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पाकिस्तान के खिलाफ नई रणनीति

Sun, 07 May 2017 06:27 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 07 May 2017 06:27 PM IST
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New strategy against Pakistan
तवलीन सिंह

पाकिस्तान ने फिर स्पष्ट किया है कि वह भारत के साथ दोस्ती नहीं, दुश्मनी चाहता है। हमारे राजनेताओं ने फिर साफ किया है कि पाकिस्तान के मामले में उनकी रणनीति न युद्ध करने की है, न शांति लाने की। फिर ऐसा लगने लगा है कि सारे पत्ते पाकिस्तान के हाथ में हैं और अगली चाल क्या होगी, वह दिल्ली में नहीं, इस्लमाबाद में तय किया जाएगा। ऐसा तब तक होता रहेगा, जब तक हमारी विदेश नीति तैयार करने वाले स्वीकार नहीं करेंगे कि हमने फिर पाकिस्तान सरकार पर भरोसा करके धोखा खाया है। पिछले सत्तर वर्षों में ऐसा बार-बार होता रहा है।

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कभी इंदिरा गांधी ने जुल्फिकार अली भुट्टो पर भरोसा कर शिमला समझौते पर दस्तखत किए, तो कभी राजीव गांधी ने बेनजीर भुट्टो पर भरोसा कर शांति लाने की कोशिश की। इसी तरह अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज शरीफ पर भरोसा कर लाहौर समझौते पर वैसे समय दस्तखत किए, जब परवेज मुशर्रफ कारगिल युद्ध की तैयारी में लगे हुए थे।
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ऐसा लगता है कि नवाज शरीफ पर भरोसा कर जो गलती अटल जी ने की थी, वही गलती नरेंद्र मोदी ने की है। अपने शपथ ग्रहण समारोह में उन्होंने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को आमंत्रित किया। ऐसे ही काबुल से दिल्ली लौटते वक्त उन्होंने लाहौर में अचानक रुकने का फैसला किया। इन सबके बावजूद सीमा पर तनाव बढ़ता गया, कश्मीर में आतंकवादियों की घुसपैठ जारी रही और कश्मीर के अंदरूनी हालात बिगड़ते गए। ऐसा क्यों? क्या इसलिए कि पाक प्रधानमंत्री के पास विदेश नीति तय करने का अधिकार है ही नहीं?
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सच यह है कि जब से पाकिस्तान बना है, तब से विदेश नीति तय करने का अधिकार पाकिस्तान के सेनाध्यक्षों ने अपने हाथों में रखा है। भारत के साथ दोस्ती करना पाक सेना के हित में नहीं है, क्योंकि जिस दिन दोनों देशों के बीच शांति हो जाएगी, उस दिन पाक सेना की शक्ति आधी हो जाएगी। सो जब भी पाक जनरलों को दोस्ती के आसार दिखने लगते हैं, तो वे कुछ न कुछ ऐसा कर देते हैं, जिससे इस तनाव भरे रिश्ते में और तनाव पैदा हो जाता है।

सो जब सीमा पर हमारे जवानों के साथ बर्बर बदसलूकी हुई है, तो हमको क्या करना चाहिए? जब पाकिस्तान की एक अदालत ने एक भारतीय नागरिक को फांसी की सजा सुनाई है, तो हमें क्या करना चाहिए? मैं विदेश नीति की विशेषज्ञ नहीं हूं, लेकिन विनम्रता से अर्ज करना चाहती हूं कि पाकिस्तान को मैं बहुत अच्छी तरह जानती हूं। वहां मैने कई बार चुनाव के समय दौरे किए हैं, कई बार तब जाना हुआ है, जब सेना ने सरकार गिराई है और कई बार पुराने दोस्तों से मिलने गई हूं। इस अनुभव के आधार पर कहना चाहती हूं  कि इस उपमहाद्वीप में शांति तभी आएगी, जब भारत हर तरह से अपनी शक्ति साबित करके दिखाएगा। इसके लिए युद्धभूमि में उतरने की जरूरत नहीं है, पर हमारी खुफिया संस्थाओं द्वारा बिल्कुल उस तरह का युद्ध करने की जरूरत है, जैसा युद्ध पाकिस्तान की आईएसआई भारत के अंदर कश्मीर से लेकर मुंबई तक कर रही है।


इसके अलावा आर्थिक ताकत भारत का सबसे बड़ा हथियार है। पाकिस्तान के जनरल अच्छी तरह जानते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था जब दौड़ने लगती है, तब पाकिस्तान के लोग अपनी सेना की तरफ शक की नजर से देखते हुए सोचते हैं कि क्या सेना पर इतना खर्च होने की वजह से ही पाकिस्तान आगे नहीं बढ़ पा रहा? शांति लाने के लिए भारत को नए सिरे से नए मोर्चों पर लड़ना होगा।

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