जिलाधीश सुझाव दे रहे हैं?

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