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पूर्वोत्तरः पहचान और विकास के बीच

Wed, 03 Apr 2019 06:34 PM IST
subir bhowmik सुबीर भौमिक
Updated Wed, 03 Apr 2019 06:34 PM IST
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Northeast: Between Identity and Development
पूर्वोत्तर के मुद्दे

भारतीय जनता पार्टी ने दावा किया है कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) 2019 के संसदीय चुनाव में पूर्वोत्तर में बहुत बेहतर प्रदर्शन करेगा। पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि उन्हें इस क्षेत्र की 25 लोकसभा सीटों में से 18-19 सीटों की उम्मीद है। हेमंत विस्व सरमा जैसे पार्टी के कुछ स्थानीय नेता तो 20-21 सीटों पर एनडीए की जीत की भविष्यवाणी कर रहे हैं। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में एनडीए ने इस क्षेत्र में 11 सीटें जीती थीं, जिनमें भाजपा ने अकेले आठ सीटें जीती थीं-असम में सात और अरुणाचल प्रदेश में एक।


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तब से बहुत कुछ बदल गया है। भाजपा ने क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर इस क्षेत्र के सभी राज्यों में सरकारें बनाईं, लेकिन मणिपुर और त्रिपुरा में इसका शानदार प्रदर्शन अप्रत्याशित था, क्योंकि इसने गठबंधन में वरिष्ठ भागीदार की तरह जीत दर्ज की। इसके मद्देनजर भाजपा की स्थिति बेहतर होनी चाहिए।

नॉर्थ ईस्ट नॉउ द्वारा कराए गए एक ओपिनियन पोल में मतदाताओं ने पूर्वोत्तर में अवैध प्रवासन को अपनी शीर्ष चिंता बताया, उसके बाद विकास का मुद्दा है। पिछले महीने हुए इस ऑनलाइन पोल ने दिखाया कि 44.8 फीसदी मतदाता मानते हैं कि पूर्वोत्तर में अवैध प्रवासन मुख्य चुनावी मुद्दा होना चाहिए, जबकि 34.67 फीसदी मतदाताओं का मानना है कि लोकसभा चुनाव में विकास को शीर्ष प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

ब्रिटिश शासन के दौरान शुरू हुआ अवैध प्रवासन का मुद्दा पूर्वोत्तर में अब तक अनसुलझा रहा है। असम गण परिषद (अगप) और भाजपा सहित विभिन्न राजनीतिक दल लंबे समय से जारी इस मुद्दे को हल करने के वादे के साथ सत्ता में आए। अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर भाजपा की आक्रामकता असम में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) को अपडेट करके दृढ़ता से लागू करने से मेल खाती है, जिसे अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने के कदम के रूप में पेश किया गया। अमित शाह ने पूर्वोत्तर के बाकी क्षेत्रों और पश्चिम बंगाल में भी शीघ्र एनआरसी को अपडेट करने का वादा किया, क्योंकि 2014 के चुनाव में नरेंद्र मोदी ने वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आए, तो अवैध बांग्लादेशियों को बाहर निकाल देंगे।

लेकिन सत्ता में आने के बाद भाजपा ने एक विवादास्पद नागरिकता (संशोधन) विधेयक, 2016 लाया, जिसमें हिंदू बांग्लादेशियों को नागरिकता देने की बात की गई। यह विधेयक लोकसभा में पारित हो गया, लेकिन मोदी सरकार द्वारा राज्यसभा में पारित न करवा पाने के कारण इसका अस्तित्व खत्म हो गया।

इस क्षेत्र में भाजपा के हिंदुत्व के मुद्दे से सकारात्मक संदेश नहीं गया है, बल्कि नागरिकता संशोधन विधेयक को पूर्वोत्तर के स्थानीय समुदाय और उनका प्रतिनिधित्व करने वाली स्थानीय पार्टियां इसे एक बड़े विश्वासघात की तरह देखती हैं।

असम में बड़ी संख्या में बंगाली मूल के लोग रहते हैं, एनआरसी और नागरिकता संशोधन विधेयक का प्रभाव पड़ना ही था, सो इस कवायद के बीच असम गण परिषद (अगप) एनडीए से बाहर हो गई थी। इस क्षेत्र में भाजपा के अन्य सहयोगियों ने भी ऐसी ही धमकी दी थी, जिससे भाजपा प्रायोजित पूर्वोत्तर जनतांत्रिक गठबंधन (एनईडीए) के टूटने की आशंका बढ़ गई। मगर राज्यसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक को पारित करवाने में भाजपा के विफल रहने के बाद पूर्वोत्तर के स्वदेशी समुदायों ने राहत की सांस ली। अगप फिर से एनडीए और एनईडीए में शामिल हो गया, लेकिन ऑल असम स्टुडेंट यूनियन (आसू) एवं कृषक मुक्ति संग्राम समिति ने उसकी भारी आलोचना की।

भाजपा ने यह भी कहा है कि अगर वह सत्ता में लौटती है, तो नागरिकता संशोधन विधेयक को फिर से पारित कराने की कोशिश करेगी। यही वह जगह है, जहां झूठ पकड़ में आता है-स्वदेशी समुदाय सतर्क हैं, क्योंकि वे बांग्लादेश से आए हिंदुओं और मुसलमानों में अंतर नहीं करना चाहते, और दोनों को घुसपैठिया मानते हैं। इसलिए नागरिकता संशोधन विधेयक को फिर से लाने के भाजपा के वादे से उसे असम, मेघालय और त्रिपुरा (जहां भी बंगाली हिंदू बहुमत में हैं) में बंगाली हिंदुओं का वोट मिल सकता है, लेकिन इससे स्वदेशी समुदाय और मुसलमान असहज हो गए हैं, जो कि धर्म आधारित नागरिकता की व्यवस्था का विरोध करते हैं।

भाजपा ने असम के छह स्वदेशी समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने का प्रस्ताव दिया है, ताकि उनका दिल जीत सके। इसे केंद्रीय वित्तपोषण में विशेष लाभ के साथ असम को एक आदिवासी बहुल राज्य बनाने के कदम के रूप में देखा गया है और इस बात की गारंटी के रूप में भी कि राजनीतिक ताकत हमेशा स्वदेशी समुदायों के पास रहेगी। लेकिन असम के कई लोग इसे अपनी सामूहिक उप-राष्ट्रीय पहचान को विखंडित करने वाले कदम के रूप में देखते हैं और इससे परेशान हैं।

यह सोशल इंजीनियरिंग वोट के रूप में कैसे तब्दील होगी? उस ऑनलाइन पोल से पता चलता है कि 20.52 फीसदी मतदाता मानते हैं कि रोजगार सृजन इस क्षेत्र में मुख्य चुनावी मुद्दा होना चाहिए। इसका असर भाजपा के खिलाफ होगा, क्योंकि देश के अन्य हिस्सों की तरह इस क्षेत्र में भी खासकर नोटबंदी के बाद रोजगार का भारी नुकसान हुआ है। लेकिन पहचान की राजनीति पूर्वोत्तर में हमेशा से प्रचलित रही है, बाहरी और भीतरी व्यक्ति की भावना अंततः चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकती है।

हालांकि इस सवाल का जवाब देना कठिन है कि एनआरसी अपडेट करने से भाजपा को होने वाला लाभ बरकार रहेगा या नहीं, क्योंकि नागरिकता संशोधन विधेयक पर पूर्वोत्तर क्षेत्र में भारी आक्रोश देखा गया। इस विधेयक ने पूर्वोत्तर क्षेत्र में चुनाव परिणामों को जटिल बना दिया है, क्योंकि यह जहां त्रिपुरा और असम जैसे कुछ क्षेत्रों में निश्चित रूप भाजपा को फायदा पहुंचाएगा, वहीं इससे असम के कुछ हिस्सों और पूर्वोत्तर के अन्य क्षेत्रों में उसे नुकसान भी हो सकता है।

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