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आतंक के नए रंगरूट

Tue, 22 Jul 2014 02:49 PM IST
तस्लीमा नसरीन
तस्लीमा नसरीन Updated Tue, 22 Jul 2014 02:49 PM IST
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New terror recruits

अब्दुल रकीब अमीन ने मुझे जोखर जर्नाएब की याद दिला दी है। बोस्टन मैराथन के दिन वह बैग में प्रेशर कुकर बम सुनसान फुटपाथ पर चुपचाप रख आया था।

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बम फटने पर मैराथन देखने आए कुछ निरपराध लोगों की जानें गईं। जोखर की करतूत का पता चलने पर उसके स्कूल के छात्र, शिक्षक, उसके दोस्त और पड़ोसियों ने कहा था कि उसकी तरह भला लड़का दूसरा नहीं है। वह बास्केटबॉल का खिलाड़ी था।
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उसके कोच का भी कहना था कि ऐसे प्रतिभाशाली लड़के कम हैं। इस तरह का लड़का बर्बाद कैसे हुआ? वह मोहल्ले की मस्जिद में गया, कट्टरवादियों के संसर्ग में आया और बर्बाद हो गया।
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अब्दुल रकीब के बारे में भी स्कॉटलैंड के अबार्डीन में उसके तमाम परिचित यही कहते हैं कि वह लड़का बहुत अच्छा है। उसके बहुत दोस्त थे। वे सब हंसते थे। गप्पें मारते थे। फुटबॉल खेलते थे। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करते थे। हिपहॉप गाते थे। रकीब के दोस्तों में केवल मुस्लिम ही नहीं, ईसाई और यहूदी भी थे।

मित्रमंडली में रकीब बेहद लोकप्रिय था। सोचने पर भी आश्चर्य होता है कि यह लड़का अब इराक में है और आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट्स ऑफ इराक ऐंड सीरिया) से जुड़ गया है। रकीब के एक दोस्त का कहना है, वह एक बार कहीं बाहर गया था, लौटकर आया, तो उसके चेहरे पर घनी दाढ़ी और बदन पर ढीली पोशाक थी। अल कायदा की पोशाक। वह बार-बार कहता था, चलो, जेहाद के लिए चलें।

रकीब के दोस्त न उसके जेहाद का रहस्य समझ पाए, न ही उसमें आए आमूल बदलाव का। इसीलिए उन लोगों ने उससे यथासंभव दूरी बनाए रखी।

आईएसआईएस में रकीब का नाम अबू बारा अल हिंदी है। उसे नया नाम क्यों दिया गया, यह जानने की इच्छा होती है। जब वीडियो में उसका चेहरा साफ दिख रहा है, तब उसका असली नाम और दूसरी सूचनाओं के सामने आते बहुत देर नहीं लगेगी।

रकीब के परिचित एक आदमी की टिप्पणी थी, 'वह थोड़ा गुस्सैल जरूर था, पर मजहब से जुड़ जाने पर वह बेहद शांत हो गया है।' बताते हैं कि मोहल्ले की मस्जिद में वह मुअज्जिन का काम करता था, अजान देता था। उसी रकीब को अब आतंकवादियों के नए वीडियो में देखा जा रहा है।

आतंकवादी संगठन से जुड़ने के लिए जो तीन लड़के वीडियों में लोगों से अनुरोध करते दिखते हैं, उसमें तीसरा लड़का अब्दुल रकीब अमीन है। वह बंगाली है और उसका जन्म बांग्लादेश के सिलहट में हुआ है। उसका कहना है कि वह इंटरनेट के जरिये आतंकवाद से जुड़ा है।

पिछले कुछ दिनों में मैंने आईएसआईएस के जो वीडियो देखे, उनमें काले कपड़ों से चेहरा ढके हुए कुछ बंदूकधारियों को एकदम सहज तरीके से विरोधियों का गला काटते या सिर पर गोली दागते दिखाया गया। उसमें रकीब भी रहा होगा। उसकी उम्र छब्बीस साल है। हैरत होती है कि अमेरिका से सोलह-सत्तरह साल के मुस्लिम युवा इराक के आतंकी गुट में शामिल होने चले जा रहे हैं। बीस साल का मेडिकल छात्र नासिर मुथाना इराक चला गया है।

आतंकियों के उस वीडियो में मुथाना भी था। उसके माता-पिता यमन से आए हैं। नासिर अमेरिका के कैर्डिफ में पैदा हुआ और वहीं पला-बढ़ा। वहीं उसे और उसके सत्तरह वर्षीय छोटे भाई आसिल मुथाना को आतंकवाद से जुड़ने के लिए दुष्प्रेरित किया गया।

आतंकियों के वीडियो में जो पहला युवा दिखा, वह बीस वर्षीय रियाद खान है। वह भी कैर्डिफ का है और नासिर मुथाना का दोस्त है। दोनों कैर्डिफ के अल मनार सेंटर में कट्टरवादियों की तकरीर सुनने जाते थे। उस सेंटर में अल गामा अल इस्लामिया नाम की एक कट्टरवादी संस्था से जुड़े मुस्तफा अल मुकरी तकरीर करने आते थे। एक दूसरे वक्ता सऊदी अरब के मोहम्मद अल आरिफी थे।

आरिफी युवाओं को कहते थे, सीरिया जाओ, वहां जेहाद में हाथ बंटाओ। उनकी तकरीर से आकर्षित होकर कितने युवा जेहाद से जुड़े, यह नहीं कह सकते। अभी कुछ ही युवाओं की शिनाख्त हुई है। बाद में हालांकि अमेरिका की ओर से कहा गया कि सीरिया और इराक में जेहाद से जुड़ने हजारों युवा गए हैं। डॉक्टर या इंजीनियर बनने के सपनों को तिलांजलि देकर ये युवा अब मजहब के नाम पर खून कर रहे हैं।

मैं नहीं जानती कि बांग्लादेश से कुल कितने युवा पश्चिम एशिया में जेहाद से जुड़े हैं। पर अनुमान लगा सकती हूं कि अमेरिका से सीरिया जाकर जेहाद से जुड़ने वाले बंगाली युवाओं की संख्या काफी होगी।

बांग्लादेश के जो युवा अमेरिका में उच्च शिक्षा प्राप्त करने जाते हैं, आज वे दिग्भ्रमित और बर्बर हैं। एक से एक धुरंधर कट्टरवादी इन्हें आतंकवादी के तौर पर तैयार कर रहे हैं। जीवन की शुरुआत में ही ये युवा मृत्यु का वरण कर रहे हैं।

आईएसआईएस के आतंकियों के हाथ हजारों इराकी सैनिकों और पुलिस के खून से रंगे हैं। इनकी नृशंसता कई बार नाजी जर्मनी के हत्याकांडों को भी पीछे छोड़ती लगती है। इन्होंने बगदाद के स्थापत्य और इतिहास को ध्वस्त कर दिया है। शियाओं की तमाम मस्जिदों को बम से उड़ा दिए हैं।


आईएसआईएस का समर्थन न करने वाले सुन्नी भी उनके निशाने पर हैं। वे स्पेन पर कब्जा करने की बात कर रहे हैं। इस्लामी राष्ट्र का महान खलीफा अबू बकर अल बगदादी आखिर चाहते क्या हैं?

सवाल यह है कि जो मुस्लिम हत्या की राजनीति और आतंक के मजहब में यकीन नहीं करते, इस्लाम जिनके लिए शांति का मजहब है, वे लोग एकजुट होकर सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे? इस्लाम के नाम पर यहां-वहां जो बर्बरता शुरू हुई है, उसके खिलाफ वे आवाज क्यों नहीं उठा रहे? अल शवाब ने केन्या में, बोको हरम ने नाइजीरिया में और आईएसआईएस ने सीरिया और इराक में जो किया है, उसके खिलाफ शांतिप्रिय मुस्लिम समुदाय खड़ा क्यों नहीं हो रहा?

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