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नोबेल, गरीबी और आंबेडकर: 'हमारे राष्ट्र निर्माता देश की गरीबी के प्रति बेखबर नहीं थे'

Shyouraj Singh Bechain श्यौराज सिंह बेचैन
Updated Sun, 20 Oct 2019 04:03 AM IST
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Nobel, Poverty and Ambedkar: Our nation builders were not oblivious to the poverty of the country
सांकेतिक तस्वीर

भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी, उनकी फ्रेंच पत्नी एस्थर डुफ्लो और अमेरिकी अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से खासकर भारत की गरीबी को लेकर बहस छिड़ गई है। जिस देश का एक पांव तरक्की के चांद पर पहुंचने को आतुर हो और दूसरा पांव गरीबी की दलदल में गहरे फंसा हो, उसके लिए गरीबी विषयक शोध के लिए दिया जाने वाला नोबेल पुरस्कार विशेष मायने रखता है। कुपोषण की समस्या पर 1998 में अमर्त्य सेन को नोबेल मिला था, जिनके काम में भारत की गरीबी हटाने की चिंता शामिल थी। तब सेन ने कहा था, 'देश के पहले अर्थशास्त्री डॉ. आंबेडकर ने अगर गरीबी हटाने को लेकर आधारभूत काम नहीं किया होता और राष्ट्रीय विकास सापेक्ष दृष्टि नहीं दी होती, तो मेरे शोध के केंद्र में गरीबी-कुपोषण की समस्या नहीं होती।'


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भारतीय मूल के अभिजीत बनर्जी, उनकी फ्रेंच पत्नी एस्थर डुफ्लो और अमेरिकी अर्थशास्त्री माइकल क्रेमर को संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार मिलने के बाद से खासकर भारत की गरीबी को लेकर बहस छिड़ गई है। जिस देश का एक पांव तरक्की के चांद पर पहुंचने को आतुर हो और दूसरा पांव गरीबी की दलदल में गहरे फंसा हो, उसके लिए गरीबी विषयक शोध के लिए दिया जाने वाला नोबेल पुरस्कार विशेष मायने रखता है। कुपोषण की समस्या पर 1998 में अमर्त्य सेन को नोबेल मिला था, जिनके काम में भारत की गरीबी हटाने की चिंता शामिल थी। तब सेन ने कहा था, 'देश के पहले अर्थशास्त्री डॉ. आंबेडकर ने अगर गरीबी हटाने को लेकर आधारभूत काम नहीं किया होता और राष्ट्रीय विकास सापेक्ष दृष्टि नहीं दी होती, तो मेरे शोध के केंद्र में गरीबी-कुपोषण की समस्या नहीं होती।'

कुपोषण की गंभीरता का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हाल ही में आई ग्लोबल हंगर इंडेक्स की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 19 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और इस मामले में भारत की स्थिति नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान से भी खराब है। हमारी आर्थिक नीतियों का पहिया शुरू से ही पटरी से उतरा हुआ रहा है। प्रश्न उठता है कि आजादी मिलने के साथ ही गरीबी का अंत करना हमारी प्राथमिकता में क्यों नहीं था, जबकि गरीबी से मुक्ति पाना भी गुलामी से मुक्ति पाने जितना ही महत्वपूर्ण था।

हमारे राष्ट्र निर्माता देश की गरीबी के प्रति बेखबर नहीं थे। गांधी, नेहरू और आंबेडकर को गरीबी दिख रही थी। देश में आर्थिक नियोजन करने की क्षमता वाले अर्थशास्त्री थे। वे 1947 में ही जान रहे थे कि आजाद हो रहे देश में गरीबी अपनी जड़ जमाए बैठी रही, तो खुशहाल देश बनाने का सपना पूरा नहीं होगा। आजादी के बाद नेहरू जी के नेतृत्व में बनी पहली सरकार के पास यह मौका था कि वह गरीबी हटाने के काम को प्राथमिकता दे। पर ऐसा नहीं हो सका। डॉ. आंबेडकर ने नेहरू मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दिया था, यह बात सब जानते हैं। उसकी एक वजह तो हिंदू कोड बिल ही था। पर त्यागपत्र देने के पांच कारणों में एक था उनको योजना आयोग की जिम्मेदारी न सौंपना और देश के गरीबों के पक्ष में उनके अर्थशास्त्रीय ज्ञान का उपयोग नहीं करना। आंबेडकर ने अर्थशास्त्र में पीएच.डी. की थी। वह योजनाबद्ध ढंग से गरीबी हटाने का कार्यक्रम बनाना चाहते थे। उन्हें वह अवसर न देकर कांग्रेस ने गरीबी हटाने का मौका खोया और वर्षों तक राजनीतिक नारों से गरीबी हटाने का अभियान चलाया, जो केवल चुनावी प्रलोभन बनकर रह गया और गरीबी का संकट और गहराता गया।

हम भारतीयों के लिए इस नोबेल की प्रासंगिकता सिर्फ इसलिए नहीं है कि अभिजीत बनर्जी भारतीय मूल के अर्थशास्त्री हैं, बल्कि इसलिए है कि यह पुरस्कार वैश्विक गरीबी के संदर्भ में भारत को गरीबी मुक्त बनाने की फिक्र को लेकर किए गए इस काम का सम्मान है। अभिजीत बनर्जी गरीबी हटाने की अपनी सरकारों के कामों से आश्वस्त नहीं। उन्होंने सरकारों की इस बात के लिए आलोचना की है कि वे गरीबी हटाने में न केवल नाकाम रही हैं, बल्कि देश की ग्रामीण और शहरी गरीबी के बारे में तो वे अपने लिए असुविधाजनक आंकड़ों को भी नकार देती हैं।

पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने गरीबी हटाने का बीड़ा तो उठाया था, पर यदि गरीबी हटी होती, तो आज नोबेल विजेताओं के निष्कर्ष कुछ और होते। संविधान की प्रस्तावना में हम भारत के लोग समानता, स्वतंत्रता और समाजवाद की ओर अग्रसर होने के लिए संकल्पबद्ध हुए तो हैं। पर हम विषमता, गरीबी और असंतुलित विकास की ओर चले हैं। बढ़ती गरीबी और विषमता ने अपराधीकरण में अभूतपूर्व वृद्धि की है। राष्ट्रीय अपराध सूचकांक के अनुसार, 2007-से 2017 के बीच अपराध 66 फीसदी बढ़े हैं। विकास की सामूहिकता और राष्ट्रीयता की भवना को पीछे धकेल कर  निजी क्षेत्र व्यक्तिगत संपत्ति और स्वार्थपूर्ति को बढ़ावा दे रहा है, तो उसकी जड़ें केवल अर्थशास्त्र में नहीं हैं। गरीबी का संबंध सामाजिक संरचना से भी है।
 
पिछले तीन दशकों में आर्थिक सुधारों के नाम पर जो विकास हुआ है, उसमें असंतुलन अधिक है,इसलिए गरीबी कम नहीं हो पा रही। ऐसा भी नहीं है कि नोबेल पुरस्कार के प्रभाव में देश में गरीबी हटाने के अभियान शुरू होंगे। अगर ऐसा होना होता, तो अमर्त्य सेन को मिले नोबेल के बाद ऐसा हो सकता था। इसलिए हम यह दावा नहीं कर सकते कि गरीबों खासकर दलितों और आदिवासियों को गरीबी के जाल से बाहर निकालने के रास्ते खुल रहे हैं। आंकड़ों को झूठ कहने या रात को दिन बताने से अंधेरे की भयावहता कम नहीं हो जाती।

आज भी आर्थिक कारणों के पीछे के सामाजिक कारण न्यायिक संस्थाओं की चिंता के कारण बन रहे हैं। हम नहीं कह सकते कि भविष्य में कौन ऐसा नेता होगा, किस दल की सरकार होगी, जिसे देश की गरीबी हटाने का ऐतिहासिक श्रेय मिलेगा। भारत नोबेल पुरस्कार के हवाले से गरीबी पर ऐसे समय में बहस कर रहा है, जब ‘सवर्णों’ को गरीबी के आधार पर आरक्षण दिया जा रहा है। अर्थशास्त्री डा.आंबेडकर से लेकर अभिजीत बनर्जी तक अर्थशास्त्र की विकासवादी धारा ने गरीबी को ईश्वरीय प्रकोप नहीं माना है। यह मनुष्यों की व्यवस्था है। इसलिए मानवीय प्रयासों द्वारा पोलियो और टीबी की तरह गरीबी को भी समाप्त किया जा सकता है।
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