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पड़ताल: क्या गरीब लुप्त होती प्रजाति है, ...नीति आयोग की चाहत और सरकार की कोशिश

Sun, 03 Mar 2024 07:28 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 03 Mar 2024 07:28 AM IST
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सार
यह कहकर कि देश में गरीब आबादी केवल पांच फीसदी रह गई है, नीति आयोग को गरीबों का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए। सरकार गरीबी भले दूर करने में सफल न हो पा रही हो, लेकिन गरीबों को अपनी नजरों से ओझल करने की पुरजोर कोशिश जरूर कर रही है।
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NITI Aayog Report on poverty in India fun of poor govt trying to hide figure
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

अगर आप किसी सुबह उठें और अखबार में एक हेडलाइन पढ़ें कि ‘कोई गरीब नहीं, भारत ने किया गरीबी का उन्मूलन’, तो हैरत नहीं होनी चाहिए। नीति आयोग दरअसल यही चाहता है कि आप इस पर भरोसा करें। योजना आयोग जैसी प्रतिष्ठित संस्था को सरकार का प्रवक्ता बना कर रख दिया गया है। पहले उसने घोषणा की कि देश में बहुआयामी गरीबी 11.28 फीसदी है और अब इसके सीईओ ने यह खोज की है कि भारत में गरीब आबादी पांच फीसद से ज्यादा नहीं है। सीईओ ने यह आश्चर्यजनक दावा राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय द्वारा प्रकाशित घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण (एचसीईएस) के निष्कर्षों के आधार पर किया है। एचसीईएस के निष्कर्ष कितने ही आश्चर्यजनक क्यों न हों, लेकिन उनसे ये कहीं से प्रकट नहीं होता कि भारत में गरीबों का अनुपात पांच फीसदी से ज्यादा नहीं है।


आंकड़ों को समझिए
एचसीईएस का सर्वे अगस्त, 2022 से जुलाई, 2023 के बीच किया गया था। इसने 8,723 गांवों और 6,115 शहरी ब्लॉकों से 2,61,745 घरों (ग्रामीण क्षेत्रों में 60 और शहरी क्षेत्रों में 40 फीसदी) को कवर किया। हम यह भी मान लेते हैं कि नमूना पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्वपूर्ण था और सर्वे की कार्यप्रणाली भी बिल्कुल सटीक थी। इसका उद्देश्य वर्तमान/नॉमिनल कीमतों पर मासिक प्रति व्यक्ति व्यय (एमपीसीई) की गणना करना था। औसत के रूप में देखें तो एक व्यक्ति का मासिक व्यय था -


अब जरा नीचे के 20 फीसदी पर नजर डालते हैं। क्या नीति आयोग गंभीरता से तर्क देता है कि कोई भी व्यक्ति, जिसका मासिक खर्च (भोजन और गैर-खाद्य) ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 2,112 रुपये या 70 रुपये प्रतिदिन है, वह गरीब नहीं है? या शहरी क्षेत्रों में कोई भी व्यक्ति, जिसका मासिक खर्च 3,157 रुपये या प्रतिदिन 100 रुपये है, गरीब नहीं है? मेरा सुझाव है कि सरकार नीति आयोग के प्रत्येक अधिकारी को 2,100 रुपये देकर एक महीने गांवों में जाकर रहने के लिए भेजे और फिर यह बताने के लिए कहे कि उसका जीवन कितना समृद्ध था।

जो वास्तविकताएं सामने आईं
एचसीईएस ने खुलासा किया कि उपभोग में भोजन की हिस्सेदारी ग्रामीण क्षेत्रों में घटकर 46 और शहरी क्षेत्रों में 39 फीसदी हो गई है। यह शायद सच है, क्योंकि आय व व्यय तो बढ़ रहा है, लेकिन खाद्य उपभोग का मूल्य वही बना हुआ है या बेहद धीमी गति से बढ़ रहा है। बाकी आंकड़े भी वास्तविकता की कुछ और ही तस्वीर दिखाते हैं। अनुसूचित जाति व जनजातियां सबसे गरीब सामाजिक समूह बने हुए हैं। वे औसत से नीचे, तो ओबीसी औसत के करीब हैं। केवल ‘अन्य’ हैं, जो औसत के ऊपर हैं। राज्यवार आंकड़ों को देखें, तो सबसे गरीब नागरिक वे हैं, जो छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मेघालय में रहते हैं, जिनका एमपीसीई ग्रामीण क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय औसत से नीचे है। अगर हम शहरी क्षेत्रों के लिए एमपीसीई के राष्ट्रीय औसत पर विचार करें, तो राज्यों के नामों में थोड़ा ही फर्क पाएंगे। इन राज्यों में लंबे समय तक भाजपा और गैर-कांग्रेसी सरकारों का शासन रहा है। फिजूल प्रचार पर न जाएं, तो हैरत की बात है कि 1995 से भाजपा द्वारा शासित गुजरात एमपीसीई के मामले में ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में राष्ट्रीय औसत को लगभग ही गले लगा पाता है।

गरीबों से नजर मत फेरिए
जो बात मुझे परेशान करती है, वह है कि भारत में गरीब आबादी का प्रतिशत पांच फीसदी से ज्यादा नहीं है। इसका अर्थ यह भी है कि देश में गरीब एक लुप्त होती प्रजाति है। अब जरा अपना ध्यान देश के मध्य व समृद्ध वर्ग पर दें और परखें कि क्या गरीबों के संबंध में किया जा रहा दावा सही है?

- सरकार 80 करोड़ लोगों को प्रति व्यक्ति प्रति माह पांच किलो मुफ्त अनाज क्यों बांटती है? आखिरकार, अनाज व दूसरे विकल्प कुल एमपीसीई का महज 4.91 फीसदी  (ग्रामीण) और 3.64 फीसदी (शहरी) हैं।
- अगर गरीब पांच फीसदी से ज्यादा नहीं हैं, तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण क्यों किया गया, जिसके निम्नलिखित चौंकाने वाले तथ्यों पर नजर डालें-
1) छह से 59 महीने की उम्र के 67.1 फीसदी बच्चे एनीमिया से पीड़ित हैं।
2) 15 से 49 वर्ष की 57 फीसदी महिलाएं एनीमिया से पीड़ित हैं।
3) पांच वर्ष से कम उम्र के 35.5 फीसदी बच्चे अविकसित हैं।
4) पांच वर्ष से कम उम्र के 19.5 फीसदी बच्चे कमजोर हैं।

इसके अलावा क्या नीति आयोग ने दिल्ली की सड़कों पर भीख मांगने वाले बच्चों पर अपनी आंखें बंद कर ली हैं और क्या वह नहीं जानता कि देश में बड़ी तादाद ऐसे लोगों की है, जो फुटपाथों या पुलों के नीचे सोते हैं?

नीति आयोग नहीं जानता कि मनरेगा के तहत 15.4 करोड़ सक्रिय श्रमिक क्यों हैं? उज्ज्वला लाभार्थी एक साल में औसतन केवल 3.7 सिलिंडर ही क्यों खरीदते हैं? अगर नीति आयोग अमीरों की सेवा ही करना चाहता है तो उसे ऐसा करने दें, लेकिन उसे गरीबों का मजाक नहीं उड़ाने देना चाहिए। सरकार गरीबी भले दूर करने में सफल न हो पा रही हो, लेकिन गरीबों को अपनी नजरों से ओझल करने की पुरजोर कोशिश अवश्य कर रही है।

आंकड़े दिखाते हैं कि कुल जनसंख्या के 50 फीसदी का प्रति व्यक्ति व्यय 3,094 रुपये (ग्रामीण) और 4,963 रुपये (शहरी) से ज्यादा नहीं था। आंकड़ों को ज्यादा नजदीक से देखने पर तस्वीर समझ में आती है।

अब जरा नीचे के 20 फीसदी पर नजर डालते हैं। क्या नीति आयोग गंभीरता से तर्क देता है कि कोई भी व्यक्ति, जिसका मासिक खर्च (भोजन और गैर-खाद्य) ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 2,112 रुपये या 70 रुपये प्रतिदिन है, वह गरीब नहीं है? या शहरी क्षेत्रों में कोई भी व्यक्ति, जिसका मासिक खर्च 3,157 रुपये या प्रतिदिन 100 रुपये है, गरीब नहीं है? मेरा सुझाव है कि सरकार नीति आयोग के प्रत्येक अधिकारी को 2,100 रुपये देकर एक महीने गांवों में जाकर रहने के लिए भेजे और फिर यह बताने के लिए कहे कि उसका जीवन कितना समृद्ध था।

जो वास्तविकताएं सामने आईं
एचसीईएस ने खुलासा किया कि उपभोग में भोजन की हिस्सेदारी ग्रामीण क्षेत्रों में घटकर 46 और शहरी क्षेत्रों में 39 फीसदी हो गई है। यह शायद सच है, क्योंकि आय व व्यय तो बढ़ रहा है, लेकिन खाद्य उपभोग का मूल्य वही बना हुआ है या बेहद धीमी गति से बढ़ रहा है। बाकी आंकड़े भी वास्तविकता की कुछ और ही तस्वीर दिखाते हैं। अनुसूचित जाति व जनजातियां सबसे गरीब सामाजिक समूह बने हुए हैं। वे औसत से नीचे, तो ओबीसी औसत के करीब हैं। केवल ‘अन्य’ हैं, जो औसत के ऊपर हैं।

राज्यवार आंकड़ों को देखें, तो सबसे गरीब नागरिक वे हैं, जो छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और मेघालय में रहते हैं, जिनका एमपीसीई ग्रामीण क्षेत्रों के लिए राष्ट्रीय औसत से नीचे है। अगर हम शहरी क्षेत्रों के लिए एमपीसीई के राष्ट्रीय औसत पर विचार करें, तो राज्यों के नामों में थोड़ा ही फर्क पाएंगे। इन राज्यों में लंबे समय तक भाजपा और गैर-कांग्रेसी सरकारों का शासन रहा है। फिजूल प्रचार पर न जाएं, तो हैरत की बात है कि 1995 से भाजपा द्वारा शासित गुजरात एमपीसीई के मामले में ग्रामीण और शहरी, दोनों क्षेत्रों में राष्ट्रीय औसत को लगभग ही गले लगा पाता है।
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