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घर लौटता बुद्धू और राहत का पैकेज

Sat, 16 May 2020 08:25 AM IST
Nirmal Gupt निर्मल गुप्त
Updated Sat, 16 May 2020 08:25 AM IST
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Nirmal gupt editorial, covid 19 relief package
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : पीटीआई
                        
                            
बुद्ध प्रकाश जा रहा है, राहत पैकेज आ रहा है। यह सरकारी विनम्रता ही है कि वह अरबों-खरबों की इमदाद को इतना घटाकर ऐसे बता रही है, जैसे कोई धन्नासेठ अपनी भव्य अट्टालिका को गरीबखाना कह दे। जैसे कोई छप्पन भोग को रूखा-सूखा भोजन कहने लगे। अतिश्योक्तियों का अपना सौष्ठव होता है। बताया गया है कि जगह-जगह पर लोन मेले लगेंगे। मेले लगेंगे, तो यकीनन झमेले भी होंगे। तब तो तय है कि मुल्क को हेराफेरी में पारंगत नए पोस्टर बॉय जरूर मिलेंगे।
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बुद्ध प्रकाश जा रहा है, राहत पैकेज आ रहा है। यह सरकारी विनम्रता ही है कि वह अरबों-खरबों की इमदाद को इतना घटाकर ऐसे बता रही है, जैसे कोई धन्नासेठ अपनी भव्य अट्टालिका को गरीबखाना कह दे। जैसे कोई छप्पन भोग को रूखा-सूखा भोजन कहने लगे। अतिश्योक्तियों का अपना सौष्ठव होता है। बताया गया है कि जगह-जगह पर लोन मेले लगेंगे। मेले लगेंगे, तो यकीनन झमेले भी होंगे। तब तो तय है कि मुल्क को हेराफेरी में पारंगत नए पोस्टर बॉय जरूर मिलेंगे। मेला भरेगा, तो दुकान-दुकान पर बच्चों का जी बहलाने के लिए नाना प्रकार के झुनझुने टाइप बाजे और वयस्कों के लिए तमाम तरीके के खाजे रहेंगे। सबको पता है कि आस जब ऊपर से चल पड़ी है, तो वह देर या सवेर नीचे तक जरूर आएगी। रेवड़ियां बंटेगी, तो कमोबेश सबको मिलेंगी। गिलास में रखे रंगीन द्रव के ऊपर तैरते ग्लेशियर एकबारगी पिघलने लगे, तो गले के नीचे ठंडक जरूर उतरेगी। जनरल नॉलेज के मुताबिक, दुनिया की कोई चीज सदैव ऊपर से ऊपर नहीं जाती, अंततः नीचे और नीचे रसातल में जरूर जाती है। कहते हैं कि न्यूटन के जमाने में एक सेब पेड़ से टूटा था, तो गप्प से उसकी हथेलियों की बाउल में नूतन नियम बन जा गिरा था। वह सेब किसी बाहुबली की ड्योढ़ी में टंगी झल्ली में नहीं जा पहुंचा था। इसी तरह झड़बेरी के बेर जब-जब झड़ते हैं, तब-तब सीधे नीचे धरती पर ही आ टपकते हैं। अभी तक ऐसी कोई सूचना नहीं कि किसी की अलगनी पर सूखने के लिए टंगे कपड़े हवा के झोंके से उड़कर डायरेक्ट अंतरिक्ष में चले गए हों। महानगर से पैदल घर लौटते बुद्धू को यह

बात भलीभांति पता है। किसी बात का अता-पता होने भर से न तो समस्याओं का समाधान होता है और न फरिश्तों की तरह कंधों पर पंख उग आते हैं। वह निरंतर आगे और आगे बढ़ रहा है। बढ़ता ही चला जा रहा है। उसकी बीवी-बच्चे परछाईं की तरह साथ हैं। हर परछाईं की कांख में कोई न कोई गठरी दबी है। जिसकी जैसी सामर्थ्य, उतने वजन की गठरी। हर गठरी में गृहस्थी से जुड़े आवश्यक सामान और महानगरीय जीवन के अस्फुट स्मृति चिह्न हैं। उसका नाम बुद्ध प्रकाश है।

महानगर में लोग उसे प्यार (अथवा हिकारत) से सिर्फ बुद्धू कहने लगे, तो वह वही हो लिया। लौटकर बुद्धू घर की दिशा में जा रहा है। कब तक वहां पहुंच जाएगा, कौन जाने। सोच रहा है कि कौन जाने, सरकार द्वारा दिया गया आर्थिक दिलासाओं का बंडल उसके घर पहुंचने से पहले ही उसी तरह वहां धरा हुआ मिल जाए, जैसे कभी त्रेता में दरिद्र सुदामा को अपने मायावी मित्र की अनुकंपा से बना-बनाया भव्य भवन बिना किसी ईएमआई के मिला बताया जाता है।

वह और उसके जैसे न जाने कितने, वापस घर जाते हुए थोड़ी-सी शीतल छाया और ठंडाजल उगलता हैंडपंप तलाश रहे हैं। कोई कृपानिधान नमक, अजवाइन वाली पूड़ी और अचार की फांक बांटता मिल जाए, तो वे उसे उदरस्थ कर पल दो पल सुस्ताते हुए खुद से बड़ी-बड़ी बातें करें। नयनाभिराम सपने तो फिर कभी, कहीं भी देखे जा सकते हैं।

वह जल्द से जल्द घर-गांव पहुंचना चाहता है, पर इतना भी भोंदू नहीं कि उसे यह न मालूम हो कि वहां के हालात में अब भी लगभग वैसी ही बदहाली है, जैसे महानगर कूच करते समय थी। उन्हें थोड़ा चलने के बाद गंदला ही सही, पीने लायक पानी मिला। रूखा-सूखा खाने को कोई दे गया।

यह अलग बात कि बदले में उनके साथ सेल्फी खींच ले गया। कुल मिलाकर आठ पूड़ियां दीं और अलग-अलग मुद्राओं मेंशायद सोलह फोटो मोबाइल में सहेजीं। उन पूड़ियों से भूख मिटी। आरामदायक छांव मिली, तो उसने खुद से पूछने की जुर्रत की-अब? थोड़ी देर बाद उसके भीतर से जवाब आया, हे बुद्धप्रकाश जी, तुम मुंगेरीलाल जैसे खाली-पीली स्वप्नजीवी न बनो। बढ़ते चलो।

चल पड़े हो, तो अनवरत चलते रहो। अपने उस घर-गांव पहुंचो, जिसे याद कर तुम हर तीज-त्योहार रुआंसे हुए जाते थे। फिलहाल खुद को जीवित बचाए रखने की जिद पर अडिग रहो। जिंदा बचे रहे, तभी
तो जद्दोजहद कर पाओगे। ध्यान रहे, तुम्हारी यह लड़ाई हफ्ते, दो हफ्ते की नहीं, यह तो सनातन युद्ध है, जो बिना किसी गीतोपदेश के अनवरत चलना है।

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