संदेह नहीं, विश्वास चाहिए
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भारतीय अर्थव्यवस्था एक बार फिर मंदी की ओर जा रही है और सारे संकेत यह बता रहे हैं कि उसके हर क्षेत्र में गिरावट आ रही है। रियल एस्टेट तो पहले से ही गिरा पड़ा था, ऑटोमोबाइल में भी यह दिख रहा है। कोर सेक्टर में गिरावट की खबरें तो पहले ही आ चुकी हैं और रोजगार देने वाले कारखानों में अब छंटनी होती दिख रही है। बेरोजगारी अब 45 साल के उच्चतम पर जा पहुंची है और हालात सुधरते नहीं दिख रहे। निवेश की स्थिति कमोबेश पहले जैसी ही है और जिस बड़े पैमाने पर उसकी जरूरत है, वह दिख नहीं रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विदेशों से निवेश लाने के लिए पूरा प्रयास किया है और कुछ क्षेत्रों खासकर पेट्रोलियम में बड़े पैमाने पर निवेश के आसार बने हैं। लेकिन घरेलू निवेश अगर घट नहीं रहा है, तो बढ़ भी नहीं रहा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कॉरपोरेट टैक्स घटाकर सरकार के इरादों का संकेत दे दिया है। उसके पहले स्वर्गीय अरुण जेटली ने कई वस्तुओं पर जीएसटी घटाकर लोगों को काफी राहत दी थी। घटते हुए राजस्व संग्रह के बावजूद इस बात की संभावना बनी है कि सरकार आम आदमी पर लगने वाले आयकर में कटौती भी कर सकती है।
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लेकिन घरेलू निवेश न आने के पीछे जो महत्वपूर्ण कारण है, वह है अविश्वास। संदेह का एक माहौल बन गया है और कारोबारी तथा व्यापारी उसमें जी रहे हैं। यह संदेह हर तरह का है। सरकार की मंशा के प्रति, कर अधिकारियों के अनावश्यक हमलावर अंदाज के प्रति और निवेश के बाद मुनाफे के प्रति। यह बात अब खुलकर सामने आ गई है कि देश में कर अधिकारियों ने भय का एक माहौल बना दिया है। अंग्रेजी में एक कहावत है, मोर लॉयल देन द किंग। जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में काले धन के खिलाफ मुहिम शुरू की, तो उनका आशय यह नहीं था कि टैक्स अधिकारी ऐसा माहौल पैदा कर दें कि लोग भय के माहौल में रहने लग जाएं। सरकार की मंशा काले धन के अबाध प्रवाह पर रोक लगाने की थी। लेकिन टैक्स अधिकारियों ने अति उत्साह में लाखों कारोबारियों और व्यवसायियों को नोटिस पकड़ा दिए। छोटी-छोटी रकम के लिए भी लोगों को टैक्स के नोटिस दिए गए, जिससे भय का माहौल पैदा हो गया।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह बात संसद में उठाई और उन्होंने जो कहा, वह बिल्कुल सच है कि उद्यमियों से लेकर बैंकरों और यहां तक कि आम आदमी को भी नहीं बख्शा जा रहा है। टैक्स अधिकारियों में उन सबके प्रति संदेह भी है और उन्होंने सभी को एक तराजू में तौल दिया। इस संदेह के माहौल ने दोनों के बीच गहरी खाई खोद दी है। छोटे व्यापारी या व्यवसायी अब नकद खरीदारी या निवेश से बचते हैं, जिसका सीधा असर उनके तथा उनसे जुड़े अन्य के कारोबार पर पड़ा है। उन्हें टैक्स के नोटिस आने का डर लगता है। हालत तो यह है कि शायद ही कोई व्यापारी ऐसा हो, जिसे टैक्स अधिकारियों के, चाहे वह आयकर का हो या जीएसटी का, नोटिस नहीं मिले हों। इससे वे नया काम करने या और निवेश करने में कतराने लगे हैं। यहां तक कि वे बड़ी खरीदारी करने से भी डरते हैं। इससे देश में मंदी जैसा माहौल बनने लग गया है।
आम आदमी भी इस माहौल में अपनी खरीदारी पर रोक लगाता जा रहा है, जिसका असर साफ देखने को मिल रहा है। कारोबार या उद्योग का विस्तार एक सामान्य-सी बात है, लेकिन संदेह के इस माहौल में वह भी ठहर-सा गया है। इससे बाजार में धन के प्रवाह पर रोक लगी है और घरेलू खपत घट गई है। जाहिर है कि अगर ऐसे हालात रहेंगे, तो देश की अर्थव्यवस्था निगेटिव जोन में चली जाएगी और प्रधानमंत्री मोदी का सपना अधूरा रह जाएगा। भारत को पांच अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए सबसे जरूरी है सबका साथ। यह प्रधानमंत्री मोदी का ही नारा है। उन्होंने यहां तक कहा है कि धन सृजित करने वालों को शक की निगाहों से नहीं, सम्मान भरी नजरों से देखा जाना चाहिए। लेकिन काले धन के प्रति अधिकारियों में जो अनावश्यक उत्साह और आक्रामकता दिख दिख रही है, उसमें यह बहुत बड़ी बाधा है। टैक्स विभाग का हर नोटिस व्यापारी या उद्यमी को भयभीत करता है और वह काम करने से बचता है। इस देश में आज भी नकदी का बहुत चलन है और कई ऐसे कारोबार, व्यवसाय और काम हैं, जिनके लिए नकदी चाहिए ही। अर्थव्यवस्था को डिजिटाइज्ड करने में बहुत वक्त लगेगा। इसलिए यह जरूरी है कि नकदी के प्रति अनावश्यक पूर्वाग्रह को खत्म किया जाए।
समय है लोगों में जागरूकता लाने की और ऐसी व्यवस्था करने की, जिसमें नकदी की जरूरत घटती जाए। आज छोटे किसानों, मजदूरों, कम वेतन पाने वालों को नकदी चाहिए, क्योंकि वे बैंक जाने की जहमत उठा नहीं सकते और न ही उनके पास उतना धैर्य है। रियल एस्टेट की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वहां लगभग हर चीज के लिए नकदी चाहिए। मजदूरों का हर रोज लाखों रुपये का भुगतान नकद में ही होता है। मजदूर उसी पैसे से उसी समय अपनी रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदता है। इसे कोई कैसे रोक सकता है?
संदेह का यह माहौल देश और अर्थव्यवस्था के लिए वाकई बुरा है। एनडीए सरकार ने इंस्पेक्टर राज के खात्मे का बीड़ा उठाया और उसे इसमें सफलता भी मिली, लेकिन अब यह दूसरे रूप में सामने आ गया है। नौकरशाही पर अति विश्वास ठीक नहीं है और ऐसा करना खास तौर से अर्थव्यवस्था के लिए उचित नहीं है। अविश्वास भय और नफरत को जन्म देता है। इससे किसी का भला नहीं हो सकता। यह खुशी की बात है कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस दिशा में पहल करनी शुरू की है और वह सभी तबकों के लोगों से सुझाव ले रही हैं। उन्हें टैक्स अधिकारियों की आक्रामकता पर लगाम लगानी होगी और अपने स्वभाव के अनुरूप सभी को साथ लेकर चलने की तैयारी करनी ही होगी, नहीं तो देश को पांच अरब डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का उनका सपना धरा रह जाएगा। व्यापार ही नहीं, दुनिया भी भरोसे पर चलती है।