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उम्मीद का सवेरा: नया साल चुनौतियों के समाधान का काल भी हो, 'मीलों अभी चलना है...'

Wed, 01 Jan 2025 04:37 AM IST
अमर उजाला Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Wed, 01 Jan 2025 04:37 AM IST
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सार
नए साल का मतलब सिर्फ तारीख का बदलना नहीं होता, बल्कि यह जीवन को एक नए ढंग से देखने और विफलताओं से सीखने व सबक लेने का भी अवसर हो सकता है। मसलन, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक राजनीति में जिस तरह की कटुता दिख रही है, वह खत्म होगी।
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new year 2025 Dawn of hope also a period of solutions to challenges robert frost said miles to go
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

नई सुबह और नए हौसलों के साथ हम नए वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, जिसमें अतीत की उपलब्धियों का गर्व और चुनौतियों का बोझ है, तो संभावनाओं के एक नए सूर्य का भी उदय हो रहा है। हमने बीते साल में उन स्थितियों को देखा, जब वैश्विक युद्धों और आपूर्ति शृंखला में लगातार पहुंच रही बाधाओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था बढ़ती रही। हमने एक करोड़ घरों में सौर रूफटॉप लगाने संबंधी प्रधानमंत्री सूर्योदय योजना की ऐतिहासिक घोषणा भी देखी, जिससे गरीब व मध्यम आय वाले परिवारों को बिजली के भारी-भरकम बिलों से निजात मिलेगी और ऊर्जा क्षेत्र में देश के आत्मनिर्भर बनने का भी मार्ग खुलेगा। चौबीस करोड़ से भी अधिक लोगों को गरीबी से उबारना एक बड़ी उपलब्धि रही, तो हालिया स्पैडेक्स जैसे अभियानों के दम पर आज भारत अमेरिका, रूस और चीन जैसे चुनींदा देशों के साथ खड़ा है। इन सबके बावजूद, जैसा अंग्रेजी कवि रॉबर्ट फ्रॉस्ट ने लिखा था, ‘मीलों अभी चलना है’, कई चुनौतियां भी हैं, जिन पर काम करने की जरूरत है।



नए साल का मतलब सिर्फ तारीख का बदलना नहीं होता, बल्कि यह जीवन को एक नए ढंग से देखने और विफलताओं से सीखने व सबक लेने का भी अवसर हो सकता है। मसलन, यह उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में लोकसभा चुनाव के बाद से अब तक राजनीति में जिस तरह की कटुता दिख रही है, वह खत्म होगी। संसद के कामकाज में रुकावटें दूर होंगी और राजनीतिक दलों के बीच आरोप-प्रत्यारोप का दौर मर्यादा को नहीं लांघेगा। विदेश नीति के मामले में, पड़ोसी बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद जिस तरह से भारत-विरोधी हवा चल रही है, उसे देखते हुए दोनों देशों के संबंधों को सामान्य बनाए रखना भारतीय कूटनीति के लिए किसी परीक्षा से कम नहीं है।


इसके अतिरिक्त, बांग्लादेश समेत पाकिस्तान, नेपाल और म्यांमार जैसे पड़ोसी देशों की चीन के साथ बढ़ती नजदीकी भी एक बड़ी चिंता है। आर्थिक मोर्चे पर देखें, तो बढ़ती महंगाई के अलावा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की हालिया गिरावट, भले ही वह दूसरे देशों की तुलना में कम हो, आशंका पैदा करती है। भारत समेत दुनिया भर में चरम मौसमी घटनाओं का बढ़ना और प्रदूषित होती हवा चिंताजनक है, लेकिन समृद्ध देशों के अनमनेपन के चलते पर्यावरणीय सम्मेलनों का महज औपचारिकता बनकर रह जाना उससे भी ज्यादा परेशान करने वाला है। उम्मीद है कि नया साल इन चुनौतियों के समाधान का काल भी होगा।

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