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सदन में बहस का विकल्प नहीं

Wed, 12 Aug 2015 08:24 PM IST
सुभाष कश्यप
सुभाष कश्यप Updated Wed, 12 Aug 2015 08:24 PM IST
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No alternative of debate

यह अच्छी बात है कि देर से ही सही, मुख्य प्रतिपक्षी दल कांग्रेस इस्तीफे की अपनी पुरानी जिद से पीछे हटकर संसद में बहस के लिए तैयार हो गई। इससे मानसून सत्र के पूरी तरह से धुल जाने और कोई भी कामकाज न होने का जो खतरा बना था, उससे कुछ हद तक उबरने की उम्मीद बंधी है। हालांकि अब इस सत्र में बहुत कम समय शेष रह गया है, फिर भी अगर सत्ता पक्ष एवं विपक्ष चाहे, तो कुछ जरूरी विधेयक पारित हो सकते हैं।

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बेशक यह गतिरोध टूटा है, पर संसद में पिछले दिनों जो हालात थे, वे लोगों के लिए चिंता का विषय बने हुए हैं। अगर इस खतरनाक प्रवृत्ति को खत्म करने के लिए देश के सभी राजनीतिक दलों ने मिल-बैठकर नहीं सोचा, तो यह न सिर्फ संसदीय लोकतंत्र के लिए, बल्कि राजनीतिक दलों के लिए भी ठीक नहीं होगा।
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ऐसा नहीं है कि संसद में हंगामा पहले नहीं होता था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह संसदीय बहस के स्तर में गिरावट आई है और संसद का ज्यादातर वक्त हंगामे की भेंट चढ़ता रहा है, वह सभी राजनीतिक दलों के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। संसदीय कार्यवाही के सुचारु संचालन का उत्तरदायित्व सिर्फ सत्ता पक्ष का नहीं है, बल्कि यह विपक्ष की भी जिम्मेदारी बनती है। व्यापक अर्थों में संसदीय परंपरा में सिद्धांत रूप में विपक्ष (इसे प्रतिपक्ष कहना ज्यादा बेहतर होगा) भी सरकार का अंग होता है। ब्रिटेन में नेता प्रतिपक्ष को 'हिज मैजेस्टीज लॉयल अपोजिशन' कहा जाता है और उसे कैबिनेट मंत्री का दर्जा और सुविधाएं दी जाती हैं। इस तरह से नेता प्रतिपक्ष सरकार का ही अंग होता है। इसलिए सत्ता पक्ष और विपक्ष एक-दूसरे को अस्पृश्य नहीं समझ सकते। विपक्ष का यह दायित्व है कि वह सरकार को उसकी गलतियां बताए, और सत्ता पक्ष का यह दायित्व है कि वह विपक्ष को सदन में अपनी बात रखने का मौका दे। लेकिन हमारे देश में पिछले कुछ वर्षों से हो यह रहा है कि जो भी पार्टी विपक्ष में आती है, उसे लगता है कि संसद में हो-हंगामा करना, सदन की कार्यवाही में बाधा डालना, सिद्धांतविहीन आचरण करना ही उसका काम है। पिछले लोकसभा में यही काम भारतीय जनता पार्टी ने भी किया था, जब वह विपक्ष में थी। और अब वही सब कांग्रेस कर रही है। इसलिए किसी एक दल को दोष नहीं दे सकते।
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इसकी मुख्य वजह है, वोट बैंक की राजनीति। वोट बैंक की राजनीति न सिर्फ सदन की कार्यवाही में बाधा बनती है, बल्कि यह समाज को भी बांटती है। आंकड़े बताते हैं कि जिस किसी के पास 15 फीसदी वोट बैंक है, उसके चुनाव जीतने की संभावना ज्यादा होती है। यही वजह है कि आपराधिक छवि के लोग भी आज चुनकर संसद में पहुंच रहे हैं और इसी कारण संसदीय आचरण में गिरावट आई है।

मानसून सत्र में जो इतना गतिरोध पैदा हुआ, उसका एक कारण यह भी है कि अगले कुछ महीनों में बिहार में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। सभी दल अपने-अपने वोट बैंक को प्रभावित करना चाहते हैं, ताकि चुनाव में उसका फायदा मिल सके। कांग्रेस चूंकि लंबे समय तक सत्ता में रही है, लेकिन अब वह विपक्ष में है। इस समय उसकी स्थिति इतनी कमजोर है, जितनी पहले कभी नहीं रही। इसलिए भी वह अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश कर रही है। हो-हंगामा करने से आम लोगों को लगता है कि अमुक पार्टी सशक्त विपक्ष की भूमिका निभा रही है। मगर सदन को बाधित करना स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा नहीं है।

इतने दिनों तक संसद के कामकाज को सिर्फ इसलिए बाधित किया गया कि सत्ता पक्ष के कुछ नेताओं का नैतिक आधार पर इस्तीफा मांगा जा रहा था। हमारी संसदीय परंपरा में स्वेच्छा से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देने के भी उदाहरण हैं। लालबहादुर शास्त्री ने रेल दुर्घटना होने पर बिना किसी के मांगे स्वेच्छा से नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया था। मगर नैतिकता के आधार पर इस्तीफा देना या न देना संबंधित मंत्री की इच्छा पर है। जब तक किसी मंत्री को सदन के भीतर बहुमत का विश्वास प्राप्त है, उसे अपनी कुर्सी पर बने रहने का अधिकार है। अगर विपक्ष को लगता है कि किसी अवैध काम के कारण किसी मंत्री को इस्तीफा देना चाहिए और वह नहीं दे रहा है, तो उसके खिलाफ वह सदन में निंदा प्रस्ताव ला सकता है, अविश्वास प्रस्ताव ला सकता है, इस पर सदन के भीतर और बाहर भी बहस कर सकता है, जिसे लोग देखेंगे और उसके खिलाफ जनमत तैयार होगा। और अगर वाकई लोगों को लगेगा कि अमुक मंत्री ने गलत किया है और उनके खिलाफ जनमत बनेगा, तो खुद उस मंत्री को इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। इसके अलावा, अगर किसी मंत्री या नेता ने कानून के विरुद्ध कोई काम किया है, तो उसके खिलाफ अदालत में जाने का भी प्रावधान है। इसलिए विपक्ष के पास सिर्फ हंगामा करने का विकल्प नहीं है।

मुझे नहीं मालूम कि इस संसदीय गतिरोध को खत्म करने के लिए सत्ता पक्ष ने सांविधानिक रूप से उपलब्ध सभी उपायों का उपयोग किया या नहीं, लेकिन संसदीय कार्यवाही का प्रबंधन कमजोर जरूर दिखा। जहां तक लोकसभा अध्यक्ष की बात है, उन्होंने थोड़ी सख्ती दिखाते हुए कांग्रेस के कुछ सांसदों को निलंबित तो किया, पर उसके बाद भी सदन में हंगामा होता रहा और कामकाज में बाधा आई। उन सबके खिलाफ भी तो कार्रवाई होनी चाहिए थी, चाहे वे किसी भी दल के क्यों न हों।

एक नागरिक होने के नाते मुझे लगता है कि विराट बहुमत के साथ सत्ता में आई इस सरकार को सफल होना चाहिए। अगर बहुमत की सरकार भी सफल नहीं हो पाती है, तो फिर संसदीय लोकतंत्र कैसे चल पाएगा! बहरहाल, यह सत्र तो अब समाप्त होने को है, लेकिन अगले सत्र के लिए सभी राजनीतिक दलों को गंभीरता से विचार करना चाहिए कि संसद की मर्यादा को कैसे बचाया जाए। क्योंकि संसद के ठप रहने से पूरे राजनीतिक वर्ग पर से जनता का भरोसा खत्म हो जाएगा और इसका नुकसान सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को होगा।

(रमण कुमार सिंह से बातचीत पर आधारित)

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