घर की दहलीज से आगे

सुनील वत्स Updated Sat, 01 Feb 2014 09:25 PM IST
nirmala singh book
लैंड्स एण्ड- निर्मला सिंह
श्वेता बुक एजेंसी, पिलानी
मूल्य- 200 रुपए


एक स्त्री का जीवन क्या महज समझौते के लिए ही होता है। क्या हमारे समाज में चाहे घर हो या बाहर एक महिला के लिए हर तरह के समझौते पर आकर ठहरना ही उसकी नियति होती है। चूंकि हमारा समाज आज भी स्त्रियों को उनके अपने वजूद के साथ स्वीकार करने को तैयार नहीं है। फिर कैसे यह दुनिया महिलाओं की जिंदगी के लिहाज से सहज है। दरअसल, कुछ ऐसे ही सवाल लेकर आईं हैं अपने नए उपन्यास ‘लैंड्स एण्ड’ में लेखिका निर्मला सिंह।

अपनी किताब में उन्होंने उपन्यास के दो स्त्री किरदारों शबनम और सीमा के जरिये महिलाओं के अंतर्मन में झांकने की कोशिश की है । दरअसल दोनों किरदार प्रवासी भारतीय हैं। जिन्होंने भले ही घर की चारदीवारी से बाहर कदम रखा है, मगर अपने संस्कारों और मूल्यों की दहलीज लांघ नहीं पाई हैं। दोनों अपने-अपने पतियों से वैचारिक और शारीरिक स्तर पर सताई होने के बावजूद सुखमय समझौते में यकीन रखती हैं। शायद यही लेखिका की लेखनी की सीमा भी है।

वह मृदुला गर्ग के नारी पात्रों की तरह पारंपरिक और बुनियादी मान्यताओं को तोड़ने में यकीन नहीं रखती हैं। निर्मला के यहां की महिलाएं अपने संस्कारों की बात करती नजर आती हैं। उनके किरदार समाज के गहन अंधेरे में जद्दोजहद से जूझते भले ही नजर आते हों, मगर उनमें उम्मीद की रोशनी हमेशा बरकरार रहती है। जैसा कि एक किरदार सीमा कहती है-‘काली घटाओं के बीच से कौंधती बिजली की सुनहरी किरणें जब निकलती हैं, देखकर जीने का नया जोश, नया उत्साह जन्म ले लेता है।’

निर्मला का यह उपन्यास भले ही आधुनिक मानदंडों के हिसाब से यथार्थ के उतना करीब नहीं हो, मगर उनमें स्त्री मुक्ति की आकांक्षा साफ नजर आती है। आधुनिक चेतना तो उनके कथ्य में बखूबी झलकती है, लेकिन कहीं-कहीं किरदारों पर उनके अपने ही विचार हावी होते हुए नजर आते हैं। उनके पात्रों को उतनी ही आजादी है, जितनी कि सभ्यता और संस्कृति के लिहाज से कोई ठेस नहीं पहुंचे। कुल मिलाकर उपन्यास में पूर्व और पश्चिम की सभ्यताओं में महिला किरदारों के जरिये एक तरह का सामंजस्य भी बिठाने की कोशिश की गई है। 

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