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आज टाइम किसके पास है

Mon, 24 Dec 2012 12:22 PM IST
श्याम विमल
श्याम विमल Updated Mon, 24 Dec 2012 12:22 PM IST
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nobody has time

आज किसी के पास टाइम यानी समय नहीं है। समय के अभाव में हर दृश्य वस्तु या निराकार भाव संक्षिप्त या मितकथन होते जा रहे हैं। उचित कथन बल्कि यह होगा कि आदमी को संक्षिप्तीकरण की आदत पड़ गई है। यह संक्षिप्तीकरण केवल लोगों के हाव-भाव या बातचीत में नहीं दिखता। यह प्रवृत्ति नाम और शब्दों तक में फैल गई है।

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अब नाम को ही लीजिए। नाम चाहे व्यक्ति के हों, कंपनी के हों, संस्था के हों, अस्पतालों के हों, पार्टी के हों या प्रदेशों के, वे मूल रूप में कहीं नहीं दिखते। जहां तक भाषा और लिपि का सवाल है, अनेक लोग तो अंग्रेजी की वर्णमाला से ही काम चला रहे हैं। मराठी-गुजराती जन नागरी लिपि को प्रयोग में ले आए हैं- मो क गांधी, पुल देशपांडे, गो ना कालेलकर। अंग्रेजी वर्णों से तो अनगिनत नाम प्रयोग में हैं-जेपी, के एम मुंशी, जेएनयू, एएमयू, डीयू आदि।
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पीएमओ, सीएमओ, एनजीओ, आरटीआई, मनरेगा, डीएलएफ, यूपीए, एनडीए, एपील, बीपील, आईपीएल, आईसीसी, जेपीसी, यूएन, सार्क जैसे शब्द इतने चल चुके हैं कि इनका फुल फॉर्म बताने वाले कम ही लोग मिलेंगे। हिंदी के घनघोर पक्षधर लोहिया के नाम पर आर एम एल अस्पताल, तो लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नाम का संक्षिप्त रूप देकर एलएनजेपी अस्पताल लोगों की जुबान पर हैं। ऑल इंडिया मेडिकल साइंसेज को छोटा करके एम्स न जाने कब से बोला जा रहा है। उड़नपरी पीटी उषा का पूरा नाम अगर आप सुनें, तो हो सकता है, गश खाकर गिर पड़ें।
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कुछ उत्साही फिल्मी गीतकारों ने तो आई लव यू तक को छोटा करके ईलू कर दिया है। यह संक्षिप्तीकरण कई लोगों के लिए मजाक का विषय रहा है। अज्ञेय जी जेएनयू को मजाक में जनेयू बोला ही करते थे। संक्षिप्तीकरण का चाहे जो मजाक उड़ाएं, लेकिन इसका अपना मजा है। बोलते हुए समय कम लगता है, तो लिखते हुए जगह की बचत हो जाती है। यानी ज्यादा जगह घेरने का टंटा ही खत्म।


संस्कृत के हमारे दिग्गज व्याकरणाचार्य पाणिनि तो सूत्रों में संक्षिप्तीकरण के इस कदर कायल थे कि एक मात्रा भी कम हो जाती थी, तो इसे पुत्रोत्पत्ति के जैसा हर्षोल्लास का अवसर मानते थे। इसलिए संक्षिप्तीकरण की आलोचना करने का मतलब नहीं है। हम जिस दौर में रह रहे हैं, उसी दौर के अनुसार तो चलेंगे। इसलिए मुझे संदेह है कि समय न होने की शिकायत करने वाले पाठक मेरा व्यंग्य पढ़ेंगे भी या नहीं।

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