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गठबंधन न होना मजबूरी या रणनीति

Thu, 10 Jan 2019 06:37 PM IST
Rashid Kidwai रशीद किदवई
Updated Thu, 10 Jan 2019 06:37 PM IST
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No alliance compulsion or strategy
अखिलेश-राहुल-मायावती

नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाले राजग के खिलाफ संयुक्त विपक्ष के लिए उत्तर प्रदेश एक अवसर प्रदान करता है। अगर समाजवादी पार्टी (सपा)-बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) कांग्रेस के बिना एक ज्यादा मजबूत गठबंधन हो सकता है, तो कांग्रेस के लिए भी यहां सीटें साझा करने (ज्यादातर शहरी क्षेत्र में) के बजाय अकेले चुनाव लड़ना बेहतर हो सकता है।


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उत्तर प्रदेश की राजनीति में 14-15 जनवरी के करीब तेजी आएगी, जब खरमास खत्म हो जाएगा। सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के दिशा-निर्देश में अपने नए नामकरण के बाद प्रयागराज पहली बार 15 जनवरी से अपने पहले अर्ध कुंभ मेले का आयोजन करेगा। विश्व हिंदू परिषद और अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद, दोनों ने मोदी सरकार को चेतावनी दी है कि वह राम मंदिर निर्माण की तिथि घोषित करे। अपने ताजा इंटरव्यू में प्रधानमंत्री ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से पहले राम मंदिर पर अध्यादेश की किसी भी संभावना को खारिज कर दिया है।
 
कांग्रेस के पास विवादास्पद अयोध्या मुद्दे पर भाजपा-विहिप का मुकाबला करने के लिए कोई रणनीति नहीं है। उसकी अयोध्या नीति में न्यायिक फैसले की स्वीकृति या दो समुदायों के बीच समझौता शामिल है। राहुल गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस शांति-निर्माता के रूप में कोई बढ़त नहीं लेना चाहती और न ही राहुल अपने पिता की तरह अयोध्या मुद्दे के समाधान की कोई पहल करना चाहते हैं, जो 1986-89 के बीच आधा दर्जन से अधिक फॉर्मूले ले आए थे, जिन्हें राजीव फॉर्मूला, तिवारी प्लान (नारायण दत्त तिवारी 1989 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे) या बूटा सिंह फॉर्मूला (जो राजीव सरकार में गृह मंत्री थे) के नाम से जाना जाता है। 1989 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने अयोध्या में 'राम राज्य' का वायदा करते हुए सरयू तट से लोकसभा चुनाव का प्रचार अभियान शुरू किया था और वहां 'शिलान्यास' भी किया था।

अयोध्या मुद्दे पर स्पष्टता की कमी के अलावा कांग्रेस मोदी के नेतृत्व वाले राजग के खिलाफ प्रस्तावित महागठबंधन के बारे में कुछ गलतफहमियां दूर करने में भी असमर्थ है। अपने कार्यकर्ताओं और बड़े पैमाने पर मतदाताओं को कुछ बुनियादी बातें बताने में वह विफल होती दिख रही है। मसलन, पहला, जब भी महागठबंधन बनेगा, तो वह किसी व्यक्तित्व पर केंद्रित नहीं होगा। दूसरा, यह एक राष्ट्रीय स्तर का समझौता नहीं होगा, बल्कि देश के 29 राज्यों में सीट बंटवारा, समायोजन और मौन सहमति पर आधारित होगा। तीसरा, इसमें राहुल गांधी से लेकर मायावती, ममता बनर्जी, लालू प्रसाद यादव, सीताराम येचुरी से लेकर एम के स्टालिन, चंद्रबाबू नायडू और बाकी अन्य शीर्ष नेताओं के बीच अलग-अलग मत और मतांतर होंगे। चौथा, मई 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले और उसके दौरान, संभावित सहयोगियों के बीच बेहतर तालमेल के लिए ठोस प्रयास किए जाएंगे। पांचवां, अगर मोदी-शाह की भाजपा 200 सीटों से कम पर सिमट जाती है और संयुक्त राजग 250 सीटों का आंकड़ा पार करने में विफल रहता है, तभी महागठबंधन का असली आकार और उसकी सफलता लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद सामने आएंगे। और छठा, महागठबंधन की उत्तर प्रदेश की कहानी अंतर्विरोधों से भरी होगी।

उत्तर प्रदेश में गठबंधन की बात करते हुए एक बार फिर से यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि राजनीति में दो और दो मिलकर चार ही हों, यह जरूरी नहीं है। राज्य में लोकसभा के दो उपचुनावों के नतीजे बताते हैं कि कांग्रेस की अनुपस्थिति ने सपा-बसपा की मदद की थी। एक अन्य स्तर पर, मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के राज्य विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की सफलता क्षेत्रीय दलों से बेहतर सौदेबाजी में उसकी मदद नहीं करेगी। इसके विपरीत, 11 दिसंबर, 2018 के बाद अधिकांश क्षेत्रीय क्षत्रप राहुल के नेतृत्व वाली कांग्रेस से सावधान हो गए हैं। ऐतिहासिक रूप से ज्यादातर क्षेत्रीय दल कांग्रेस के विरोध या मूल संगठन से अलग होने के कारण उभरे हैं। सामूहिक रूप से उनमें राहुल को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने की इच्छा नहीं है।
 
अगर कांग्रेस पार्टी बहुमत के लिए जरूरी सीटों का लगभग आधा भी जीतने में सफल रहती है, तभी महागठबंधन के भीतर राहुल गांधी को केंद्रीय स्थान मिलने की संभावना जोर पकड़ेगी। यानी 543 सीटों वाली लोकसभा में बहुमत का आंकड़ा 273 है और कांग्रेस को अपने मौजूदा 48 के आंकड़े से बढ़कर इसके लिए 173 सीटें जीतने की जरूरत है।
 
दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के भीतर बहुत कम लोग कथित सीट बंटवारे के फॉर्मूले को स्वीकार करते हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में मात्र दो सीटें जीती थीं और सहारनपुर, कानपुर, लखनऊ, गाजियाबाद, बाराबंकी और कुशीनगर में दूसरे स्थान पर आई थी। इन सीटों में से सहारनपुर (65,090) और कुशीनगर (5,540) को छोड़कर हार-जीत का अंतर दो लाख मतों से ज्यादा था। गाजियाबाद में राज बब्बर दूसरे स्थान पर रहे थे, लेकिन सेवानिवृत्त जनरल वी के सिंह 5,67,260 वोटों से जीते थे। लखनऊ में रीता बहुगुणा जोशी (जो अब उत्तर प्रदेश में भाजपा की मंत्री हैं) 2,72,494 वोटों से हारी थीं। ऐसा ही कानपुर में श्रीप्रकाश जायसवाल और बाराबंकी में पी. एल. पुनिया के साथ हुआ था। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि गठबंधन के तहत अमेठी और रायबरेली के अलावा अगर ये छह सीटें उन्हें दे दी जातीं, तो भी पार्टी की जीत का आंकड़ा 2014 से अलग नहीं होगा।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का वोट बैंक ऐसा है कि अगर वह गठबंधन से बाहर रहती है, तभी उसके पास भाजपा को नुकसान पहुंचाने के ज्यादा मौके होंगे। चूंकि अमेठी व रायबरेली में कांग्रेस को स्वतंत्र छोड़ दिया गया है, बदले में वह सपा-बसपा-रालोद गठबंधन की मदद कर सकती है। उत्तर प्रदेश में गठबंधन का न होना ही राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ की लोकसभा सीटों पर सपा और बसपा को समायोजित करने के मामले में कांग्रेस की मदद करेगा, जहां पार्टी को भाजपा के खिलाफ सीधे मुकाबले में बड़ी बढ़त की उम्मीद है।

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